प्रयागराज माघ मेले का विवादः फैसले अफसरों के और आग मुख्यमंत्री के माथे, आस्था के बहाने ये सत्ता की असली परीक्षा
प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच का विवाद यह बताता है कि इतिहास से लेकर वर्तमान तक, निर्णय नीचे लिए जाते हैं और दोष ऊपर चढ़ता है। समाधान टालने से भ्रम बढ़ता है, चाहे वह शंकराचार्यों की वैधानिक स्थिति हो या प्रशासनिक विवेक। देशहित इसी में है कि स्थिति जैसी भी हो, वह स्पष्ट हो। सत्ता, आस्था और कानून, तीनों को धुंध में नहीं, स्पष्ट रेखाओं में काम करना चाहिए। निर्णय में देरी केवल विवाद को टालती नहीं, उसे और गहरा करती है।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
प्रयागराज माघ मेले जैसी घटना किसी अन्य प्रदेश, काल या सत्ता-खंड में घटी होती और वहां मौजूद पुलिस व प्रशासन अपने विवेक से किसी शंकराचार्य के काफिले को रोकते तो परिणाम अनुमान से परे नहीं होते। विवाद तो अवश्यंभावी था, उसके बाद हालात किस दिशा में जाते, यह सोचने भर से सिहरन होती है।
यथार्थ यह है कि उत्तर प्रदेश में दो-दो उपमुख्यमंत्री होते हुए भी यह मामला शायद किसी उपमुख्यमंत्री तक पहुंचा ही नहीं होगा। और यदि पहुंचा भी होगा, तो बिना समय गंवाए सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक सरका दिया गया होगा। प्रयागराज के सांसद, विधायक और अन्य पदाधिकारी भी चाहते तो तत्काल हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाल सकते थे। लेकिन जब एक बार प्रशासनिक निर्णय ले लिया गया और वह सार्वजनिक हो गया, तो मुख्यमंत्री के सामने विकल्प सीमित रह जाते हैं, क्योंकि तब तक ‘बम’ फट चुका होता है।
सत्ता संभालना आसान नहीं होता। इतिहास गवाह है कि जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और रामभक्तों पर गोलियां चलीं, तो कहा जाता है कि गोली चलाने का आदेश उन्होंने नहीं दिया था, बल्कि तत्कालीन मुख्य सचिव ने दिया था। इसके बावजूद उस निर्णय का नैतिक और राजनीतिक दाग मुलायम सिंह यादव को जीवन भर ढोना पड़ा। वे चाहते तो उस अधिकारी को जनता के सामने ला सकते थे, दोष साझा कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि सारा कलंक उन्होंने स्वयं ओढ़ लिया।
शायद कोई और प्रदेश या कोई और समय होता, तो सौ से अधिक लोगों की बलि भी चढ़ सकती थी। पर वे मुलायम सिंह थे और आज सत्ता में श्री योगी हैं। दोनों ने, अपने-अपने समय में, व्यवस्था के फैसलों का बोझ अपने माथे पर ही लिया।
अब प्रश्न यह है कि आगे क्या होना चाहिए? जब सरकार स्वयं यह स्पष्ट कर रही है कि मौनी अमावस्या कोई शाही स्नान पर्व नहीं है और वह कुम्भ में हुई गलतियों को दोहराने से बचना चाहती है, तो स्थिति को स्पष्ट करना और भी आवश्यक हो जाता है। कुम्भ में अत्यधिक भीड़, अव्यवस्थित मार्गों और प्रशासनिक चूकों ने भयावह हालात पैदा किए थे। भगदड़, धक्का-मुक्की और जानहानि तक की नौबत आई थी।
पहला आवश्यक कदम यह होना चाहिए कि सभी शंकराचार्य स्पष्ट और सामूहिक रूप से यह तय करें कि क्या उचित है और क्या अनुचित। क्योंकि प्रशासन तो यह कह ही रहा है कि उसने जो किया, वह सौ प्रतिशत सही किया।
दूसरा, और शायद सबसे निर्णायक कदम, सुप्रीम कोर्ट को वर्षों से लंबित ज्योतिर्मय पीठ शंकराचार्य पद के उस निर्णय को अब अंतिम रूप देना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो जाए कि शंकराचार्य कौन हैं और उनकी वैधानिक मान्यता क्या है। एक स्पष्ट निर्णय न केवल धार्मिक संस्थाओं के लिए, बल्कि सरकार और आम जनता, दोनों के लिए आवश्यक है। आज सबसे बड़ी समस्या असमंजस है और असमंजस किसी भी व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक होता है। स्थिति चाहे जो भी हो, उसका साफ होना देशहित में है।