विदेश में हिंदी का परचम फहराने वाली रीता कौशल का आगरा आगम पर सम्मान
आगरा। आगरा की धरती पर जन्मी और विदेश में रहकर हिंदी भाषा-साहित्य का डंका बजाने वाली अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार रीता कौशल का शहर आगमन सम्मान और गौरव का क्षण बन गया। ऑस्ट्रेलिया में दशकों से हिंदी साहित्य की अलख जगा रहीं रीता कौशल को आगरा में ‘करुणेश परिवार’ द्वारा सम्मानित किया गया। उनके समग्र साहित्यिक योगदान- कविता, कहानी, उपन्यास और हिंदी प्रचार को सराहते हुए उन्हें शॉल, माला और साहित्यिक पुस्तकों से सम्मानित किया गया।
करुणेश परिवार ने किया आत्मीय स्वागत और सम्मान
मंगलवार को शमसाबाद रोड स्थित इंदिरापुरम की नीति बाग कॉलोनी में उनकी ससुराल पहुंचकर ‘करुणेश परिवार’ के प्रतिनिधि वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यसेवी आदर्श नंदन गुप्ता तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निराला पुरस्कार से सम्मानित कवि-साहित्यकार कुमार ललित ने रीता कौशल को शॉल, माला और साहित्यिक कृतियां भेंट कर सम्मानित किया।
इस अवसर पर परिवार के सदस्य राजेश कौशल और सपना कौशल भी उपस्थित रहे।
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल चुकी हैं कई बड़ी उपलब्धियां
रीता कौशल, जो मूल रूप से आगरा की निवासी हैं, ने विदेश में रहकर हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा उन्हें पांच लाख रुपये का प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान’ प्रदान किया गया, जो उनकी साहित्यिक साधना की बड़ी पहचान है।
रचनात्मक लेखन में बहुमुखी पहचान
रीता कौशल की साहित्यिक यात्रा बेहद समृद्ध रही है। उनका यात्रा वृतांत ‘दक्षिण से मध्य भारत तक’ भारत सरकार प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशन के लिए स्वीकृत किया जा चुका है। इसके अलावा उनके प्रमुख प्रकाशित कार्यों में अरुणिमा (उपन्यास), रंग बिरंगी बाल कहानियां, चंद्राकांक्षा (काव्य संग्रह) और रजकुसुम (कहानी संग्रह) शामिल हैं, जो पाठकों के बीच विशेष लोकप्रिय हैं।
विदेश में भी हिंदी सेवा का मजबूत आधार
रीता कौशल ने वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की वार्षिक पत्रिका का 2015 से 2020 तक सफल संपादन किया। साथ ही ऑस्ट्रेलियन लोकल गवर्नमेंट में फाइनेंस ऑफिसर के रूप में कार्य करते हुए भी हिंदी सेवा जारी रखी। वे हिंदी सोसाइटी सिंगापुर और डीएवी हिंदी स्कूल सिंगापुर में हिंदी अध्यापन से भी जुड़ी रहीं, जिससे प्रवासी भारतीयों के बीच हिंदी को नई ऊर्जा मिली।