थियेटर मानवता का पोषक बनेः इप्टा और प्रलेस ने जन्म शताब्दी पर बादल सरकार की विरासत को किया नमन
आगरा। भारतीय रंगमंच के प्रयोगधर्मी नाटककार, निर्देशक और तीसरे थियेटर के प्रवर्तक बादल सरकार के जन्म शताब्दी वर्ष पर भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) आगरा और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) आगरा ने उनकी स्मृति में बादल सरकार की विरासत विषयक संगोष्ठी का आयोजन नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा में किया। इस अवसर पर वक्ताओं ने बादल सरकार के बहुआयामी व्यक्तित्व, प्रयोगशील रंग दृष्टि और समाज को दिशा देने वाले नाट्य चिंतन पर विस्तार से चर्चा की।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि बादल सरकार की तीसरे थियेटर की संकल्पना ने भारतीय रंगमंच को नई दिशा दी। उनके नाटकों का उद्देश्य समाज में मानवता, समानता और जनचेतना का प्रसार करना था। उन्होंने थियेटर को मंच और दीवारों से बाहर निकालकर आम जनता की जीवन भूमि पर उतारा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. कमलेश नागर ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि बादल सरकार का रंगमंच जनता के बीच संवाद का माध्यम था। उन्होंने थियेटर को मानवता का पोषक बनाने की दिशा में कार्य किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में देवाशीष गांगुली ने रविंद्र संगीत प्रस्तुत किया। इसके पश्चात आगरा इप्टा के कलाकारों ने सामयिक गीत प्रस्तुत किए।
संगीत निर्देशन परमानंद शर्मा ने किया। उनके साथ भगवान स्वरूप, असलम खान ने नाट्य पितामह राजेंद्र रघुवंशी का गीत- बाधक हो तूफान बवंडर नाटक नहीं रुकेगा... और गीतकार गोपालदास नीरज का गीत- इसीलिए तो नगर नगर बदनाम हो गए मेरे आंसू पेश किया।
संगोष्ठी में यह भी बताया गया कि बादल सरकार की रचनाएं केवल बंगला में ही नहीं, बल्कि हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर मंचित हुईं। आगरा में उनके लोकप्रिय नाटकों “बड़ी बुआ जी”, “भोमा” और “जुलूस” के मंचन आज भी याद किए जाते हैं।
इस अवसर पर समानान्तर इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित बादल सरकार विशेषांक का लोकार्पण किया गया, जिसके संपादक अनिल रंजन भौमिक हैं। लोकार्पण राजेंद्र कुमार और अन्य विद्वानों द्वारा किया गया।
राजेंद्र कुमार ने कहा कि आज जब समाज अनेक संकटों से गुजर रहा है, तब बादल सरकार पर विशेषांक निकालना सांस्कृतिक जिम्मेदारी का कार्य है। हिंदी भाषा तभी समृद्ध होगी जब वह अन्य भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ रचनाकारों को सम्मानपूर्वक अपनाए।
दोनों अतिथि वक्ताओं का परिचय मुक्ति किंकर ने पढ़ा। जय कुमार ने बादल सरकार की प्रसिद्ध कविता “लक्ष्मीविहीन” का वाचन किया।
संगोष्ठी का संचालन दिलीप रघुवंशी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. ज्योत्स्ना रघुवंशी ने दिया। कार्यक्रम में रमेश अजीत कुमार बनर्जी, प्रवीर पंडित, नीरज मिश्रा, डा. मीना यादव, कुसुम चतुर्वेदी, पूरन सिंह, कुमकुम रघुवंशी, भावना रघुवंशी, प्रवीर गंगोली, तारा चंद, धर्मजीत, सावित्री सिंह आदि विद्वान उपस्थित रहे।
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