जन्म दिवस पर विशेषः राजा महेंद्र प्रताप 109 साल पहले आज ही के दिन बने थे भारत की प्रथम अंतरिम सरकार के राष्ट्राध्यक्ष  

109 पहले आज ही का वह दिन था जब एक दिसम्बर 1915 को काबुल में भारत की पहली सरकार अंतरिम सरकार बनी थी। इस अंतरिम सरकार के राष्ट्राध्यक्ष थे राजा महेंद्र प्रताप। एक दिसंबर को ही राजा महेंद्र प्रताप का जन्म दिवस भी है। इसी मौके पर एक आलेख-

Dec 1, 2024 - 10:04
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जन्म दिवस पर विशेषः राजा महेंद्र प्रताप 109 साल पहले आज ही के दिन बने थे भारत की प्रथम अंतरिम सरकार के राष्ट्राध्यक्ष   

चोब सिंह वर्मा, अवकाशप्राप्त आईएएस-

आज (एक दिसम्बर) के दिन 1915 में अफगानिस्तान के काबुल में राजा महेन्द्र प्रताप और उनके क्रांतिकारी सहयोगियों ने भारत के बाहर प्रथम अंतरिम सरकार गठित की थी। यह राजा साहब का जन्मदिन भी था। वे ही इस सरकार के आजीवन या उस समय तक के लिए प्रेसिडेन्ट बनाये गये, जब तक कि भारत में अपनी स्वतंत्र सरकार न बन जाए। मौलाना वर्कतुल्लाह प्रधानमंत्री नियुक्त हुए थे।

अंतरिम सरकार ने अफगानिस्तान सरकार से सीधे सम्पर्क साथा और अपने और अफगानिस्तान के बीच एक सन्धि भी सम्पन्न की। यूरोप,  चीन,  रूस और जापान स्थित अफगानिस्तानी दूतावास इस सरकार के पदाधिकारियों को सुविधायें भी उपलब्ध कराया करते थे।

7 नवम्बर, 1929 को महात्मा गांधी वृंदावन पधारे तो वे राजा साहब द्वारा स्थापित भारत के प्रथम पॉलिटेक्निक प्रेम महाविद्यालय के परिसर में ही ठहरे थे। विद्यालय के प्रांगण में बड़ी सभा आयोजित हुई थी। जब बड़ी संख्या में उपस्थित लोग उत्साह में महात्मा गांधी के स्वागत और सम्मान में जोर-जोर से जय जयकार करने लगे तो महात्मा गांधी ने उन्हें शांत करते हुए कहा था कि "तुम लोग मुझे बड़ा आदमी उद्घोषित कर रहे हो लेकिन राजा महेन्द्र प्रताप तो मुझसे भी बड़े हैं।"

उन दिनों राजा साहब विदेशी भूमि पर रहकर भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। गांधी जी ने उस अवसर पर राजा महेन्द्र प्रताप की पोर्ट्रेट का अनावरण करते हुए उनके व्यक्तित्व व कृतित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। छात्रों व जमींदारों से उनके त्याग व देश-प्रेम में किये जा रहे संघर्षों का अनुकरण करने की अपील भी की थी।

प्रेम महाविद्यालय पॉलिटेक्निक की स्थापना की बुनियाद की पहली ईंट 1909 में राजा साहब ने पंडित मदनमोहन मालवीय से रखवायी थी। उन्होंने औद्योगिक रूप से उन्नत यूरोपीय देशों की तमाम औद्योगिक इकाईयों का दो बार दौरा कर बारीकी से उनकी तकनीकी को समझा तथा अपने देश के नौजवानों को तकनीकी ज्ञान देकर इस योग्य बनाने का संकल्प लिया, जिससे वे स्वरोजगार करने लायक हो जाएं और राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनें।

इस महाविद्यालय के स्थापना के पांच साल बाद ही राजा साहब भारत छोड़कर अगले 32 साल विदेशी भूमि पर रहकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाते रहे। इस बीच इस महाविद्यालय के प्राचार्यों व अध्यापकों की नियुक्ति में महात्मा गांधी ने भी जिम्मेदारी निभायी थी। उन्होंने बनारस के खादी ग्रामोद्योग के संचालक जे.बी. कृपलानी से वहां कार्यरत आचार्य जुगल किशोर को अवमुक्त कर वृंदावन स्थित प्रेम महाविद्यालय पॉलिटेक्निक के प्राचार्य पद पर ज्वाईंन करने का इंतजाम किया था।

ज्ञातव्य है कि आचार्य जुगल किशोर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बने यूपी के पहले मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने। बाद में लखनऊ तथा कानपुर विश्वविद्यालयों के उप-कुलपति पद भी सुशोभित किये थे।

यह महाविद्यालय तकनीकी शिक्षा का भारतभर में विख्यात केन्द्र तो था ही, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का प्रेरणा स्थल व प्रशिक्षण केन्द्र भी था। इसके ट्रस्टी नामी गिरामी कानूनवेत्ता तेज बहादूर सप्रू भी रहे थे। सम्पूर्णानंद भी इसके प्राचार्य रहे थे जो बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा राजस्थान के गवर्नर रहे थे। 1932 से 1937 तक इन्हीं क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण इस महाविद्यालय को नाराज होकर ब्रिटिश सरकार ने बन्द कर दिया था।

उत्तर प्रदेश में अंतरिम सरकार बनने पर गोविन्द वल्लभ पंत व कैलाश नाथ काटजू के प्रयासों से इसे पुनः संचालित कराया गया था। जिन विशिष्ट महानुभावों ने राजा साहच की अनुपस्थिति में प्रेम महाविद्यालय का भ्रमण किया। उनके अभिमत भी टंकित हैं।

महात्मा गांधी और राजा महेन्द्र प्रताप के बीच तीन दशक से ज्यादा समय तक सैकड़ों पत्रों का आदान-प्रदान हुआ था। ये पत्र राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं। इन पत्रों से इन दोनों महान हस्तियों के बीच आजादी की लड़ाई के तरीकों के मतभेद होने के बावजूद अद्भुत आपसी सम्मान व विश्वास झलकता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राजा महेन्द्र प्रताप जापान के टोक्यो शहर में ठहरे हुए ये। 6 व 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने नागासाकी व हिरोशिमा नगरों को परमाणु बमों के हमलों से ध्वस्त कर दिया था। जापान सरकार ने सरेन्डर कर दिया। पराजित सरकार ने 15.09.1945 को राजा साहब को अमेरिकी ऑथोरिटीज को हैण्ड-ओवर कर दिया।

गहन पूछताछ के बाद उन्हें अमेरिकन ऑथोरिटीज द्वारा ब्रिटिश नुमाइन्दों को सौंपा जाना था। पहले यह घोषणा हुई कि ब्रिटिश सरकार राजा महेन्द्र प्रताप को किसी भी वीजा व पासपोर्ट पर भारत वापस भेजने के मूड में नहीं है। तभी महात्मा गांधी ने अपनी विदेश मामलों की सचिव राजकुमारी अमृत कौर से रेडक्रॊस सोसाइटी को सम्बोधित कई पत्र भेजकर उन्हें सुरक्षित भारत बुलाने की कोशिश की थी।

SP_Singh AURGURU Editor