वेदों का प्रकाश घर-घर फैलेः दयानन्द सरस्वती के आदर्शों से गूंजा आर्य समाज मंदिर का वार्षिकोत्सव
आगरा। स्वदेश, स्वभाषा और स्वसंस्कृति के गौरव का भाव जगाने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार आज भी समाज में प्रखर रूप से प्रासंगिक हैं। इसी संदेश को आत्मसात करते हुए जयपुर हाउस स्थित आर्य समाज मंदिर में नाई की मंडी शाखा के तीन दिवसीय 65वें वार्षिकोत्सव का रविवार को वैदिक अनुष्ठानों, प्रवचनों और भजनोपदेश से भव्य समापन हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वैदिक प्रवक्ता आचार्य स्वदेश (मथुरा) ने कहा कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हमें स्वदेश, स्वभाषा, स्वधर्म और स्वसंस्कृति पर गर्व करना सिखाया। वीर सावरकर और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा। हमें उनके संदेश को घर-घर पहुंचाना होगा ताकि हर व्यक्ति वेदज्ञान से जुड़ सके।
वेद प्रवक्ता डॉ. प्रशांत ने कहा कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला का अमूल्य स्रोत है। यह व्यक्ति, परिवार और समाज, तीनों के संतुलन का ज्ञान देता है। महर्षि दयानन्द ने वेद का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना परमधर्म बताया था क्योंकि वेद ही मानव निर्माण की सर्वोत्तम शिक्षा देता है।
भजनोपदेशक कंचन कुमार ने अपने सुमधुर भजनों के माध्यम से आर्य समाज के सिद्धांतों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सही मार्गदर्शन और वैदिक जीवन शैली से ही समाज की दिशा सुधर सकती है। आज के समय में भौतिकता के बीच वैदिक संस्कृति ही मनुष्य को पुनः अपने मूल से जोड़ने का माध्यम है।
कार्यक्रम के प्रधान सीए मनोज खुराना ने बताया कि वार्षिकोत्सव के अवसर पर 11 कुण्डीय वैदिक यज्ञ, प्रवचन और संगीतमय भजनों का आयोजन हुआ। इसमें बड़ी संख्या में आर्यजन और श्रद्धालु सम्मिलित हुए। समापन अवसर पर आर्य केंद्रीय सभा के गठन की घोषणा की गई तथा जनवरी में मंडलीय आर्य महासम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया।
संचालन अश्वनी आर्य ने किया। इस अवसर पर मंत्री अनुज आर्य, कोषाध्यक्ष विकास आर्य, भारत भूषण सामा, प्रदीप कुलश्रेष्ठ, सुभाष अग्रवाल, राजीव दीक्षित, विजय अग्रवाल, वीरेंद्र कनवर, प्रदीप डेंबला, राकेश तिवारी, अश्वनी डेंबला, अरविंद मेहता, सुधाकर गुप्ता, संगीता खुराना, मालती अरोड़ा, वंदना आर्या, सुमन कुलश्रेष्ठ आदि उपस्थित रहे।