'मतभेद हो सकते हैं, मनभेद कभी नहीं', भाजपा और संघ के रिश्तों पर बोले मोहन भागवत

भाजपा और संघ के संबंधों पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान सामने आया है। मोहन भागवत ने साफ तौर पर कह दिया है कि भाजपा और संघ के बीच मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद कभी नहीं। उन्होंने साफ किया कि यदि भाजपा का अध्यक्ष संघ को चुनना होता तो इतनी देरी नहीं होती।

Aug 28, 2025 - 20:43
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'मतभेद हो सकते हैं, मनभेद कभी नहीं', भाजपा और संघ के रिश्तों पर बोले मोहन भागवत


नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा और संघ के रिश्तों को लेकर बड़ा बयान जारी किया है। मोहन भागवत ने कहा है कि "बीजेपी और संघ में मतभेद हो सकते हैं, मनभेद कभी नहीं। मोहवन भागवत ने ये भी कहा है कि केंद्र और राज्य की सभी सरकारों के साथ संघ का समन्वय रहता है। किसी विषय पर संघ सलाह दे सकता है लेकिन निर्णय बीजेपी का है। उन्होंने कहा कि हम तय करते तो इतना समय लगता क्या।"  बीते कुछ समय से ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि संघ और भाजपा के बीच तनाव चल रहा है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- "जयप्रकाश नारायण 1948 में मशाल लेकर संघ को जलाने चले थे लेकिन इमरजेंसी के बाद आकर बोले कि परिवर्तन की आशा आप लोगों से है। प्रणव मुखर्जी भी हमारे मंच पर आए थे। हमारे संघ के स्वयंसेवक कई दलों के अच्छे काम के लिए भी सहयोग करते हैं। राजीव गांधी जब एनएसयूआई के अध्यक्ष थे और उनके नागपुर अधिवेशन में खाने को लेकर हंगामा हो गया और हमसे मदद मांगी गई तो हमने मदद कराया।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- "मैं शाखा चलाने में माहिर हूं, भाजपा सरकार चलाने में माहिर है। हम एक-दूसरे को सिर्फ सुझाव दे सकते हैं।" भाजपा के नए अध्यक्ष के फैसले में हो रही देरी पर आरएसएस प्रमुख भागवत ने चुटकी लेते हुए कहा, "आप अपना समय लें, हमें कुछ कहने की जरूरत नहीं है।"

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शिक्षा के मुद्दे पर भी बात की। उन्होंने कहा- "धार्मिक विश्वास कुछ भी हो सकता है लेकिन शिक्षा की सामाजिक मान्यताएं एक होनी चाहिए और मदरसा हो मिशनरी, सब जगह पढ़ाया जाना चाहिए। अंग्रेजी भी पढ़नी चाहिए। हर भाषा की अपनी लंबी परंपरा है जिसमें अच्छे साहित्य हैं। शिक्षा की मुख्य धारा को गुरुकुल पद्धति की तरफ मोड़ना चाहिए। इसी तरह की पढ़ाई फिनलैंड में होती है जो शिक्षा की व्यवस्था में दुनिया में सबसे अच्छी है और आठवीं तक मातृभाषा में पढ़ाई होती है। संस्कृत का कामचलाऊ ज्ञान भारत को समझने वाले सभी व्यक्ति को होना चाहिए। लेकिन अनिवार्य बनाने की जरूरत नहीं है वरना रिएक्शन होता है।"
 
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने व्याख्यानमाला के तीसरे दिन अपने संबोधन में भारत की शिक्षा प्रणाली का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मतलब सिर्फ सभी जानकारियों को रटना नहीं है, विद्यार्थियों को अपने अतीत के बारे में भी जानना चाहिए। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर अपने विचार बताते हुए कहा कि ब्रिटिशों ने भारत पर अपनी शिक्षा प्रणाली थोप दी है और इससे भारतीय शिक्षा प्रणाली लुप्त हो गई। विद्यार्थियों को अपने अतीत के बारे में भी जानना चाहिए क्योंकि शिक्षा का अर्थ जानकारियों को सिर्फ रटना नहीं है।”

उन्होंने कहा, “तकनीक और आधुनिकता शिक्षा के विरोधी कतई नहीं हैं लेकिन शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी देना नहीं है, बल्कि एक इंसान को पूर्ण रूप से सुशिक्षित बनाना है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020  में पंचकोशीय शिक्षा का प्रावधान शामिल है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति सही दिशा में उठाया गया एक कदम है।”

भागवत ने कहा, “दुनिया के कई देशों से लोग हमारे संघ शिक्षा वर्ग को देखने आए और उन्होंने कहा कि अगर उनके देश में भी आरएसएस जैसा कोई संगठन हो तो यह उनके देश के लिए काफी अच्छा होगा। हमारे मूल्य और परंपराएं विद्यार्थियों को सिखाई जानी चाहिए।”