सावन की वो हरियाली यादें: जब मोहल्ले ही परिवार और पेड़ झूलों के साक्षी हुआ करते थे

सावन माह के उन पारंपरिक झूलों, लोकगीतों, मेहंदी, और घरेलू पकवानों के दौर को पुनर्जीवित किए जाने की जरूरत है जो पहले घर-आंगन और मोहल्लों में बड़े उत्साह से मनाए जाते थे। आज के होटल-आधारित आयोजनों में वो आत्मीयता और सांस्कृतिक जुड़ाव नहीं रहा। नई पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़े जाने की जरूरत है ताकि सावन के त्योहार केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक पारिवारिक, सामुदायिक और सांस्कृतिक उत्सव बने रहें।

Jul 21, 2025 - 10:11
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सावन की वो हरियाली यादें: जब मोहल्ले ही परिवार और पेड़ झूलों के साक्षी हुआ करते थे

पेड़ भी तरस रहे झूलों पर नई दुल्हन की पींगों को

अमुआ की डाल पर झूलों और पींगों का मौसम सावन आज भी आता है, लेकिन अब वो रस्में सिर्फ शो के लिए होती जा रही हैं। होटल और बैंक्वेट हॉल में भले ही आयोजन हो जाएं, पर जो आनंद कभी घर के आंगन और बागों में, प्रकृति की छांव में होता था, वो अब बहुत कम देखने को मिलता है। उस सावन की बात ही कुछ और थी, जब झूले सिर्फ रस्म नहीं, रिश्तों की डोर होते थे।

बहनों-भाभियों ने फिर से किया परंपरा को जीवंत

आज भी कई बहनें और भाभियां पूरे मन से सावन,-भादों के इन उत्सवों को जीवंत रखने का प्रयास कर रही हैं। उनकी इस भावना की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। वे मेहंदी, झूले और पकवानों के माध्यम से परंपरा को बचा रही हैं, भले ही होटल के कार्यक्रमों में ही क्यों न हो।

होटल की सजावट बनाम घर की खुशबू

फूलों की सजावट, महंगे झूले और पकवानों से सजे बैंक्वेट हॉल की रौनक भले ही दिखती हो, लेकिन वह आत्मा जिसमें परिवार, मोहल्ला और परंपरा एक साथ झूमते थे, वो अब ग़ायब है। होटल की चारदीवारी में वह ‘सांस्कृतिक जुड़ाव’ नहीं होता जो घर-बगिया में था।

नई पीढ़ी को जोड़ना होगा इस सांस्कृतिक डोर से

परंपराओं को बचाने की जिम्मेदारी अब सिर्फ माताओं, भाभियों या दादी-नानी की नहीं, बल्कि हम सबकी है। खासकर नई पीढ़ी को इससे जोड़ना जरूरी है। अगर तीज-त्योहारों के गीत, मल्हारें और कविताएं घर में ही गाई जाएं, तो बच्चा-बच्चा उससे जुड़ सकता है, अन्यथा फिल्मी गाने तो वह मोबाइल ऐप्स और तमाम इलेक्ट्रानक गैजेट्स पर सुन ही लेते हैं।

परिवार और मोहल्ले मिलकर करते थे आयोजन

वो भी क्या समय था जब दादी, सास, नानी, पड़ोस की महिलाएं मिलकर नई नवेली बहू का स्वागत करती थीं। बच्चे, देवर, ननद सभी मिलकर झूले झुलाते, चुहलबाजी करते। मोहल्ला आयोजन करता था और हर घर उसमें शामिल होता था। आज इन आयोजनों को फिर से मोहल्लों तक लाने की ज़रूरत है।

सोहला और छत्तीस: घर में होता था पारंपरिक श्रृंगार

सावन में छत्तीस और सोहले होते थे। हल्दी का उबटन, चिकनी या पीली मिट्टी से दमकता चेहरा, भाभियों द्वारा श्रृंगार और घर में लगे मेहंदी के पेड़ से तोड़ी गई पत्तियां, इनसे जो मेहंदी बनती थी, उसका रंग भी गहरा चढ़ता और उसमें कोई रसायन नहीं होता था। गजरे और बेड़ियों से केशों का श्रृंगार होता और भाभियों की मांग की बड़ी शोभा होती।

घर में बनते थे शुद्ध घी और मसालों से पकवान

मिसरानी जी और उनके परिवार की महिलाएं घर पर ही पिसे मसाले और शुद्ध घी से पकवान बनाती थीं। वो पकवान सिर्फ एक दिन के लिए नहीं, बल्कि पूरे सावन भर चलते थे। उनका स्वाद हर किसी के दिल में बस जाता था।

मोहल्ला सिर्फ मोहल्ला नहीं, परिवार हुआ करता था

मोहल्ले के यह आयोजन नई दुल्हन को सिर्फ परिवार ही नहीं, पड़ोस से भी परिचित कराते थे। कोई चाची, कोई अम्मा ढोल बजाती थी, कोई भाभी गाना गाती थी। सजी धजी महिलाएं, श्रृंगारित दुल्हनें और बच्चों की शरारतें, सब मिलकर सावन को जीवंत कर देते थे।

अब फिर से सावन को घरों में उतारने की बारी

आज वक्त है इन परंपराओं को फिर से आंगनों में लौटाने का। होटल से बाहर निकलकर परिवारों और मोहल्लों में वो सांस्कृतिक जीवन लौटाना होगा, जहां त्योहार सिर्फ दिखावा नहीं, आत्मीयता और भावनाओं की साझेदारी हुआ करते थे।

पुनः सभी को हरियाली तीज, सावन और भारतीय परंपराओं की मंगलकामनाएं।

-राजीव गुप्ता ‘जनस्नेही कलम से’
लोक स्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor