‘जाणता राजा’ से मंच पर शिवाजीकाल सजीवः तुलजा भवानी की आराधना और जीजाबाई की प्रेरणा
आगरा। कलाकृति कन्वेंशन सेंटर का मंच रविवार को मराठा स्वराज की भूमि बन गया, जब ऐतिहासिक महानाट्य ‘जाणता राजा’ ने अपनी अद्भुत प्रस्तुति से दर्शकों को शिवाजीकालीन भारत में पहुंचा दिया। दिव्य प्रेम सेवा मिशन के सेवा प्रकल्पों को समर्पित इस महानाट्य के द्वितीय दिवस का मंचन श्रद्धा, शौर्य और संस्कृति का अद्भुत संगम बना। तुलजा भवानी की आराधना से आरंभ होकर जीजाबाई की मातृशक्ति तक, नाटक के हर दृश्य ने दर्शकों को भक्ति, पराक्रम और राष्ट्रप्रेम के भाव से भर दिया।
महानाट्य ‘जाणता राजा’ का मंचन रविवार को भावविभोर कर देने वाला रहा। दृश्यावली, संगीत, प्रकाश और संवादों के सशक्त संयोजन ने ऐसा वातावरण रचा कि दर्शकों को लगा मानो शिवाजी महाराज के स्वराज्य की भूमि उनके सामने सजीव हो उठी हो। नाटक ने न केवल मराठा गौरव का स्मरण कराया, बल्कि राष्ट्र निर्माण, मातृभक्ति और धर्मनिष्ठा की अमर भावना को भी उजागर किया।
कार्यक्रम की शुरुआत तुलजा भवानी माता की पूजा-अर्चना से हुई। मंच पर शिवाजी महाराज की मातृभक्ति और दिव्य आस्था का भव्य चित्रण हुआ। यह दृश्य इस संदेश से ओतप्रोत था कि शिवाजी के जीवन की नींव ‘मातृशक्ति’ और ‘धर्मशक्ति’ पर टिकी थी। इसी क्रम में प्रस्तुत कृष्ण भक्ति के प्रसंगों ने दर्शकों को आध्यात्मिक भाव में डुबो दिया। “तुम हो कृष्ण कन्हाई…” गीत की सुमधुर प्रस्तुति ने वातावरण को भक्ति से परिपूर्ण बना दिया। युद्ध, राजनीति और भक्ति का यह समन्वय नाटक की विशेष पहचान बन गया।
मां जीजाबाई का पात्र नाटक का भावनात्मक केंद्र रहा। उनके माध्यम से दिखाया गया कि शिवाजी महाराज की राष्ट्रनिष्ठा, नीति और संस्कारों की जड़ें उनकी मां की शिक्षाओं में थीं। जीजाबाई के संवादों ने सभागार में श्रद्धा और गर्व दोनों भावों को जागृत किया। मंच पर जब वे पुत्र शिवाजी को धर्म, नीति और मर्यादा का पाठ पढ़ाती हैं, तो दर्शक भावविभोर होकर तालियों से गूंज उठते हैं।
सूत्रधार की भूमिका में प्रस्तुत हुआ महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति का प्रतीक लावणी नृत्य। आकर्षक परिधान, तालबद्ध लय और संगीत ने कार्यक्रम में रंग, ऊर्जा और लोकजीवन की झांकी भर दी। इसी के साथ मंचन के प्रमुख दृश्यों में एक रहा शिवाजी महाराज का स्त्री सम्मान के प्रति दृष्टिकोण। युद्ध में पराजित शत्रु पक्ष की महिलाओं के प्रति आदरभाव दर्शाते हुए उन्होंने यह अमर संदेश दिया कि स्त्री का सम्मान ही सच्चे योद्धा का धर्म है। यह संवाद सभागार में गूंज उठा और आज के समाज के लिए भी प्रेरणा बन गया।
मंचन की भव्यता और दर्शकों की प्रतिक्रिया
कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा हुआ था। मंच पर युद्धभूमि, किले की संरचना, कुआं खुदाई, समुद्री सेना की तैयारी और रणनीतिक दृश्यों ने पूरा शिवाजीकाल जीवंत कर दिया। प्रकाश, ध्वनि, संगीत और संवादों के समन्वय ने हर दृश्य को प्रभावशाली बना दिया। दर्शकों ने कहा कि ऐसा मंचन उन्होंने पहली बार देखा, जिसमें भक्ति, संस्कृति, रणनीति और शौर्य का अनोखा संगम था।
तेजस्विनी नागरे बनीं आदर्श मातृत्व की प्रतीक
जीजाबाई की भूमिका में तेजस्विनी नागरे ने मंच पर मातृत्व का ऐसा स्वरूप प्रस्तुत किया, जिसने हर दर्शक को भावनात्मक कर दिया। उनके अभिनय ने यह सिद्ध किया कि एक मां केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य की निर्माता भी होती है। जीजाबाई के रूप में उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, करुणा और राष्ट्रप्रेम ने सभागार को श्रद्धा से भर दिया।