वर्दी के पीछे छुपा खौफ: भारत की पुलिस व्यवस्था खून, रिश्वत और बेइंसाफी के दलदल में फंसी है!

उत्तर प्रदेश में ऑपरेशन लंगड़ा की सफलता के बाद, अनेक राज्यों में पुलिस तंत्र को अधिक कड़क और सख्त बनाने की कवायदें शुरू हो चुकी हैं। क्या बिना बुनियादी रिफॉर्म्स के पुलिस तंत्र को और अधिक आजादी देना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होगा?

Aug 10, 2025 - 12:46
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वर्दी के पीछे छुपा खौफ: भारत की पुलिस व्यवस्था खून, रिश्वत और बेइंसाफी के दलदल में फंसी है!

बृज खंडेलवाल-

कल तक जिस पुलिस को 'रक्षक' समझा जाता था, आज भारत के अधिकांश प्रदेशों में वही व्यवस्था 'भक्षक' बन चुकी है! गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक, दिल्ली से असम तक, हर राज्य में पुलिस के जुल्म, रिश्वतखोरी और कस्टोडियल हत्याओं के मामले सामने आ रहे हैं। ये कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक टूटी हुई व्यवस्था के लक्षण हैं, जहाँ सिपाही नहीं, सरकारी गुंडे राज कर रहे हैं! 

देशभर में पुलिसिया जुल्मों की दास्तानें

1. गुजरात: रिश्वत का खेल (2024)

खेड़ा जिले के दो पुलिस वालों ने एक महिला और उसके परिवार से ₹3.75 लाख की मांग की, धमकी दी कि अगर पैसे नहीं दिए तो गुजरात मनी लेंडर्स एक्ट के तहत केस दर्ज कर देंगे! एसीबी ने इन्हें पकड़ा, लेकिन सवाल यह है कि आम आदमी का विश्वास कैसे लौटेगा? 

2. दिल्ली: सिपाहियों का 'कमाई का धंधा' (2024)

सीबीआई ने दो दिल्ली पुलिस वालों को ₹10 लाख रिश्वत लेते पकड़ा। ये कोई पहला मामला नहीं—शहरों में पुलिस का यही 'बिजनेस मॉडल' चल रहा है! 

3. असम: ज़ोमैटो डिलीवरी बॉय की पिटाई (2024)

गुवाहाटी के पुलिस इंस्पेक्टर भार्गव बोरबोरा ने एक मामूली ट्रैफिक नियम तोड़ने पर ज़ोमैटो वाले ग्यानदीप हज़ारिका को बेरहमी से पीटा। वीडियो वायरल हुआ तो सस्पेंड किया गया, लेकिन सज़ा कब मिलेगी? 

4. उत्तर प्रदेश: प्रदर्शन में मौत (2024)

लखनऊ में कांग्रेस कार्यकर्ता की मौत हो गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर ज़्यादती की। गवाहों का कहना है—लाठियाँ, आँसू गैस, और गोलियाँ चलीं! यूपी में तो यह आम बात हो गई है। 

5. पंजाब: कस्टोडियल डेथ का रहस्य (2024)

अमृतसर में एक शख़्स पुलिस हिरासत में मर गया। परिवार ने यातना का आरोप लगाया, लेकिन पुलिस का जवाब? "खुदकुशी कर ली!" जनता का भरोसा कैसे बचेगा? 

6. हरियाणा: किसानों पर ज़ुल्म (2024)

किसान आंदोलन के दौरान हरियाणा पुलिस ने पानी की कन्नों और लाठियों से शांत प्रदर्शनकारियों को खून-खराबा कर दिया। क्या यही है 'लोकतंत्र की रक्षा'? 

7. मध्य प्रदेश: बेगुनाह की गिरफ्तारी और मारपीट (2024) 

एक नौजवान को बिना वजह थाने में बंद करके इतना पीटा गया कि हड्डियाँ टूट गईं। परिवार ने गुहार लगाई, लेकिन न्याय कहाँ मिला? 

8. तमिलनाडु: जयराज-फेनिक्स की कस्टोडियल हत्या (2020) 

लॉकडाउन के नियम तोड़ने के आरोप में पुलिस ने पिता-बेटे को इतना टॉर्चर किया कि दोनों की मौत हो गई। देशभर में आग लग गई, लेकिन क्या सुधार हुआ? 

9. जम्मू-कश्मीर: खुद पुलिस वाले का टॉर्चर (2023)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज किया, जिन्होंने अपने ही साथी कॉन्स्टेबल को जेल में तड़पा-तड़पा कर मार डाला! अगर अपनों पर ही दया नहीं, तो आम जनता का क्या होगा? 

10. दिल्ली: बंगाली माँ-बेटे की मारकाट (2025)

मालदा की एक बंगाली महिला और उसके नाबालिग बेटे को दिल्ली पुलिस ने पकड़कर बेरहमी से पीटा, फिर ₹25,000 वसूले! ये है हमारी 'सुरक्षा व्यवस्था'? 

सिस्टम खोखला है! – क्यों नहीं रुक रही पुलिस की ज़्यादती?

1. कोई डर नहीं, कोई इंसाफ नहीं!

राष्ट्रीय मानवाधिकार के मुताबिक, 2019 से अब तक 194 से ज़्यादा कस्टोडियल डेथ हुई हैं, लेकिन सज़ा? नगण्य! मुठभेड़ें अब लेटेस्ट फैशन है।

95% केसों में पुलिस बरी हो जाती है, क्योंकि जाँच खुद पुलिस करती है! 

2. 1861 का क़ानून, 2025 की ज़ुल्मतंत्र!

आज भी पुलिस 'पुलिस एक्ट 1861' के तहत काम करती है, जो अंग्रेज़ों ने गुलाम बनाने के लिए बनाया था!   सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह केस (2006) में सुधार के आदेश दिए, लेकिन किसी राज्य ने पूरी तरह लागू नहीं किया! 

3. नेता-पुलिस गठजोड़!  

पुलिस अफसरों की पोस्टिंग नेताओं के इशारे पर होती है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस! 

4. ट्रेनिंग? बस दिखावा!

पुलिस को स्मार्ट (संवेदनशील, आधुनिक, जवाबदेह) बनाने की बात होती है, लेकिन हकीकत? लाठी-गोली चलाना ही ट्रेनिंग है!

चौंकाने वाले आंकड़े – राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट

194+ कस्टोडियल डेथ (2019–2024)

95% मामलों में बरी – जांच पुलिस ही करती है

0% पूर्ण सुधार – 2006 के सुप्रीम कोर्ट आदेश लागू नहीं हुए

क्यों बेकाबू है पुलिस?

डर का अभाव – सज़ा लगभग असंभव, अंग्रेज़ी जमाने का कानून – पुलिस एक्ट 1861,नेता-पुलिस गठजोड़ – पोस्टिंग पर राजनीति, ट्रेनिंग का नाम, अत्याचार का काम

समाधान – पुलिस सुधार का रोडमैप

1861 एक्ट खत्म कर नया कानून, स्वतंत्र पुलिस शिकायत आयोग, हर थाने/लॉकअप में 24x7 CCTV,  पोस्टिंग में पारदर्शिता, राजनीतिक दखल खत्म, मानवाधिकार ट्रेनिंग,कस्टोडियल डेथ पर फास्ट-ट्रैक कोर्ट

"क्या हम लोकतंत्र में रह रहे हैं, या वर्दी के आतंक के राज्य में?"

अगर आवाज़ नहीं उठी, तो अगला नाम किसी भी आम आदमी का हो सकता है… शायद आपका भी।

SP_Singh AURGURU Editor