वायलिन की तान और कथक की लय में रमा निनाद, 61वें संगीत महोत्सव का भावपूर्ण समापन
आगरा। शास्त्रीय संगीत, नृत्य और साधना की त्रिवेणी में बहता 61वां निनाद संगीत महोत्सव पं. प्रवीण शेवलीकर के वायलिन वादन और डॉ. समीरा कौसर के भावप्रवण कथक नृत्य के साथ भव्य रूप से संपन्न हुआ। तीन पीढ़ियों की गुरु-शिष्य परंपरा, घरानों की समृद्ध विरासत और साधकों की नाद-साधना ने इस महोत्सव को अविस्मरणीय बना दिया।

61वें निनाद महोत्सव के अंतर्गत अंतिम दिन रविवार को अपनी प्रस्तुतियां देते कलाकार।
महोत्सव के द्वितीय दिवस की प्रातःकालीन सभा राजेन्द्र राय डंग जी को समर्पित रही। संगीत कला केन्द्र के साधकों ने नाद वंदना से सत्र का शुभारंभ किया। इसके बाद जयपुर के युवा तबला वादक श्री अकबर हुसैन ने दिल्ली–फर्रूखाबाद घराने की परंपरागत बंदिशों, चांटी, लग्गी-लड़ी, चौपल्ली, तीन धा और घूमर अंग की सधी हुई प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। संवादिनी पर पं. रविन्द्र तलेगांवकर की संगत उल्लेखनीय रही।
सत्र के अगले चरण में वाराणसी की रामरंग परंपरा के प्रतिनिधि कलाकार डॉ. रामशंकर ने राग शुद्ध सारंग, मियां का सारंग, गौड़ सारंग और पटमंजरी में शास्त्रीय गायन प्रस्तुत किया। टप्पा (पं. भोलानाथ भट्ट) और कबीर भजन के माध्यम से उन्होंने राग-रूपांतरण की शास्त्रीय समझ को छात्रों के लिए सरल व बोधगम्य बनाया। सहगायन में शिष्य ईशान घोष तथा तबले पर डॉ. लोकेन्द्र की संगत सराहनीय रही।
समापन सत्र गुरु एम.एल. कौसर जी, संस्थापक प्राचीन कला केन्द्र को समर्पित रहा। संगीत कला केन्द्र के साधकों ने गुरु-गौरव में ग्वालियर घराने की बंदिश “गुरु बिन कैसे गुण गावे” प्रस्तुत की।
सम्मान सत्र में डॉ. शोभा कौसर को रानी सरोज गौरिहार स्मृति कला संरक्षक सम्मान, पं. प्रवीण शेवलीकर को संस्था सर्वोच्च सम्मान—संगीत कला रत्न, सजल कौसर एवं डॉ. अनिल गौतम–श्रीमती शशि गौतम को श्री बनारसी दास खण्डेलवाल स्मृति संगीत कलानुरागी सम्मान और डॉ. समीरा कौसर को श्रीमती सुलभा तलेगांवकर स्मृति संगीत सेवी सम्मान शॉल एवं माल्यार्पण के साथ प्रदान किए गए।
अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वायलिन वादक पं. प्रवीण शेवलीकर ने राग पूरिया धनाश्री में पारंपरिक विस्तार, सुस्पष्ट स्वर-निकास और सधी तैयारी से सभागार को सुरमय किया, तत्पश्चात राग केदार की मध्यलय गत ने आध्यात्मिक अनुभूति रची। तबले पर श्रुतिशील उद्धव और तानपूरे पर गोपाल मिश्रा की संगत ने प्रस्तुति को ऊँचाई दी।
इसके बाद जयपुर घराने की प्रमुख कथक नृत्यांगना डॉ. समीरा कौसर ने नारायण स्तुति से आरंभ कर भाव, पद-संचालन और लयकारी का अनुपम संगम प्रस्तुत किया। गुरु ब्रजमोहन गंगानी (पढ़न्त), महमूद खान (तबला), रमेश परिहार (गायन) और सलीम कुमार (सितार) के सहयोग से प्रस्तुति पूर्णता को पहुंची। अंत में रामधुन के साथ 61वें निनाद संगीत महोत्सव का भावपूर्ण समापन हुआ।
कार्यक्रम अध्यक्ष विजयपाल सिंह ने सभी कलाकारों, गुरुओं, साधकों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
विगत दिवस शुरू हुआ था निनाद महोत्सव
पं. रघुनाथ तलेगांवकर फ़ाउंडेशन ट्रस्ट एवं संगीत कला केन्द्र, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में, प्राचीन कला केन्द्र, चंडीगढ़ और सामुदायिक रेडियो 90.4 (डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय) के सहयोग से आयोजित द्वि-दिवसीय 61वें निनाद महोत्सव का शुभारंभ विगत दिवस शास्त्रीय प्रस्तुतियों के साथ हुआ था। उद्घाटन विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी द्वारा किया गया, साथ ही स्मारिका का विमोचन भी संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का प्रारंभ संगीत कला केन्द्र के साधकों द्वारा पं. रघुनाथ जी की स्वरचित सरस्वती वंदना, विष्णु स्तवन तथा “सुरमई निनाद है आया” से हुआ। प्रथम प्रस्तुति में पुणे से पधारी मेवाती घराने की कलाकार डा. विलीना पात्रा ने राग पूरिया धनाश्री में विलंबित व मध्यलय बंदिशें प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। खनकदार आवाज, स्पष्ट चलन और सधी तानों से मेवाती शैली का प्रभावी निर्वाह हुआ। समापन मांझ खमाज की कजरी और “गोविंद दामोदर माधवेती” से किया गया। संगति में पं. रविन्द्र तलेगांवकर (संवादिनी) और श्रुतिशील उद्धव (तबला) रहे। इस अवसर पर डा. विलीना पात्रा को संगीत कला गौरव सम्मान प्रदान किया गया।
द्वितीय प्रस्तुति में झारखंड से पधारे मैहर घराने के प्रमुख कलाकार केडिया बंधु मोरमुकुट एवं मनोज कुमार ने सरोद-सितार की युगलबंदी प्रस्तुत की। राग चंद्रनन्दन की क्रमबद्ध अवतारणा, आलाप-जोड़-झाला और विलंबित-मध्यलय गत ने श्रोताओं को बांधे रखा। तबले पर अकबर खान की संगति रही। दोनों कलाकारों को पं. केशव जी की स्मृति में संगीत नक्षत्र उपाधि प्रदान की गई।
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