सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल: कैशलेस इलाज की लिमिट क्यों, बीमा पर असली ज़िम्मेदारी कब?
नई दिल्ली। सड़क दुर्घटना पीड़ितों को कैशलेस इलाज की सुविधा सुनिश्चित करने को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में गंभीर बहस हुई। बीमा कंपनियों की देयता और सड़क परिवहन मंत्रालय की सीमित योजना को लेकर शीर्ष अदालत ने कड़े सवाल उठाए हैं। 1.5 लाख रुपये और 7 दिनों के इलाज की सीमा पर कोर्ट ने आश्चर्य जताया और पूछा कि सड़क दुर्घटना पीड़ित की स्थिति में ऐसी सीमाएं कैसे न्यायसंगत हो सकती हैं।
यह मामला, जो हेमंत जैन द्वारा दायर याचिका पर आधारित है और आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है, सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों के लिए चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधार की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को रोड एक्सीडेंट पीड़ितों के कैशलेस इलाज को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत की दो जजों की खंडपीठ, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा बनाई गई योजना के प्रावधान पर सवाल उठाए।
ध्यान देने योग्य है कि धारा 162 के तहत इस योजना में 1,50,000 रुपये की उपचार सीमा और केवल 7 दिनों की अवधि निर्धारित की गई है। कोर्ट ने पूछा कि गंभीर दुर्घटना और गहन उपचार की स्थिति में यह सीमा कैसे व्यवहारिक है, जबकि हजारों जानें हर साल समय पर इलाज न मिलने के कारण चली जाती हैं।
अधिवक्ता केसी जैन ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 162(1) बीमा कंपनियों को दुर्घटना पीड़ितों को तात्कालिक उपचार प्रदान करने के लिए बाध्य करती है। यह सुविधा बिना वित्तीय सीमा होनी चाहिए, क्योंकि धारा 147 में कंपनियों की देयता अनलिमिटेड है। इस प्रकार सीमित कैशलेस इलाज योजना न केवल कानून की भावना के विपरीत है, बल्कि पीड़ितों के साथ अन्याय भी है।
याचिका के अनुसार यदि कैशलेस, बिना सीमा की इलाज प्रणाली को लागू किया जाता है, तो इससे हर साल सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लगभग 3 लाख लोगों को राहत मिलने की संभावना है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 20 नवंबर (गैर-मिसलेनियस दिवस) के लिए सूचीबद्ध की है।