स्वामी श्रद्धानंद ने आगरा से की थी शुद्धि आंदोलन की शुरुआत, गुरुकुल शिक्षा ही सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार

आगरा। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने अपने ऐतिहासिक शुद्धि आंदोलन की शुरुआत आगरा की धरती से की थी, जिसने आगे चलकर देशभर में हिंदू समाज में घर वापसी का व्यापक अभियान खड़ा किया। आगरा आर्यसमाज की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है और यह नगर सामाजिक–सांस्कृतिक आंदोलनों की सशक्त भूमि रहा है। यह विचार सार्वदेशिक युवक परिषद के अध्यक्ष स्वामी आदित्यवेश ने व्यक्त किए।

Dec 25, 2025 - 21:03
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स्वामी श्रद्धानंद ने आगरा से की थी शुद्धि आंदोलन की शुरुआत, गुरुकुल शिक्षा ही सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार
आगरा के विजय क्लब में गुरुवार को स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान दिवस और स्व. धर्मपाल विद्यार्थी की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते स्वामी आदित्यवेश। मंचस्थ हैं डॊ. केएस राना एवं अन्य अतिथिगण।

वे सरोजदेवी धर्मपाल विद्यार्थी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा विजय क्लब में आयोजित प्रेरणा दिवस कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यह आयोजन गुरुकुलीय शिक्षा के पुनरोद्धारक, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार) के संस्थापक, आर्यसमाज के महान संत स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती के 99वें बलिदान दिवस तथा आर्यसमाज के उन्नायक समाजसेवी स्व. धर्मपाल विद्यार्थी की 110वीं जयंती के अवसर पर किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत ‘गुरुकुलीय शिक्षा आज के संदर्भ में’ विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें देश के प्रतिष्ठित आर्य विद्वानों ने विचार रखे।

स्वामी आदित्यवेश ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती के संपर्क में आते ही स्वामी श्रद्धानंद का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित हो गया। उन्होंने अनुभव किया कि तत्कालीन मैकाले की शिक्षा पद्धति से भारतीय समाज का कल्याण संभव नहीं है। इसी सोच के साथ उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना कर भारतीय गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित किया। उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीयों को वेशभूषा में भारतीय, लेकिन मानसिकता में पश्चिमी बनाना था, जबकि गुरुकुल शिक्षा चरित्र, संस्कार और राष्ट्रबोध का निर्माण करती है। स्वामी श्रद्धानंद ने जाति बंधनों को तोड़ते हुए समाज में जागृति का कार्य किया और अनेक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया।

वेदों की अंतरराष्ट्रीय विद्वान एवं गुरुकुल शिवगंज (राजस्थान) की आचार्या सूर्या देवी ने कहा कि आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने महिलाओं के लिए भी वेद अध्ययन के द्वार खोले। आज के युग में आर्ष गुरुकुल शिक्षा की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। गुरुकुल की शिक्षा का उद्देश्य बालक–बालिकाओं को समग्र जीवन दर्शन से जोड़ना है, जो जीवनभर साधना और संस्कार देता है।

आर्ष गुरुकुल एवं गौशाला, मथुरा के अधिष्ठाता स्वामी विश्वानंद ने कहा कि महर्षि दयानंद ने वेदों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाकर अज्ञानता का अंधकार दूर किया। स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना कर शिक्षा की इस आवश्यकता को पूरा किया। उन्होंने कहा कि गुरुकुलीय शिक्षा से शिक्षा और चिकित्सा के नाम पर हो रही धन की लूट पर रोक लगेगी। बाबा रामदेव इसका जीवंत उदाहरण हैं, जिन्होंने गुरुकुल की शिक्षा से विश्वभर में योग का संदेश दिया।

कई विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे शिक्षाविद डॉ. के. एस. राना ने कहा कि आर्य समाज आंदोलन को आगे बढ़ाने में स्वामी श्रद्धानंद का योगदान अतुलनीय है। यदि उनका बलिदान न हुआ होता तो मध्यभारत में आर्य समाज का प्रभाव और भी व्यापक होता।

कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सुल्तानपुर के निदेशक डॉ. राजीव उपाध्याय ने कहा कि समाज को अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरुकुलों को सुविधासंपन्न बनाना चाहिए, ताकि वहां के विद्यार्थी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर सकें और साथ ही संस्कृत, कंप्यूटर तथा अंग्रेजी का भी ज्ञान अर्जित करें।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. वीरेंद्र खंडेलवाल ने की। उन्होंने स्व. धर्मपाल विद्यार्थी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए आर्य समाज के माध्यम से किए गए उनके सेवा कार्यों को स्मरण किया। संचालन रमाकांत सारस्वत ने किया, जबकि रामसखी विद्यार्थी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में डॉ. अनुराधा माहेश्वरी, अरविंद मेहता सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

वेद मंत्रोच्चारण और भक्ति संगीत से गूंजा सभागार

कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच यज्ञ से हुआ, जिसमें गुरुकुल की छात्राओं एवं स्व. धर्मपाल विद्यार्थी के परिवार के सदस्यों ने भाग लिया। गुरुकुल की छात्राओं ने भजन प्रस्तुत किया।
चारों वेदों की प्रकांड विदुषी सूर्या देवी अपनी शिष्याओं के साथ कार्यक्रम में उपस्थित रहीं। उन्होंने उस मिथक को तोड़ा कि महिलाएं वेद ज्ञानी नहीं बन सकतीं। श्रुत परंपरा के माध्यम से वे गुरुकुल में शिष्याओं को वेद कंठस्थ करा रही हैं। उनकी शिष्या तनु, जिनके 20,000 वेद मंत्र कंठस्थ हैं, का विशेष रूप से सम्मान किया गया।

SP_Singh AURGURU Editor