शुद्धता के नाम पर ज़हर: आरओ पानी और बोतलबाज़ी एक बड़ा छलावा
आरओ और बोतलबंद पानी के नाम पर देशभर में एक सुनियोजित धोखा चल रहा है, जिसमें न सिर्फ़ लोगों की सेहत से खेला जा रहा है, बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इस मायाजाल से बाहर निकलने के लिए वर्षा जल संचयन, मटके का पानी और सरकारी पेयजल सुधार जैसे स्वदेशी विकल्पों की ओर लौटना ज़रूरी है।
-बृज खंडेलवाल-
पहले जगह-जगह शुद्ध पेयजल मुहैया कराने को प्याऊ लगाई जातीं थीं। आगरा में श्री नाथ जी निशुल्क जल सेवा की हर चौराहे पर प्याऊ लगती थी। अब रिक्शे वाला भी पानी का पाउच गटक रहा है। प्रोपेगंडा से प्रभावित लोग बीस रुपए की ब्रांडेड बोतलों से पानी पी रहे हैं। शादियों में, सत्संग और भंडारों में भी छोटी प्लास्टिक बोतल पकड़ा दी जाती हैं।
शहरी क्षेत्रों में बीस लीटर के जार धड्डले से सप्लाई हो रहे हैं। पहले महाराज लोग गली के कुओं से टोकनी में पानी लाते थे।
लेकिन आज हर गली-मोहल्ले, हर गांव-कस्बे में "शुद्ध पानी" के नाम पर एक सुनियोजित धोखाधड़ी चल रही है। आरओ और बोतलबंद पानी का यह मकड़जाल न सिर्फ़ आम आदमी की जेब काट रहा है, बल्कि उसकी सेहत और पर्यावरण को भी तबाह कर रहा है। यह कोई मामूली मसला नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित लूट है, जिसमें कॉरपोरेट, डीलर और यहाँ तक कि सरकारें भी शामिल हैं।
"जिस देश में गंगा-यमुना बहती हैं, आज वहां प्लास्टिक की बोतलों का बाज़ार फल-फूल रहा है, " कहती हैं सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर।
आरओ कंपनियां "99.9% शुद्ध" का नारा देकर लोगों को बेवकूफ़ बना रही हैं। मगर सच्चाई यह है कि यह तकनीक पानी से सिर्फ़ गंदगी ही नहीं, ज़रूरी मिनरल्स भी छीन लेती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट (2017) कहती है कि टीडीएस 100mg/L से कम वाला पानी स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक है, मगर आरओ वाटर का टीडीएस अक्सर 10-30mg/L तक गिर जाता है। यानी, आप शुद्ध के चक्कर में मिनरल्स-रहित, बेजान पानी पी रहे हैं! "जिस पानी को आप 'साफ़' समझ रहे हैं, वह आपकी हड्डियों को खोखला कर रहा है!" कहना है डॉ श्रद्धा का।
आईसीएमआर के शोध (2020) के मुताबिक, आरओ पानी पीने वालों में हड्डियों की कमजोरी, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और पाचन समस्याएं ज़्यादा देखी गईं। फिर भी, कंपनियाँ मिनरल कार्ट्रिज के नाम पर लोगों को ठग रही हैं। ये सिंथेटिक मिनरल्स शरीर को फ़ायदा नहीं, नुक़सान पहुंचाते हैं।
बाज़ार में बिकने वाला सो कॉल्ड मिनरल वाटर भी कोई मिनरल वाटर नहीं, बल्कि फ़िल्टर किया हुआ नल का पानी है, जिसे 15-30 रुपये लीटर में बेचा जाता है! और तो और, प्लास्टिक की बोतलों से माइक्रोप्लास्टिक और बीपीए जैसे ज़हरीले केमिकल्स पानी में घुलते हैं, जो कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और बाँझपन तक का कारण बन सकते हैं। रिवर एक्टिविस्ट चतुर्भुज तिवारी कहते हैं, "ये बोतलें सिर्फ़ पानी की नहीं, ज़हर की भी डिलीवरी कर रही हैं!"
पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य के मुताबिक, "प्लास्टिक का क़ब्रिस्तान और पर्यावरण की बलि दिख रही है। आरओ और बोतलबंद पानी का सबसे बड़ा अपराध यह है कि यह प्लास्टिक कचरे का पहाड़ खड़ा कर रहा है। हर साल मिलियन्स में प्लास्टिक बोतलें फेंकी जाती हैं, जो नदियों, समुद्रों और ज़मीन को प्रदूषित कर रही हैं। यह प्लास्टिक 500 साल तक नहीं सड़ता और धीरे-धीरे हमारे खाने-पीने की चीज़ों में घुलकर हमें मार रहा है।"
हम प्लास्टिक पी रहे हैं, और हमारी आने वाली पीढ़ियां इसकी कीमत चुकाएंगी!
आरओ सिस्टम पानी की बर्बादी का बड़ा स्रोत है। एक लीटर शुद्ध पानी के लिए 3 लीटर पानी बर्बाद होता है! नीति आयोग (2018) ने चेतावनी दी थी कि 2030 तक 21 बड़े शहरों का भूजल खत्म हो जाएगा। ऐसे में आरओ का अंधाधुंध इस्तेमाल जल संकट को और भी गहरा कर रहा है।
क्या है विकल्प? बायो डायवर्सिटी एक्सपर्ट डॉ मुकुल पांड्या बताते हैं।वर्षा जल संचयन। प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाना होगा। क्ले पॉट (मटके) का पानी: यह नैचुरल फ़िल्टर है, जो मिनरल्स को बचाता है। सरकारी नल के पानी की गुणवत्ता सुधार के लिए सरकार को सस्ता, सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना चाहिए। प्लास्टिक बोतलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगे। केरल और हिमाचल ने शुरुआत की है, पूरे देश में लागू होना चाहिए।"
आरओ और बोतलबंद पानी का धंधा सेहत, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, तीनों को लूट रहा है। हमें इस छलावे को समझना होगा और प्राकृतिक जल स्रोतों की ओर लौटना होगा। वरना, आने वाले समय में पानी सिर्फ़ अमीरों की पहुंच में होगा, और गरीब प्लास्टिक की बोतलों का ज़हर पीने को मजबूर होंगे।