पुतिन के भारत दौरे से चीन में टेंशन, सोशल मीडिया पर चर्चा तेज
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चार साल बाद भारत दौरे पर आ रहे हैं, जहां वे 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस दौरे को एनर्जी डील, हथियारों की बिक्री और न्यूक्लियर कोऑपरेशन पर केंद्रित माना जा रहा है, जिस पर चीन में भी चर्चा हो रही है।
बीजिंग। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चार वर्षों के अंतराल के बाद 4-5 दिसंबर को भारत दौरे पर आ रहे हैं। इस दौरान वे 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। पुतिन के भारत दौरे की चीन में भी खूब चर्चा की जा रही है। चीनी ऑनलाइन मीडिया में इस दौरे को काफी अहम बताया जा रहा है। रणनीतिक तौर पर पुतिन के भारत दौरे को तीन मुख्य एरिया पर फोकस करने वाले कदम के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें एनर्जी डील, हथियारों की बिक्री और न्यूक्लियर कोऑपरेशन शामिल हैं। रूस की चीन के साथ भी पक्की दोस्ती है। ऐसे में चीनी नागरिक पुतिन के भारत दौरे को संदेह की नजर से भी देख रहे हैं।
ताइवान-एशिया एक्सचेंज फाउंडेशन में फेलो सना हाशमी के द प्रिंट में लिखे एक लेख के मुताबिक, चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर ‘पुतिन इंडिया आएंगे’ और ‘इंडिया रूस और यूनाइटेड स्टेट्स दोनों से डिफेंस इक्विपमेंट खरीदना जारी रखे हुए है’ जैसे हैशटैग हजारों व्यूज खींच रहे हैं। एक वीबो यूजर ने चीन की मौजूदा बेचैनी को समझा। उन्होंने लिखा, “इंडिया के पास पहले से ही 200 रशियन एयरक्राफ्ट और कई एस-400 हैं। अब पुतिन एसयू-57 और एस-500 ला रहे हैं। चीन-इंडिया और इंडिया-पाकिस्तान के रिश्तों को देखते हुए, वह कौन सा गेम खेल रहे हैं?”
चीनी विशेषज्ञ पुतिन के दौरे को वर्षों से पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और युद्ध के बाद फिर से बनाने के भारी खर्च के बाद रूस के फाइनेंशियल तनाव को कम करने का एक तरीका मानते हैं। एक सोशल मीडिया यूजर का कहना है कि लड़ाई के मैदान में मिली जीत से क्रेमलिन पर दबाव कम नहीं हुआ है; उन्होंने सिर्फ बढ़ते फाइनेंशियल बोझ को ही दिखाया है। और अब, रूस भारत की ओर देख रहा है, यही कहानी है।
भारत-रूस सहयोग के एजेंडे, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और जॉइंट रिसर्च और डेवलपमेंट शामिल हैं, को भी इस बात का संकेत माना जा रहा है कि रूस का मकसद न सिर्फ हथियार बेचना जाी रखना है, बल्कि लंबे समय से सैन्य संबंधों को भी गहरा करना है। जॉइंट रिसर्च और डेवलपमेंट से रूस को हथियारों के एक्सपोर्ट मार्केट को स्थिर रखते हुए रेवेन्यू सुरक्षित करने में मदद मिलती है। बीजिंग इसे एक “स्पेशल और प्रायोरिटी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” को स्थिर करने के कदम के तौर पर देखता है, जिससे मॉस्को पश्चिमी देशों के दबाव का बेहतर तरीके से सामना कर सकेगा।
चीनियों के कमेंट्स भारत की डिफेंस खरीद को चीन के खिलाफ एक टेक्निकल बचाव के तौर पर दिखाता है। मुख्य खरीद—एसयू-57ई स्टील्थ फाइटर, आर-37एम एयर-टू-एयर मिसाइल, जिरकोन हाइपरसोनिक मिसाइल, एस-500 सरफेस-टू-एयर सिस्टम, और एंटी-स्टील्थ रडार—को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के खिलाफ पांच “मारक हथियार” बताया जा रहा है। इन्हें एक इंटीग्रेटेड “एयर सुप्रीमेसी प्लस एयर डिफेंस प्लस एंटी-स्टील्थ” नेटवर्क के तौर पर देखा जा रहा है। बीजिंग इसका मतलब यह निकालता है कि भारत चीन और पाकिस्तान दोनों के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।