ताज की पीली होती चमक: आधी सदी की चेतावनियों को अनसुना करने का जुर्म

डॉ. वरदराजन कमेटी ने 50 साल पहले ताजमहल को रिफाइनरी के धुएं, पेड़ों की कटाई, यमुना प्रदूषण और औद्योगिक ज़हर से बचाने के उपाय सुझाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हें माना, पर सरकारों और स्थानीय प्रशासन ने अमल नहीं किया। हरी पट्टी, यमुना की सफाई, प्रदूषण नियंत्रण सब वादे ही रह गए। नतीजा, ताज की चमक फीकी पड़ रही है और उसकी सुरक्षा केवल कागज़ों में सीमित है।

Sep 20, 2025 - 13:42
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ताज की पीली होती चमक: आधी सदी की चेतावनियों को अनसुना करने का जुर्म

-बृज खंडेलवाल-

लगभग पचास साल पहले डॉ. एस. वरदराजन कमेटी ने चेतावनी दी थी कि अगर हालात नहीं सुधरे तो ताजमहल खतरे में आ जाएगा। उस कमेटी ने साफ़ कहा था – रिफ़ाइनरी का धुआँ, कारख़ानों का ज़हर, यमुना की गंदगी और पेड़ों की कटाई ताज को बरबाद कर देगी। उसने एक नक्शा दिया था: ताज और पूरे ट्रेपेज़ियम ज़ोन को बचाने का। बीस करीब सिफारिशें की थीं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने माना और अनुपालन के निर्देश दिए। इस कमेटी ने पहले 1978 में, बाद में 1995 में विस्तृत रिपोर्ट्स शीर्ष अदालत में पेश की थीं और सभी सिफारिशों को स्वीकार किया गया था। लेकिन शायद टीटीजेड चेयरमैन ने, नहीं स्थानीय प्रशासकों ने ये रिपोर्ट्स पढ़ी हैं। प्रश्न है कि  हमने उस नक्शे, रिपोर्ट्स के साथ क्या किया? उन्हें अलमारी में धूल खाने के लिए छोड़ दिया।

हरित पट्टी का धोखा

कमेटी ने मथुरा रिफ़ाइनरी और पूरे क्षेत्र में हरी पट्टी बनाने का सुझाव दिया था। हुकूमत ने बड़े-बड़े एलान किए – “वन महोत्सव,” “पौधारोपण अभियान।” हक़ीक़त में, आगरा, मथुरा, वृंदावन में पेड़ काटे जा रहे हैं। पुराने बरगद, नीम, पीपल उजाड़ दिए गए। मॉल, कॉलोनियां और नकली पौधे ही नज़र आते हैं। “हरी ढाल” आज एक सुनसान बंजर ज़मीन बन चुकी है। लेटेस्ट केस शाह जहां गार्डन का है। मथुरा में पद कटे, वृंदावन में डालमिया फार्म का मुद्दा ताजा है।

प्रदूषण का नया नाम

कारख़ाने बंद कराए गए, मगर हवा की गंदगी (SPM) आज भी ख़तरनाक है। वजह? गाड़ियाँ, कंस्ट्रक्शन की धूल, कूड़ा जलाना और ग़ैरक़ानूनी भट्ठे। छोटे उद्योग बलि का बकरा बनाए गए, असली अपराधी बच निकले। और जो TTZ अथॉरिटी बनी, वो सिर्फ़ काग़ज़ी शेर है। उसके पास न ताक़त है, न पैसे। ज़िला अफ़सर तो उसकी परवाह भी नहीं करते। यह लापरवाही नहीं, यह तो जानबूझ कर किया गया धोखा है।

यमुना: बहता नाला

ताज कभी यमुना के साफ़ पानी में अपना अक्स देखता था। आज वो सीवेज और झाग में घूर रहा है। करोड़ों रुपयों के “यमुना एक्शन प्लान” डूब गए, मगर आगरा की यमुना आज मरी हुई नदी है। सरकारें गंगा का नाम जपती हैं, मगर ब्रज मंडल की पावन लाइफ लाइन यमुना को उन्होंने क्रूरता से मार दिया है।

मथुरा रिफ़ाइनरी: अधूरी मरम्मत

कमेटी ने साफ़ कहा था – नई टेक्नोलॉजी, साफ़ ईंधन और हरी पट्टी चाहिए। कुछ सुधार हुए, मगर रिफ़ाइनरी की हरित पट्टी? वह वादा अभी पूरा होना बाकी है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 किलोमीटर हरित पट्टी का आदेश दिया हुआ है।

ताजमहल: एक शर्मनाक मंजर

ताज की संगमरमर की चमक पीली पड़ रही है। सतह पर बार बार हरे कीड़े पनपते हैं। विदेशी एक्सपर्ट  कहते हैं: अगर माहौल ऐसा ही रहा, तो ताज की चमक फीकी पड़ जाएगी। मगर हुकूमत ताज को सिर्फ़ टूरिस्ट ATM समझती है – टिकट बेचो, फोटो खिंचवाओ, और असलियत छुपाओ।

ज़िम्मेदार कौन?

भारत सरकार – जिसने वरदराजन कमेटी की सिफ़ारिशों को मज़ाक बना दिया। सुप्रीम कोर्ट और TTZ अथॉरिटी – जिन्होंने क़ानून लागू नहीं कराया।

स्थानीय हुक़ूमतें – आगरा, मथुरा, फ़िरोज़ाबाद, भरतपुर – जिन्होंने पेड़ कटने, ग़ैरक़ानूनी भट्ठियां, पैठे के कारखाने, टेनिस, चांदी, इलेक्ट्रो plating, कपड़े रंगाई, और कचरा फेंकने पर आँख मूँद ली है।

सियासी लीडर – जो ताज के सामने फ़ोटो खिंचवाते हैं, लेकिन उसकी हिफ़ाज़त के लिए एक क़दम भी नहीं उठाते।

कब तक हम खुद से झूठ बोलते रहेंगे? ताजमहल को अब न नई कमेटी चाहिए, न नया ड्रामा। उसे चाहिए सियासी हिम्मत और सख़्त कार्रवाई। वरना ताज गिरेगा – सदियों बाद नहीं, बल्कि चंद दशकों में।

अभी तक न वाहनों की संख्या नियंत्रित है, न अनधिकृत निर्माण गतिविधियों पर कोई प्रभावी रोक लगी है। यमुना बेसिन की तमाम नदियां, कैनाल सिस्टम, तालाब, पवित्र कुंड, धार्मिक वृक्ष और वन, घाट, सब पर काम होना है। बृज तीर्थ विकास बोर्ड टीटीजेड ऑथोरिटी से भी ऊपर एक सुपर स्ट्रक्चर खड़ा हो गया है जो सिर्फ निर्माण के कार्यों को महत्व देता है, ब्रज के मौलिक, पौराणिक स्वरूप को पुनर्स्थापित करने में किसी को दिलचस्पी नहीं है।

डॉ. वरदराजन ने 1970 के दशक में ख़तरे की घंटी बजा दी थी। हमने अनसुनी की। आज भी कर रहे हैं। अगर ताज डूब गया, तो यह हादसा नहीं होगा, बल्कि भारतीय हुकूमत का किया हुआ एक जुर्म होगा – अपनी विरासत, अपने माहौल, और अपनी आने वाली नस्लों के ख़िलाफ़।

SP_Singh AURGURU Editor