रेलवे का नया रेला: लगेज के लिए चार तरह के नियम और बढ़ाएगा मुश्किलें
रेलवे ने यात्रियों के लिए सामान की चार अलग-अलग सीमा तय की हैं, लेकिन यह व्यवस्था चेकिंग, मशीनों और स्टाफ की कमी के कारण और उलझनें बढ़ा सकती है। एक समान सीमा तय कर सीसीटीवी और बिना टिकट यात्रा पर नियंत्रण किया जाये तो व्यवस्था अधिक सरल और प्रभावी हो सकती है।
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
काम आसान हो सकता है, पर समझदार लोग उसे उलझा कर चैन ले लेते हैं। रेलवे में चेकिंग के लिए कर्मचारी वैसे ही बहुत कम हैं, फिर भी जीएसटी के चार रेट की तर्ज पर रेलयात्रियों के लिए सामान के नये नियम थोप दिये गये हैं।
अब सवाल यह है कि इससे रेलवे और देश को कितना फायदा होगा? हकीकत तो यह है कि इन नये नियमों से प्लेटफॉर्म पर चढ़ते-उतरते यात्रियों की भीड़ और बढ़ेगी और उपद्रव की आशंका भी बनेगी रहेगी।
रेलवे ने जनरल यात्रियों के लिए 35 किलो, एसी-3 यात्रियों के लिए 40 किलो, एसी-2 यात्रियों के लिए 50 किलो और फर्स्ट एसी यात्रियों के लिए 70 किलो सामान ले जाने का नियम बनाया है।
लेकिन क्या रेलवे नापतौल की इतनी मशीनें लगवा पायेगा कि हर जगह 35 और 40 किलो तौल सके? क्या इतने चेकिंग कर्मचारी जुटा पायेगा? और फिर उन पर नजर रखने के लिए भी कोई अधिकारी चाहिए होगा, ताकि वे खुद गड़बड़ी न करें। और क्या उन अधिकारियों पर भी निगरानी रखने के लिए कोई तीसरा व्यक्ति होगा?
सच्चाई यह है कि हर ट्रेन में न जाने कितने बिना टिकट यात्री सफर करते हैं और रेलवे उन्हें भी नहीं रोक पा रहा। ऐसे में यह नया नियम और बोझ ही साबित होगा। अगर सभी श्रेणी के यात्रियों के लिए 50 किलो की सीमा तय कर दी जाये तो झंझट काफी हद तक कम हो सकता है। साथ ही हर प्लेटफॉर्म पर सीसीटीवी कैमरे लगाकर उन्हें क्लाउड से जोड़ दिया जाये। बेरोजगार लोग इन्हें कहीं से भी देखकर संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी दे सकते हैं।
असल ज़रूरत यह है कि रेलवे बिना टिकट यात्रा रोके और सामान की सीमा एक ही रखे। 40 या 50 किलो। चेकिंग भी समय-समय पर होती रहे। ट्रेनों में नेताओं की सीटों पर तक नोटों की गड्डियां मिली हैं। प्रॊपर चेकिंग हो तो बम, हथियार, विस्फोटक और अवैध सामान रोका जा सकता है। साथ ही सोना, चांदी और नोटों की गड्डियां भी रोकी जानी चाहिए। रेलवे अगर वजन तौलने में जितनी मेहनत और खर्च लगायेगा, उससे कहीं ज्यादा उगाही तो बिना टिकट यात्रियों से जुर्माने में की जा सकती है।
सोचिये, हर यात्री के पास इतना समय कहां होगा कि पहले सामान का वजन करवाये, फिर प्लेटफॉर्म पर भटके और अंततः अपने डिब्बे तक पहुंचे?
देश जब विदेशी निवेश से रेड टेप लगातार हटा रहा है। छह महीने की प्रक्रिया घटाकर तीन दिन से एक हफ्ते में पूरी कर रहा है। नये-नये कानून लाकर व्यापार को सरल बना रहा है, तब रेलवे यात्रियों को उलझाने वाले नये नियम गढ़ रहा है। इससे रेलवे को कितना फायदा होगा, कहना मुश्किल है, पर यात्रियों की मुश्किलें ज़रूर बढ़ेंगी।
रेलवे, रेलवे बोर्ड और सलाहकारों को यदि यह समझ न आये तो देश के युवाओं के कुछ समूहों से राय ली जा सकती है। रेलवे में फैली गैर-जिम्मेदारी, चोरी और कामचोरी पर ही लगाम कस दी जाये तो स्थिति स्वतः सुधर सकती है। यात्रियों की यात्रा सरल और नियमित बनाइये, झंझट नहीं।