जो बच्ची में भी वासना देखें, वे समाज में रहने के योग्य नहीं, फांसी की सजा पर कोर्ट का सख्त संदेश
आगरा। विशेष न्यायाधीश (पॊक्सो एक्ट) सोनिका चौधरी ने आगरा के बाह क्षेत्र में पांच वर्षीय मासूम बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के जघन्य अपराध में दो अभियुक्तों निखिल पुत्र राम बिहारी और अमित पुत्र रामसरन को मृत्यु दंड की सुनाते हुए कहा कि जो व्यक्ति खेलती हुई अबोध बालिका को देखकर कामवासना से अंधे हो जाएं और अपनी हवस की पूर्ति के लिए उसकी मासूमियत को कुचलते हुए हत्या कर दें, ऐसे व्यक्ति समाज के लिए खतरा हैं और किसी भी रूप में समाज में रहने के योग्य नहीं। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे अपराधों में भी उदारता दिखाई गई तो यह मानवता के साथ अन्याय होगा। यह मामला विरल से विरलतम (rarest of the rare) की श्रेणी का है और कठोरतम दंड ही समाज को न्याय का संदेश दे सकता है।
-ऐसे अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो न तो माता-पिता अपने परिवार में बेटी जन्म की प्रार्थना करेंगे और न ही ईश्वर देश व समाज को बेटी देगा
विशेष न्यायाधीश (पॊक्सो एक्ट) एवं अपर सत्र न्यायाधीश सोनिका चौधरी ने अपने आदेश में लिखा है कि जिन व्यक्तियों में खेलती हुई मासूम और अबोध पांच वर्षीय बालिका को देखकर कामवासना जागृत हो जाए और उक्त काम वासना की पूर्ति हेतु व्यक्ति बर्बरतापूर्वक अबोध निसहाय बालिका की हत्या कर शव को छिपाने के लिए फेंक दे, वह व्यक्ति किसी भी रूप में कतई समाज में रहने के योग्य नहीं है तथा समाज में इस प्रकार के व्यक्ति के रहने पर बालक-बालिकाओं व स्त्रियों को सदैव ही खतरा व संकट बना रहेगा। इस स्तर पर निम्न श्लोक का उद्धरण किया जाना सुसंगत है-Top of Form
येषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः
ते मर्त्यलोके मृगाश्चरन्ति।।
अर्थात जिन लोगों के पास न तो विद्या है, न तप, न दान, न शील, न गुण और न धर्म है, वे लोग इस पृथ्वी पर भार हैं और मनुष्यके रूप में मृग-जानवर के रूप में घूमते रहते हैं।
मां-बाप की आंखों का तारा और दिल का टुकड़ा थी मासूम
न्यायाधीश ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रकरण में चार साल दस माह की पीड़िता कोमल बच्ची अपने परिवार के आंगन की कली थी तथा मां-बाप की आंख का तारा थी और दिल का टुकड़ा थी। माता-पिता द्वारा कितने अरमानों से नन्हीं जान का पाला गया होगा तथा कितने सपने उसके भविष्य के लिए देखे होंगे, परन्तु नन्हीं परी जीवन के पांच वर्ष भी पूर्ण रूप से नहीं देख पाई। अभियुक्तगण ने पाशविक, अन्याय व बर्बरता करते हुए उसकी जीवनलीला समाप्त कर दी।
मासूम कितनी तड़पी होगी और छटपटाई होगी, कल्पना से परे
न्यायाधीश सोनिका चौधरी ने कहा कि हमारे देश में महिला सशक्तिकरण के लिए मिशन नारी शक्ति, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रम जोर-शोर से चलाए जा रहे हैं किंतु उसके उपरांत भी कितनी लाचार व विवश सामाजिक स्थिति है जो मासूम बच्चियों को न तो सुरक्षा प्रदान कर पा रही हैं तथा न ही जीवन बचा पा रही हैं। अभियुक्तगण के बर्बर व नृशंस कृत्य से मासूम कोमल बालिका कितनी तड़पी होगी, जीवन बचाने के लिए छटपटाई होगी, संघर्ष किया होगा, यह कल्पना से परे है। यदि समाज में इस प्रकार के अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो न तो माता-पिता अपने परिवार में बेटी जन्म की प्रार्थना करेंगे और न ही ईश्वर देश व समाज को बेटी देगा।
रेप जैसा जघन्य अपराध शरीर ही नहीं आत्मा पर भी होता है
विशेष न्यायाधीश ने कहा कि बलात्कार जैसा जघन्य अपराध मात्र शरीर के विरुद्ध नहीं है अपितु किसी भी बालक, बालिका या स्त्री की आत्मा के विरुद्ध भी कारित किया जाता है। आज भी नन्हीं जान की आत्मा अभियुक्तगण के नृशंस व बर्बरतापूर्ण कृत्य से चीत्कार रही होगी। अभियुक्तगण के आचरण से किसी भी स्तर पर यह परिलक्षित नहीं होता कि अभियुक्तगण द्वारा भावुकतावश या आवेश या उतावलेपन में अबोध बालिका के विरुद्ध बलात्कार तथा हत्या जैसा जघन्य अपराध कारित किया गया। अपितु अभियुक्त द्वारा सोच समझकर कामवासना की पूर्ति हेतु लैंगिक हमला करते हुए हत्या कारित की गई तथा शव भी छिपा दिया गया। यही नहीं, मृतका के पिता से फिरौती की मांग भी की गई। अभियुक्त द्वारा निःसंदेह की अबोध नाबालिग बालिका की हत्या सुनियोजित नृशंस हत्या की श्रेणी में है।
ऐसे पाशविक व बर्बर अपराध में उदारता समाज से अन्याय होगा
न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा कि यदि न्यायालय इस प्रकार के पाशविक, नृशंस, बर्बर अपराध में भी उदारता अपनाता है तो यह समाज व मानवता के साथ अन्याय होगा। अभियुक्त द्वारा कारित अपराध व कृत्य विरल से विरलतम (Rarest of the rare) की श्रेणी में है तथा अभियुक्त कठोरतम दंड के अधिकारी हैं। अभियुक्तगण को मृत्युदंड देने पर ही मृतका अबोध पीड़िता व समाज को न्याय दिया जाना संभव है, जिससे समाज स्वयं को व अपने अबोध बालकों को प्रकृति के ऐसे नरपिशाचों से बचा सकें तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम का भी उद्देश्य पूरा हो सके।
मृत्यु न होने तक फांसी पर लटकाया जाए
न्यायाधीश ने अभियुक्त अमित और निखिल को धारा 302/ 34 में मृत्युदंड की सजा सुनाते हुए कहा कि दोनों को गर्दन में फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए जब तक कि उनकी मृत्यु न हो जाए। धारा 364ए /34 में फांसी की सजा के साथ पचास-पचास हजार के अर्थदंड से भी दंडित किया गया। इसके अलावा अन्य धाराओं में भी सजा व अर्थदंड लगाया गया।
एडीजीसी सुभाष गिरि ने की प्रभावी पैरवी

सरकार की ओर से इस केस में प्रभावी पैरवी एडीजीसी सुभाष गिरि ने की। कोर्ट के फैसले पर श्री गिरि ने कि यह निर्णय न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को और मजबूत करेगा। अभियोजन पक्ष ने सभी साक्ष्य व गवाहों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि अभियुक्तों ने जघन्य अपराध किया था।