ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी की गर्जना: न विपक्ष को मजबूती मिली और न देश को दिशा
राहुल गांधी का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर संसद में दिया गया भाषण सरकार पर हमला कम और कूटनीतिक अपरिपक्वता अधिक दर्शाता है। उन्होंने युद्ध विराम और अमेरिकी दबाव की बात कर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों का राजनीतिकरण तो किया, लेकिन कोई ठोस समाधान या रणनीति नहीं दी। सरकार की आलोचना लोकतंत्र में जरूरी है, परन्तु रक्षा मामलों में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की दरकार होती है। यह भाषण न विपक्ष को मज़बूती दे सका, न ही राष्ट्र को नई दिशा।
-Bottom of Formबृज खंडेलवाल-
संसद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का जोशीला भाषण जितने सवालों के जवाब देने आया था, उससे कहीं ज़्यादा प्रश्न खड़े कर गया। उन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला, लेकिन क्या ये हमला सरकार पर भारी पड़ा, या फिर उनकी अपनी समझदारी पर सवालिया निशान छोड़ गया?
सियासत ज़्यादा, समझदारी कम?
राहुल गांधी के इस भाषण की सबसे बड़ी कमी ये है कि उन्होंने सरकार की रणनीतिक फैसलों की आलोचना तो की, लेकिन कोई ठोस विकल्प या समझदार सुझाव नहीं दिया। उन्होंने युद्ध विराम और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कथित दबाव का ज़िक्र किया, लेकिन बिना कूटनीति और रक्षा नीति की जटिलता को समझे हुए। यह एक राजनीतिक चाल ज़्यादा लगती है, राष्ट्रहित की चिंता कम।
जो बहस और सवाल पार्लियामेंट्री कमेटी ऑन डिफेंस में किए जाने चाहिए थे, उन्हें सार्वजनिक मंच पर उठाना एक गलत परंपरा की शुरुआत है। सिर्फ भारत ही युद्ध की चपेट में नहीं है, दुनिया के तमाम मुल्क संघर्ष के खिलाड़ी रहे हैं। सरकारी नाकामियों को पब्लिकली एक्सपोज करके सेना और जनता का मनोबल कमजोर होता है। जब सेना का जवान बॉर्डर पर सुनेगा कि युद्ध या संघर्ष देश हित में नहीं बल्कि राजनैतिक लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है, तो राहुल गांधी बताएं, आर्म्ड फोर्सेज में क्या संदेश जाएगा।
सरकार की सफाई और रणनीतिक चुप्पी
मोदी सरकार ने कई बार साफ़ कहा है कि भारत ने किसी बाहरी दबाव में आकर युद्ध विराम नहीं किया। पर्दे के पीछे क्या है, इसको उजागर करने से किसका फायदा होगा? कूटनीति का एक उसूल होता है कि हर बात सार्वजनिक नहीं की जाती। रणनीतिक अस्पष्टता एक टूल होता है, जिससे सरकारें विकल्प खुले रखती हैं। राहुल गांधी को यह बात समझनी चाहिए कि दुनिया भर की सरकारें इसी तरह काम करती हैं।
कमज़ोरी का संदेश?
जब राहुल गांधी ये इशारा करते हैं कि भारत ने बाहरी दबाव में आकर कोई कदम उठाया, तो इससे दुनिया को भारत की कमज़ोरी का संदेश जाता है। यह न तो देश की छवि के लिए अच्छा है, न ही विदेश नीति के लिहाज़ से।
मिलिट्री ऑपरेशनों पर खामोशी क्यों?
कोई भी सरकार अपने सैन्य अभियानों की कमज़ोरियों को सार्वजनिक नहीं करती, जब तक बिल्कुल ज़रूरी न हो। इससे न केवल जनता का मनोबल बचा रहता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि मज़बूत बनी रहती है। लेकिन राहुल गांधी का भाषण इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करता दिखा।
राजनीति बनाम राष्ट्रहित
लोकतंत्र में सरकारें अपने सैन्य अभियानों को एक उपलब्धि के रूप में पेश करती हैं। यह नई बात नहीं है। पर गांधी ने 'ऑपरेशन सिंदूर' की आलोचना कर उन मतदाताओं को भी नाराज़ कर दिया, जो इसे देश की ताक़त मानते हैं। आलोचना ज़रूरी है, लेकिन समाधान भी तो बताना चाहिए?
ट्रम्प का नाम क्यों घसीटा?
डिप्लोमेसी पर्दे के पीछे चलती है। धमकियां, दबाव और समझौते ज़ाहिर नहीं किए जाते। ऐसे में ट्रम्प का नाम लेकर राहुल गांधी ने क्या साबित किया? इससे न केवल भारत की संतुलित विदेश नीति की समझ पर सवाल उठते हैं, बल्कि यह भी लगता है कि वे भारत को एक अलग-थलग देश के रूप में पेश कर रहे हैं जबकि भारत आज जी-20 की मेज़बानी कर चुका है और वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है।
न निष्कर्ष, न समाधान
राहुल गांधी का भाषण एक राजनीतिक स्टंट ज़्यादा लगा, जिसमें न तो कोई ठोस रणनीति थी, न ही कोई दूरदर्शिता। सरकार की आलोचना लोकतंत्र में जायज़ है, पर जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो ज़िम्मेदारी और समझदारी की ज़रूरत होती है।
प्रधानमंत्री मोदी सहित कई भाजपा नेताओं ने आजादी के बाद छह दशकों में डिफेंस ब्लंडर्स और की लंबी लिस्ट प्रस्तुत की है। अगर राहुल गांधी मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से करते हैं तो उनको ये भी बताना चाहिए कि 1971 के युद्ध के बाद 93,000 पाक प्रिजनर्स ऑफ वार के बदले भारत को दिखावटी शांति के झुनझुने के और क्या मिला? दरअसल, एक्सप्लेन तो कांग्रेस को करना है कि कश्मीर से लेकर कच्चातिवु टापू हस्तांतरण तक कितने समझौते किसके दबाव में किए। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी नेताओं के भाषण, वर्ग विशेष के तुष्टिकरण से प्रेरित हैं, राष्ट्र हित की भावना का अभाव है। सिर्फ पॉलिटिकल पॉइंट्स स्कोर करने की चेष्टा दिखती है।
प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी का ये भाषण न इधर का रहा, न उधर का। न राष्ट्र को कुछ नया सोचने को मजबूर किया, न सरकार को। एक और मौका हाथ से निकल गया, देश की सबसे अहम चुनौतियों पर सार्थक चर्चा करने का।