नीतीश की दीर्घकालिक नीतियों से औंधे मुंह गिरे तेजस्वी

पटना। तेजस्वी यादव औंधे मुंह गिरे। मानसिकता, नेतृत्व की नासमझी, बुजुर्ग मतदाताओं को समझने और मनाने में असफलता, अपनी पार्टी की समस्याओं की अनदेखी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सिपहसालारों—संजय कुमार झा, ललन सिंह और अशोक चौधरी—पर पार्टी हरण का मिथ्या आरोप। इसके साथ ही अंतिम समय में हर परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की हवा-हवाई घोषणा, बिहार में अपराध को बढ़ावा देने वाली उनकी प्रचार सामग्री, महागठबंधन के विभिन्न घटक दलों के बीच समन्वय का अभाव, महिलाओं को विश्वास में लेने में विफलता और सबसे बड़ा कारण—नीतीश कुमार को मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम बताकर उनका मज़ाक उड़ाना आदि मुख्य कारण रहे।

Nov 14, 2025 - 18:56
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नीतीश की दीर्घकालिक नीतियों से औंधे मुंह गिरे तेजस्वी


आलोक नंदन शर्मा

चुनाव को लेकर आरजेडी की रणनीति शुरुआत से ही गलत थी। तेजस्वी यादव लगातार संजय कुमार झा, ललन सिंह और अशोक चौधरी पर हमला कर रहे थे, यह कहते हुए कि ये लोग जदयू का नाश कर देंगे क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ है, नीतीश कुमार को पूरी तरह से इन लोगों ने कब्जे में ले रखा है।

बिहार को आप कितना भी पिछड़ा कह लें, वह बुजुर्गों का अपमान करने वालों को पसंद नहीं करता। एक ओर तेजस्वी लालू यादव को अपने राजनीतिक गुरु के रूप में पेश कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार के स्वास्थ्य पर निम्नस्तरीय बयान दे रहे थे। उनकी टीम के किसी सदस्य ने उन्हें रोकने की जरूरत नहीं समझी, जिससे उनका आत्मविश्वास और बढ़ता गया और नीतीश कुमार के प्रति बदतमीजी भी बढ़ती गई। आरजेडी का स्थापित चाल-चलन और चेहरा इनमें झलकता रहा, जिससे बिहार की जनता पहले ही भयभीत थी।

एक स्पष्ट रणनीति के तहत जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा और उनकी टीम ने नीतीश कुमार के प्रति तेजस्वी की मर्यादाहीन बयानबाजी का जवाब नहीं दिया। इस मुद्दे को पूरी तरह बिहार की अवाम पर छोड़ दिया। नतीजा सामने है—बिहार की जनता ने भतीजे को बोलने लायक भी नहीं छोड़ा।
आरजेडी की पारंपरिक ताकत यादव और मुसलमान रहे हैं। बिना चुनाव लड़े वीआईपी के सुप्रीमो मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का उम्मीदवार घोषित करना, आरजेडी के प्रति वर्षों से वफादार मुसलमानों को भी रास नहीं आया। सीमांचल में उनका रुझान ओवैसी की ओर झुका, जबकि अन्य क्षेत्रों में बीजेपी को छोड़ एनडीए के अन्य दलों के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान बेहतर विकल्प माना गया।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सबसे बड़ी विशेषता, बड़ी संख्या में महिलाओं का मतदान के लिए घरों से निकलना रहा। 2005 में पहली बार सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के उत्थान के लिए कई दीर्घकालिक महिला–केंद्रित नीतियां अपनाईं। इसकी शुरुआत साइकिल और पोशाक योजना से हुई, जो आगे चलकर पंचायती राज और सरकारी नौकरियों में क्रमशः 50% और 33% आरक्षण तक विस्तारित हुई। इन नीतियों ने एक साइलेंट लेकिन मजबूत वोट बैंक तैयार किया।
2025 में यह फसल पूरी तरह लहलहा उठी। बिहार की जातीय आधारित राजनीति का पूरा व्याकरण बदल गया। जातिऔर धर्म से ऊपर उठकर महिलाओं ने सुरक्षा, सम्मान, आर्थिक समृद्धि और अपने उत्थान को चुना। तेजस्वी यादव और उनकी टीम इस बदलाव को भांपने में असफल रहे कि नीतीश कुमार की दीर्घकालिक नीतियां बिहार के चुनावी ढांचे को पूरी तरह बदल चुकी हैं।
इसी क्रम में चुनाव से ठीक पहले घरेलू उपभोक्ताओं को 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ मिला—जो घरेलू बजट संभालने वाली महिलाओं के लिए बड़ा राहतकारी कदम था। साथ ही प्रत्येक महिला को रोजगार के लिए 10 हजार रुपये देने की योजना शुरू की गई थी, जिससे बड़ी संख्या में महिलाएं लाभान्वित हुईं। चुनाव आयोग के निर्देश पर इसे रोकना पड़ा, लेकिन संदेश साफ था—फिर सरकार बनी तो यह योजना 10 हजार से बढ़कर 2 लाख रुपये तक पहुंचेगी। इसका प्रभाव दिखा—पहले चरण में 64% और दूसरे चरण में 70% मतदान दर्ज हुआ। महिलाओं ने घंटों कतार में खड़े होकर तीर चलाने में कोई कंजूसी नहीं की।

तेजस्वी यादव और उनकी टीम जहां तरह-तरह के लालच देकर महिलाओं को रिझाने की कोशिश कर रहे थे, वहीं नीतीश कुमार ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे थे, यह बताते हुए कि 2005 के पहले बिहार में क्या स्थिति थी और बाद में कितने काम हुए। मीडिया से वे सीधे मुखातिब नहीं थे। मीडिया प्रबंधन की जिम्मेदारी संजय कुमार झा के कंधों पर थी। उन्होंने मीडिया से बातचीत में केवल विकास पर बात की—और 2025 से 2030 के बीच बिहार में होने वाली औद्योगिक क्रांति का रोडमैप समझाया। युवाओं के लिए उन्होंने संदेश दिया कि आने वाले वर्षों में सरकारी नौकरी और रोजगार—दोनों क्षेत्रों में अभूतपूर्व काम होंगे। बस, विकास की रफ्तार को मोड़ने नहीं देना है।
जनता के फैसले में कोई भ्रम नहीं है। नेपाल की तरह जन-जी क्रांति के लिए उकसाने वालों को बिहार ने पूरी तरह नकार दिया। बिहार की जनता ने सकारात्मक वोट दिया है—विकास, बेहतरी, शिक्षा, रोजगार, पलायन पर रोक और बिहार के लोगों की पुनर्वापसी के लिए। और सबसे महत्वपूर्ण—बिहार में एक बड़ी औद्योगिक क्रांति के लिए, जिसकी बिहार को आज अत्यंत आवश्यकता है। नीतियां से औंधे मुंह गिरे तेजस्वी


तेजस्वी यादव औंधे मुंह गिरे। मानसिकता, नेतृत्व की नासमझी, बुजुर्ग मतदाताओं को समझने और मनाने में असफलता, अपनी पार्टी की समस्याओं की अनदेखी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सिपहसालारों—संजय कुमार झा, ललन सिंह और अशोक चौधरी—पर पार्टी हरण का मिथ्या आरोप। इसके साथ ही अंतिम समय में हर परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की हवा-हवाई घोषणा, बिहार में अपराध को बढ़ावा देने वाली उनकी प्रचार सामग्री, महागठबंधन के विभिन्न घटक दलों के बीच समन्वय का अभाव, महिलाओं को विश्वास में लेने में विफलता और सबसे बड़ा कारण—नीतीश कुमार को मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम बताकर उनका मज़ाक उड़ाना आदि मुख्य कारण रहे।

चुनाव को लेकर आरजेडी की रणनीति शुरुआत से ही गलत थी। तेजस्वी यादव लगातार संजय कुमार झा, ललन सिंह और अशोक चौधरी पर हमला कर रहे थे, यह कहते हुए कि ये लोग जदयू का नाश कर देंगे क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ है, नीतीश कुमार को पूरी तरह से इन लोगों ने कब्जे में ले रखा है।

बिहार को आप कितना भी पिछड़ा कह लें, वह बुजुर्गों का अपमान करने वालों को पसंद नहीं करता। एक ओर तेजस्वी लालू यादव को अपने राजनीतिक गुरु के रूप में पेश कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार के स्वास्थ्य पर निम्नस्तरीय बयान दे रहे थे। उनकी टीम के किसी सदस्य ने उन्हें रोकने की जरूरत नहीं समझी, जिससे उनका आत्मविश्वास और बढ़ता गया और नीतीश कुमार के प्रति बदतमीजी भी बढ़ती गई। आरजेडी का स्थापित चाल-चलन और चेहरा इनमें झलकता रहा, जिससे बिहार की जनता पहले ही भयभीत थी।

एक स्पष्ट रणनीति के तहत जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा और उनकी टीम ने नीतीश कुमार के प्रति तेजस्वी की मर्यादाहीन बयानबाजी का जवाब नहीं दिया। इस मुद्दे को पूरी तरह बिहार की अवाम पर छोड़ दिया। नतीजा सामने है—बिहार की जनता ने बदतमीज भतीजे को बोलने लायक भी नहीं छोड़ा।
आरजेडी की पारंपरिक ताकत यादव और मुसलमान रहे हैं। बिना चुनाव लड़े वीआईपी के सुप्रीमो मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का उम्मीदवार घोषित करना, आरजेडी के प्रति वर्षों से वफादार मुसलमानों को भी रास नहीं आया। सीमांचल में उनका रुझान ओवैसी की ओर झुका, जबकि अन्य क्षेत्रों में बीजेपी को छोड़ एनडीए के अन्य दलों के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान बेहतर विकल्प माना गया।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सबसे बड़ी विशेषता, बड़ी संख्या में महिलाओं का मतदान के लिए घरों से निकलना रहा। 2005 में पहली बार सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के उत्थान के लिए कई दीर्घकालिक महिला–केंद्रित नीतियां अपनाईं। इसकी शुरुआत साइकिल और पोशाक योजना से हुई, जो आगे चलकर पंचायती राज और सरकारी नौकरियों में क्रमशः 50% और 33% आरक्षण तक विस्तारित हुई। इन नीतियों ने एक साइलेंट लेकिन मजबूत वोट बैंक तैयार किया।
2025 में यह फसल पूरी तरह लहलहा उठी। बिहार की जातीय आधारित राजनीति का पूरा व्याकरण बदल गया। जाति और धर्म से ऊपर उठकर महिलाओं ने सुरक्षा, सम्मान, आर्थिक समृद्धि और अपने उत्थान को चुना। तेजस्वी यादव और उनकी टीम इस बदलाव को भांपने में असफल रहे कि नीतीश कुमार की दीर्घकालिक नीतियां बिहार के चुनावी ढांचे को पूरी तरह बदल चुकी हैं।
इसी क्रम में चुनाव से ठीक पहले घरेलू उपभोक्ताओं को 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ मिला—जो घरेलू बजट संभालने वाली महिलाओं के लिए बड़ा राहतकारी कदम था। साथ ही प्रत्येक महिला को रोजगार के लिए 10 हजार रुपये देने की योजना शुरू की गई थी, जिससे बड़ी संख्या में महिलाएं लाभान्वित हुईं। चुनाव आयोग के निर्देश पर इसे रोकना पड़ा, लेकिन संदेश साफ था—फिर सरकार बनी तो यह योजना 10 हजार से बढ़कर 2 लाख रुपये तक पहुंचेगी। इसका प्रभाव दिखा—पहले चरण में 64% और दूसरे चरण में 70% मतदान दर्ज हुआ। महिलाओं ने घंटों कतार में खड़े होकर तीर चलाने में कोई कंजूसी नहीं की।

तेजस्वी यादव और उनकी टीम जहां तरह-तरह के लालच देकर महिलाओं को रिझाने की कोशिश कर रहे थे, वहीं नीतीश कुमार ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे थे, यह बताते हुए कि 2005 के पहले बिहार में क्या स्थिति थी और बाद में कितने काम हुए। मीडिया से वे सीधे मुखातिब नहीं थे। मीडिया प्रबंधन की जिम्मेदारी संजय कुमार झा के कंधों पर थी। उन्होंने मीडिया से बातचीत में केवल विकास पर बात की—और 2025 से 2030 के बीच बिहार में होने वाली औद्योगिक क्रांति का रोडमैप समझाया। युवाओं के लिए उन्होंने संदेश दिया कि आने वाले वर्षों में सरकारी नौकरी और रोजगार—दोनों क्षेत्रों में अभूतपूर्व काम होंगे। बस, विकास की रफ्तार को मोड़ने नहीं देना है।
जनता के फैसले में कोई भ्रम नहीं है। नेपाल की तरह जन-जी क्रांति के लिए उकसाने वालों को बिहार ने पूरी तरह नकार दिया। बिहार की जनता ने सकारात्मक वोट दिया है—विकास, बेहतरी, शिक्षा, रोजगार, पलायन पर रोक और बिहार के लोगों की पुनर्वापसी के लिए। और सबसे महत्वपूर्ण—बिहार में एक बड़ी औद्योगिक क्रांति के लिए, जिसकी बिहार को आज अत्यंत आवश्यकता है।---- लेखक वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार हैं और बिहार की राजनीति के विशेषज्ञ हैं। वह दैनिक जागरण और अमर उजाला में लंबे समय तक संपादकीय विभाग में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं।