आगरा में बोले शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम- लोकतंत्र में गधा भी प्रधानमंत्री बन सकता है, सनातन के रक्त का शोधन ज़रूरी
आगरा। शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने आगरा में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान सनातन धर्म, लोकतंत्र, सत्ता और संविधान को लेकर तीखे और बेबाक विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतंत्र की व्यवस्था में कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता है और आज सबसे बड़ी आवश्यकता सनातन धर्म के विशाक्त रक्त के शोधन की है।
स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज आगरा में 15 जनवरी को प्रातः 10:30 बजे जयपुर हाउस स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुनर्निर्मित प्रांतीय कार्यालय ‘माधव भवन’ के उद्घाटन लिए आगरा पहुंचे हैं। आज जयपुर हाउस स्थित सुमित ढल के निवास पर आयोजित प्रेस वार्ता में शंकराचार्य ने कहा कि
जो न नूतन है, न पुरातन है, जो सृष्टि के साथ आया है, वही सनातन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन कोई नया विचार नहीं, बल्कि सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा शाश्वत सत्य है।
हिन्दू राष्ट्र के प्रश्न पर तीखी टिप्पणी
भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि जिसे बनाया जाता है, वह पहले होता नहीं। भारत कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं रहा, यह कहना ही गलत है, क्योंकि भारत सदा से सनातन संस्कृति का राष्ट्र रहा है।
उन्होंने कहा कि संविधान कोई स्थायी या अंतिम सत्य नहीं है, वह व्यवस्था का एक साधन मात्र है, जो समय-समय पर बदलता रहा है। हिन्दू राष्ट्र की बात करने वालों की भावना भले ही अच्छी हो, लेकिन कई बार इसके पीछे राष्ट्रप्रेम से अधिक राजनीतिक एजेंडा और सत्ता की लालसा दिखाई देती है।
लोकतंत्र और प्रधानमंत्री पर विवादित बयान
एआईएमआईएम अध्य़क्ष असदुद्दीन ओवैसी के उस कथन पर कि बुर्का पहनकर भी कोई महिला प्रधानमंत्री बन सकती है, शंकराचार्य ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकतंत्र है, गधा भी प्रधानमंत्री बन सकता है। जब ज्यादा पशु इकट्ठे हो जाएंगे तो उन्हीं में से कोई प्रतिनिधि बन जाएगा। मनुष्य भी एक पशु ही है।
सनातन धर्म के ‘विषाक्त रक्त’ का शोधन आवश्यक
हिन्दुओं के संकट में एकजुट होने के प्रश्न पर शंकराचार्य ने कहा कि आज सनातन धर्म का रक्त शुद्ध नहीं रहा, वह विषाक्त हो चुका है। जैसे शरीर में रक्त दूषित होने पर फोड़े-फुंसियां और रोग उत्पन्न होते हैं, वैसे ही समाज में विकृतियां पैदा होती हैं।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्मावलंबियों को गर्व से स्वयं को सनातनी कहना चाहिए। जैन, बौद्ध, सिख सभी उसी परंपरा से निकले हैं। जब तक सनातन के रक्त का शोधन नहीं होगा, तब तक बांग्लादेश जैसी स्थितियां विश्व में बनती रहेंगी।
सत्ता नहीं, संस्कार से होगा समाधान
शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि सनातन धर्म को सत्ता की आवश्यकता नहीं है। सत्ता हमेशा धर्म के सामने झुकती है। सत्ता में दोष ही दोष होते हैं। जो कुर्सी पर बैठता है, वह वोट गिनता है।
सनातन धर्म का शोधन सत्ता से नहीं, बल्कि संस्कार और संगठन से होगा। उन्होंने संघ सहित उन सभी संगठनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया, जो सनातन को संगठित और संस्कारित करने का कार्य कर रहे हैं।
कुर्सी प्रधान देश बनने पर चिंता
उन्होंने कहा कि भारत आज कृषि प्रधान से अधिक कुर्सी प्रधान देश बनता जा रहा है। सत्ता का लोभ आज बहुसंख्यकों में अल्पसंख्यकों से अधिक दिखाई देता है। अल्पसंख्यक अपने संगठनात्मक कार्यों में लगे रहते हैं, जबकि बहुसंख्यक सत्ता और तुष्टीकरण की राजनीति में उलझे हैं।
शंकराचार्य के आगमन पर उनका आरती, पुष्पवर्षा और वेदोच्चारण के साथ भव्य स्वागत किया गया। इस अवसर पर सुमित ढल, संदीप ढल, जलदीप कपूर, विजय सामा, विजय गोयल सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।