तिब्बत कार्ड: अमेरिका की चालें, चीन की चिंता और भारत की रणनीति
भारत को तिब्बत मुद्दे पर अमेरिका के तात्कालिक हितों से सावधान रहकर रणनीति बनानी चाहिए। बीते दशकों में न अमेरिका ने तिब्बतियों के लिए कुछ किया, न तिब्बत ने भारत के लिए। चीन को भारत की सैन्य ताकत का भी अब भान है। भारत अकेले नहीं, अंतरराष्ट्रीय सहभागिता से ही तिब्बत पर कोई निर्णय ले।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
आज सुनने में आ रहा है कि अमेरिका ने सीधे-सीधे ऑस्ट्रेलिया और जापान से पूछ लिया कि वे साफ-साफ बताएं कि किस हद तक वे चीन के खिलाफ अमेरिका का साथ देंगे। उसी के हिसाब से शायद अमेरिका भी ताइवान-चीन संघर्ष के लिए अपनी नीति बनाए। बीते समय में हमने देखा ही है कि अमेरिका आईएसआईएस को खड़ा करवा सकता है, और जब खुद पर आंच आए तो आईएसआईएस को मिटा भी सकता है। चाहे तो बिन लादेन को उड़ा सकता है, और चाहे तो बिन लादेन के साथी अहमद अल शरा को सीरिया का राष्ट्रपति भी बनवा सकता है।
बात है सिर्फ चाहत और मौका परस्ती की। कोई रिश्तेदारी निभाने या पुराने कर्ज उतारने की बात तो नहीं है। इज़राइल और यूक्रेन का अमेरिकी समर्थन देख लीजिए। कभी बत्ती थोड़ी जलती है, तो कभी गुल हो जाती है। हथियार कभी-कभार इज़राइल को मिलते रहे, पर क्या समय पर अमेरिका ने इज़राइल के कैदी छुड़वाए, या समय रहते ईरान के परमाणु जखीरे पर बम गिराया?
यह खट्टी-मीठी अमेरिकी तरकीब है, सभी को उलझाए रखने की। सबसे पहले अमेरिका केवल अपना फायदा देखता आया है। सुनने में तो यह भी आता रहा है कि जहां आग नहीं लगी, वहां आग लगवाकर आपसी युद्ध भी छिड़वा देता है, फिर उन्हें अपने तमंचे-कारतूस भी बांटता और बेचता है। बोले तो दोनों हाथ घी में सदा बने रहते हैं।
दलाई लामा जी भारत में मार्च 1959 में शरण लेने आ गए। अमेरिका ने ही वहां ऐसा माहौल बनवाया था, जिसकी वजह से शांतिपूर्ण तिब्बत चीन के विरुद्ध होता चला गया। अमेरिका ने ही तो तिब्बती लोगों को अपने हथियार, गोला-बारूद और ट्रेनिंग देनी शुरू की थी। जब चीन हावी हुआ, तो अमेरिका वहां से दुम दबाकर पतली गली से निकल लिया।
आज अमेरिका को चीन से मुकाबला करने के लिए तिब्बत कार्ड की पुनः ज़रूरत पड़ी, तो दलाई लामा भी याद आए, और भारत भी। पिछले 66 सालों से तो वह तिब्बत और दलाई लामा को भूला हुआ था। पाकिस्तानी मुहब्बत में ऐसा डूबा था अमेरिका कि भारत से सौत जैसा व्यवहार करते भी कोई परहेज़ या संकोच नहीं था। इन 66 वर्षों में क्या अमेरिका ने तिब्बत या दलाई लामा के लिए कोई सार्थक कदम उठाया? और इधर दलाई लामा जी और तिब्बत ने 66 सालों में यहां रहते हुए भी भारत के लिए कुछ भी सार्थक किया कभी?
हां, कुछ बेहद सीमित सिपाही हैं हमारे यूनिट में, पर इनसे तो बीस-तीस गुना ज्यादा नेपाली भाई हैं हमारे साथ फौज में। नेपाल तो बेहद छोटा सा देश है तिब्बत के मुकाबले। और क्या अब तक मिला है भारत को? इस हकीकत को पहचानने की ज़रूरत है, और मध्यकालीन इतिहास को देखते हुए ही अगली कोई रणनीति बने। वैसे यह भी सोचिएगा कि इतने बौद्ध प्रमुख मुल्कों में से कितनों ने भारत समान मदद की हो अब तक?
जापान के बौद्ध, सारनाथ और बोधगया को मानने वाले हैं। यह हम इसलिए भी जानते हैं कि पंद्रह-सोलह साल पहले मुझसे (लेखक) पूछा गया था कि क्या हम जापान द्वारा संचालित बोधगया के अस्पताल का संचालक और डॉक्टर बनना पसंद करेंगे। हम तब तक आगरा में अपना घर बनाकर वहां बस चुके थे, इसीलिए हमने क्षमा मांगी। श्रीलंका के बौद्ध अनुयायी भी तो बोधगया और सारनाथ, साँची को महत्व देते हैं, जैसे कि हमारे पूर्वी मुल्कों के बौद्ध। हमारे देश के ज़्यादातर बौद्ध अनुयायी भी श्रीलंका और जापान, थाईलैंड, बर्मा के बौद्धों की ही तरह मानने वाले हैं।
आजकल भारत थोड़ा बदल सा गया है, और अपने फैसले अपने भले को प्राथमिकता देते हुए करता है। देश का भला यदि देखना है, तब अमेरिका का एकाएक भारत और तिब्बत कार्ड पर प्रयत्न को बारीकी से देखने की ज़रूरत है। ऑपरेशन सिंदूर में हमने साफ पाया कि अमेरिका के गोला-बारूद, लड़ाकू जहाज और अमेरिका द्वारा पोषित पाकिस्तानी जिहादी भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए। और अब अमेरिका भारत का समर्थन चाह रहा है। इसके लिए पासा वह ट्रेड टैरिफ का भी हम पर फेंक चुका है। कहां तक और कब तक अमेरिका हमारा साथ निभाएगा? मतलब की यारी कहां तक चलेगी?
दूसरी ओर चीन है। कभी वह पाकिस्तान का भारत के खिलाफ साथ देता है, तो कभी हमारे पूर्वी प्रदेशों के उपद्रवियों को। हम सन् 1962 में ही चीन से किन्हीं वजहों से हारे थे। पर देखें तो 1962 से पहले अनेकों बार चीन में घुस-घुस कर अंग्रेजी कमांडरों के नेतृत्व में हमने उन्हें हराया था। 1967 में भी वे हारे, जैसे कि उसके बाद डोकलाम और गलवान में भी।
1986 और 1987 में हम 9 गार्ड्स बटालियन, 14 पंजाब बटालियन, और 12 आसाम रेजिमेंट के डॉक्टर बनाकर भेजे जाते रहे। यदि श्री राजीव गांधी 9 गार्ड्स को अंतिम समय पर रोकते नहीं, तो उस पलटन के साथ हम भी तैयार थे चीन में घुस जाने को। ऐसा नहीं था कि हम ही वहां अकेले डॉक्टर थे। बहुतेरे थे।
चीन भी अच्छी तरह से जानता है आज के भारत का दम-खम। यदि लड़ना है, तो लड़ ही ले हमसे। बुरी तरह पछताएगा। आज हमारी फौज का असलहा, हथियार, और काबिलियत मोदी जी के कार्यकाल में पहले से दस गुनी हो गई है। पाकिस्तान के जिहादी ठिकाने केवल और केवल 25 मिनट में तबाह कर दिए थे। ऐसा नहीं कि पाकिस्तान ने अपने बचाव और काउंटर अटैक की कोशिश नहीं की, पर सब व्यर्थ गईं। अमेरिकी, चीनी, या तुर्किये द्वारा पाकिस्तान को दी गई सभी सहायता बेकार गई। यह तो पूरी दुनिया ने देखा ही होगा। और क्या चीन ने नहीं देखा, जाना, व अच्छी तरह समझा होगा?
वियतनाम तक ने तो चीन और अमेरिका के छक्के छुड़ा दिए थे। सन् 1962 में हम तैयार नहीं थे। पर आज अच्छी तरह से हैं। चीन यदि चाहे तो हमसे लड़ कर देख ले। बुरी तरह हारेगा। भारत की हमेशा से "जियो और जीने दो" की नीति रही है। दोस्ती करोगे, तो सभी का फायदा। वरना पछताओगे। आजमा ही लो।
जहां तक तिब्बत का सवाल है, जवाब तिब्बतियों और दुनिया को ढूंढना है। भारत अकेले ही अपने दम पर तिब्बत के लिए फैसला अब न ले। यही हमारी सलाह रहेगी। जैसा अमेरिका या इंग्लैंड करता है, कि बिना नाटो की सलाह के नहीं आगे बढ़ता, तिब्बत की बात यूएनओ, अमेरिका, और नाटो की सहमति और बराबर की संलग्नता के साथ ही भारत सोचे। तिब्बत ने सन् 1959 से लेकर आज तक चुप्पी साधकर रखने का निर्णय लिया।
भारत तिब्बत को मुक्त करा सकता है एक सप्ताह के अंदर। पर बांग्लादेश से भी कुछ सबक सीखते हुए हम दुनिया की प्रक्रिया और उनके कदम बढ़ाने का इंतज़ार करें। और यदि चीन समझदारी दिखाते हुए भारत से शांति चाहता है, तो एक नए रूपरेखा से पंचशील संधि तैयार हो, जो अगले सौ वर्ष तक तो मान्य हो। भारत के कंधे से कोई भी अपनी बंदूक न चला पाए, ख़ास तौर से अमेरिका।
उपरोक्त सभी मेरे ही मन की बातें हैं। और मैं चाहूंगा कि सभी मसले शांति से ही निबट जाएं – तिब्बत, हमारा, और ताइवान का भी। साथ ही साथ रूस-यूक्रेन, जिहादी, और इज़राइल के मसले भी हमेशा के लिए सुलझ जाएं, यही बुढ़ापे में हमारी प्रार्थना रहेगी।
(लेखक भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं)