नाजुक है शांति के पनघट की डगरः  पाकिस्तान करे अमन की पहल वरना हूरों का टोटा पड़ जाएगा

यदि पाकिस्तान आतंकवाद से तौबा नहीं करता और उकसावे जारी रखता है, तो एक पूर्ण परमाणु युद्ध केवल दक्षिण एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया को अंधकारमय भविष्य की ओर धकेल सकता है। भारत की संयम नीति की सीमा अब खिंच चुकी है। अब पहल पाकिस्तान को करनी होगी, वरना विनाश तय है।

May 14, 2025 - 13:42
 0
नाजुक है शांति के पनघट की डगरः  पाकिस्तान करे अमन की पहल वरना हूरों का टोटा पड़ जाएगा

-बृज खंडेलवाल-

अगर भारत ने पाकिस्तान पर अपनी पूरी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल करके खुली जंग छेड़ी  तो इसके नतीजे पाकिस्तान, इस पूरे क्षेत्र, बल्कि मुमकिन है कि पूरी दुनिया के लिए क़यामत से कम नहीं होंगे।

अगले राउंड में, खुदा बचाए, जैसे ही भारत के मिसाइल रात के आसमान को चीरते हुए आगे बढ़ेंगे, पाकिस्तान के बड़े शहरों इस्लामाबाद, लाहौर, कराची में खतरे के सायरन बेअसर होकर चीख़ेंगे। मिनटों के अंदर, परमाणु हथियार अपने लक्ष्यों पर बरसना शुरू कर देंगे। सैन्य ठिकाने, हवाई अड्डे, कमांड सेंटर और घनी आबादी वाले शहर।

क्षितिज पर मशरूम के बादल उठेंगे, जो सूरज की रोशनी को ढंक लेंगे। लाहौर और रावलपिंडी में आग के बवंडर पूरे मोहल्लों को अपनी लपेट में ले लेंगे। ज़ीरो पॉइंट पर तापमान हज़ारों डिग्री तक पहुंच जाएगा, जिससे लोग और इमारतें पल भर में राख हो जाएंगे। बाहरी इलाकों में रहने वाले लोग तीसरी डिग्री की जलन और विकिरण बीमारी से पीड़ित होंगे। धमाकों की लहरें कई किलोमीटर तक सब कुछ तबाह कर देंगी।

धमाकों की लहरें संचार नेटवर्क को तबाह कर देंगी। पाकिस्तान के कमांड और कंट्रोल सिस्टम लड़खड़ा जाएंगे। आपातकालीन सेवाएं या तो पूरी तरह से नष्ट हो जाएंगी या फिर बुरी तरह से चरमरा जाएंगी। कुछ ही घंटों में फॉलआउट फैलना शुरू हो जाएगा, जो हवाओं के साथ पंजाब, सिंध और दूर तक जाएगा। काली बारिश होगी, जो पानी के स्रोतों को ज़हर देगी। कृषि क्षेत्र विकिरणित हो जाएंगे। ज़हरीली मिट्टी में फसलें सड़ जाएंगी। कुछ ही दिनों में, हज़ारों और लोग तीव्र विकिरण बीमारी से मर जाएंगे। ज़िंदा लोग मुर्दों से ईर्ष्या करेंगे।

शरणार्थियों के जत्थे ईरान, अफ़गानिस्तान और भारत की अपनी सीमाओं की ओर उमड़ पड़ेंगे, जहां बाड़ और सैनिक रास्ता रोकेंगे। वैश्विक समुदाय लकवाग्रस्त हो जाएगा। सहायता न्यूनतम होगी, जो विकिरण, बुनियादी ढांचे के पतन और जारी भू-राजनीतिक डर से बाधित होगी।

भारतीय उपमहाद्वीप का ये समूचा विवादित क्षेत्र, जो कभी जीवन से भरपूर था, एक कब्रिस्तान बन जाएगा। परमाणु आदान-प्रदान से वातावरण में भारी मात्रा में कालिख फैल जाएगी। एक "परमाणु सर्दी" शुरू हो जाएगी। वैश्विक तापमान गिर जाएगा, मानसून विफल हो जाएगा और दुनिया भर में कृषि को नुकसान होगा। दक्षिण एशिया से दूर के देश भी आर्थिक और जलवायु झटकों को महसूस करेंगे।

ऑपरेशन सिंदूर के साए में, परमाणु युद्ध का साया पश्चिमी बॉर्डर पार इलाकों पर मंडरा रहा है, जो कई करोड़ से ज़्यादा लोगों का घर है। दशकों के अविश्वास और हिंसा से भड़की भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनातनी, अकल्पनीय पैमाने की तबाही मचाने की ओर अग्रसर है। वैज्ञानिक मॉडल एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। एक पूर्ण पैमाने का परमाणु आदान-प्रदान कुछ ही घंटों में 50-125 मिलियन लोगों की जान ले सकता है, जिसमें आग के बवंडर और विकिरण शहरों को मिटा देंगे। इससे भी बदतर, एक "परमाणु सर्दी" दुनिया को अकाल में डुबो सकती हैं।

यह अतिशयोक्ति नहीं है, यह विनाश की भयावह गणना है। पाकिस्तान एक चौराहे पर अटका हुआ है। युद्ध का रास्ता अंधेरे में एक आत्मघाती छलांग हो सकती है, लेकिन शांति का रास्ता, हालांकि संकरा है, अभी भी खुला है। इसके लिए पाकिस्तान को संयम, समझदारी और बातचीत के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की ज़रूरत है। दुनिया के शांति समर्थक लोगों को इस प्रलयंकारी भाग्य को बदलने के लिए एकजुट होकर उठना होगा।

पाकिस्तान की आतंकवाद को एक राजकीय हथियार के तौर पर समर्थन करने की नीति ने लंबे समय से तनाव बढ़ाया है। छद्म युद्धों और सीमा पार हमलों ने अविश्वास को बढ़ाया है, जिससे दोनों देश खाई के और करीब पहुंच गए हैं। भारत की बढ़ती निराशा, उसकी अपनी सैन्य जमावड़े के साथ मिलकर, एक ऐसी जवाबी कार्रवाई उस अंजाम तक पहुंचा सकती है जिसे कोई भी पक्ष नियंत्रित नहीं कर पाएगा। एक छोटी सी ग़लती भी चिंगारी भड़का सकती है।

आतंकवाद हिंसा के चक्र को बढ़ावा देता है और इसे छोड़ना शांति के लिए एक ज़रूरी शर्त है। याद रहे जंग भारत ने शुरू नहीं की है, बल्कि भारत ने अदभुत संयम और धैर्य बरतते हुए, पाकिस्तानी की गुस्ताखियां को वर्षों तक माफ किया है। अब शांति की पहल पाकिस्तान को ही करनी होगी, वरना हूरों का टोटा पड़ना तय है।

पाकिस्तानी हुक्मरानों को जल्दबाजी के बजाय संयम, पागलपन के बजाय समझदारी और विनाश के बजाय शांति को चुनना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय निकायों को पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराना चाहिए, लेकिन दोनों देशों को विश्वास बनाने में भी समर्थन करना चाहिए। अभी आधी रात नहीं हुई है। आइए एक ऐसा भविष्य चुनें जहां हमारे बच्चे राख नहीं, बल्कि उम्मीद विरासत में पाएं।

SP_Singh AURGURU Editor