मानसून सत्र से पहले दिल्ली में तेजी से बिछाई जा रहीं राजनीतिक बिसातें: परिसीमन और महिला आरक्षण पर सरकार ने बढ़ाई कवायद, कांग्रेस के सामने विपक्ष को एकजुट रखने की चुनौती
संसद के मानसून सत्र से पहले केंद्र सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बड़े विधेयकों पर समर्थन जुटाने में सक्रिय है, जबकि विपक्षी एकजुटता में दरारें कांग्रेस की रणनीति को चुनौती देती दिख रही हैं।
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस बार केवल विधायी कामकाज नहीं, बल्कि कई बड़े राजनीतिक और संवैधानिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। इनमें लोकसभा सीटों के नए परिसीमन, 2029 से महिला आरक्षण लागू करने के लिए आवश्यक संविधान संशोधन और अन्य अहम विधेयक शामिल हैं। दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के भीतर बढ़ते मतभेदों ने कांग्रेस की रणनीति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता उन विधेयकों के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत सुनिश्चित करना है, जिनके लिए संविधान संशोधन जरूरी है। यही कारण है कि मानसून सत्र शुरू होने से पहले भाजपा और एनडीए सहयोगी दलों के अलावा विपक्ष के कुछ दलों के रुख पर भी लगातार नजर रखी जा रही है।
महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में निर्णायक कदम
केंद्र सरकार का लक्ष्य 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण कानून को लागू करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करना है। इसके लिए परिसीमन और सीटों के पुनर्निर्धारण से जुड़े संविधान संशोधन को पारित कराना आवश्यक माना जा रहा है।
सरकार का मानना है कि यदि यह संशोधन पारित हो जाता है तो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने का रास्ता साफ हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि सरकार इस कानून को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है।
डीएमके के बदले रुख से बदले राजनीतिक समीकरण
अब तक परिसीमन के मुद्दे पर सबसे मुखर विरोध करने वाली डीएमके ने पहली बार नरम रुख के संकेत दिए हैं। पार्टी का कहना है कि यदि केंद्र सरकार यह स्पष्ट आश्वासन दे कि परिसीमन के बाद तमिलनाडु और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा तथा राज्यों की हिस्सेदारी पहले से स्पष्ट कर दी जाएगी, तो बातचीत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
डीएमके के इस संकेत को सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि लोकसभा में उसके 22 सांसद हैं। यदि बातचीत आगे बढ़ती है तो सरकार के लिए संविधान संशोधन का गणित पहले की तुलना में आसान हो सकता है।
एनसीपी-एसपी और अन्य दलों की भूमिका भी अहम
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि शरद पवार की एनसीपी (एसपी) का रुख पहले की तुलना में अधिक लचीला दिखाई दे रहा है। इसी तरह कुछ अन्य विपक्षी दलों के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आने की खबरें हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के विधानसभा चुनावों के बाद कई क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों के राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए पहले जैसी आक्रामक विपक्षी रणनीति से दूरी बना रहे हैं।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
मानसून सत्र से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी एकजुटता बनाए रखने की है। पिछले कुछ महीनों में इंडिया ब्लॉक के कई सहयोगी दल अलग-अलग मुद्दों पर स्वतंत्र रुख अपनाते दिखाई दिए हैं।
तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के संबंधों में आई तल्खी तथा विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं ने कांग्रेस की रणनीति को कमजोर किया है।
यदि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर विपक्ष एकजुट नहीं रह पाता तो कांग्रेस के लिए सरकार को रोकना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो सकता है।
सरकार का पूरा फोकस संख्या बल पर
संविधान संशोधन पारित कराने के लिए सरकार को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। इसी वजह से भाजपा केवल एनडीए सहयोगियों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि उन क्षेत्रीय दलों से भी संवाद बनाए हुए है जो किसी विशेष मुद्दे पर समर्थन दे सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस बार केवल राजनीतिक अपील नहीं, बल्कि राज्यों के हितों और प्रतिनिधित्व को लेकर भी स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत कर सकती है ताकि दक्षिण भारतीय राज्यों की आशंकाओं को दूर किया जा सके।
परिसीमन सबसे संवेदनशील मुद्दा
लोकसभा सीटों के परिसीमन का विषय लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क रहा है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होना चाहिए।
संभावना है कि सरकार संशोधन के अंतिम प्रारूप में ऐसे प्रावधानों पर विचार करे, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को संतुलित किया जा सके और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाई जा सके।
समाजवादी पार्टी पर भी टिकी निगाहें
लोकसभा में समाजवादी पार्टी के सांसदों की संख्या भी इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि विपक्ष पूरी तरह एकजुट नहीं रहता और कुछ दल तटस्थ रहते हैं या सदन से बहिर्गमन का रास्ता अपनाते हैं, तो सरकार के लिए आवश्यक बहुमत जुटाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
मानसून सत्र में कई बड़े विधेयकों की संभावना
सूत्रों के अनुसार, सरकार मानसून सत्र में केवल परिसीमन और महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रहेगी। कई अन्य प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों से जुड़े विधेयकों को भी सदन में लाने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए संसदीय कार्य मंत्रालय और भाजपा नेतृत्व लगातार सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाए हुए हैं।
राजनीतिक संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण
इस बार का मानसून सत्र केवल विधेयकों के पारित होने तक सीमित नहीं रहेगा। यह सत्र 2029 के राजनीतिक एजेंडे की दिशा भी तय कर सकता है। यदि सरकार संविधान संशोधन जैसे बड़े विधेयकों पर व्यापक समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो यह उसके लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी। वहीं यदि कांग्रेस विपक्ष को एकजुट रखने में विफल रहती है, तो इसका असर आने वाले चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।