भरोसा: रेत की तरह फिसलता एक मूल्य, जिसकी खोज अब भी जारी है

समाज के लगभग हर क्षेत्र में घटता विश्वास चिंतनीय है। चिकित्सा, मीडिया, शिक्षा, राजनीति, व्यवसाय, पत्रकारिता से लेकर आमदनी-खर्च तक, हर जगह भरोसे की डोर कमजोर होती जा रही है। यह सिर्फ कलयुगी लक्षण नहीं, बल्कि एक सामाजिक और मानसिक संकट है, जो हर किसी को कभी न कभी छू रहा है। भरोसा एक वृक्ष की मजबूत शाखा की तरह होता है। एक बार टूटा, तो पुरानी मजबूती दोबारा नहीं आती। फिर चाहे वो डॉक्टर का पेशा हो, पत्रकार की कलम हो या सरकार की नीयत, भरोसा बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

Aug 3, 2025 - 12:51
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भरोसा: रेत की तरह फिसलता एक मूल्य, जिसकी खोज अब भी जारी है

-डॉ (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

भरोसा और भूसा को यदि न संभालो, तो क्षण भर भी नहीं लगेगा जब वह हवा में उड़ जाएगा। दुबारा से उस भूसे को इकट्ठा करने वालों से जानो कि क्या वह उसी तादाद में कभी इकट्ठा हो पाता है? यह रेत की तरह है। हाथ से फिसली, तो गई ही समझो। यह कोई पेड़ की शाखा नहीं कि एक कट जाए, तो बाकी तो बची हैं न। नहीं, भरोसा एक समावेश है। मानो कि भरोसा किसी वृहद वृक्ष की तरह है और यदि उसकी एक सुदृढ़ शाखा किसी कारण कट जाए, तो फिर वह पुरानी बात नहीं रहती।

फौजी डॉक्टर रहा हूं। राष्ट्रीय प्रोफेसर भी हूं। इसलिए अपनी बात डॉक्टरी पेशे से ही शुरू करता हूँ। साफ और सपाट कहता हूँ कि आजकल हर डॉक्टर और हर अस्पताल, हर लैब और हर दवा की दुकानों पर भरोसा नहीं रह गया है। कई कारण हैं, जिन्हें ज्यादातर लोग जानते ही होंगे। ऐसा नहीं कि बढ़िया लोग इस व्यवसाय में नहीं हैं। कई एक अभी भी बढ़िया हैं, और इसीलिए तो यह पेशा अब कंप्यूटर, इंटरनेट, रोबोट और एआई आने के बाद भी आज तक जिंदा है। याद कीजिए कि वे भी दिन थे जब डॉक्टर की तुलना ऊपर वाले से भी की जाती थी।

राजनीति के कुछेक मंजे हुए खिलाड़ी भी कई बार ऐसी गोटाखोरी, कलाबाजी, तल्ख़ी, और तेजी दिखा जाते हैं कि पाले से पार कब हो गए, उन्हें पता ही न चला। दूध वाला ले लो। चार-पांच बार पानी, घटतौली या कम मलाई मिलते ही दूसरा ढूंढा जाता है। शादीशुदा जिंदगी देखो, यदि भरोसा है, तो शादीशुदा जिंदगी बढ़िया है, वरना...

कई लोग डूबते भरोसे को कलयुग के अनेक बिंदुओं में से एक बिंदु समझ कर "आई गई" कर देते हैं। परंतु भरोसे की तलाश हमेशा जारी ही रहती है। दूध, तेल, जनप्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि आज तो अखबारों, मीडिया खबरों, स्कूल, कॉलेज, शिक्षा, पेट्रोल पंप, परचून की दुकानों का घटता भरोसा व दायरा भी सुरसा के मुख सा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है।

ऐसा क्यों कि आज बड़े से बड़े अखबार, बड़ी से मीडिया खबरें, व ज्यादातर पुरानी, नामी, व सालों से चलती चली आ रही परचून व छोटे-मोटे सौदों की दुकानें अब बंद होने के कगार पर हैं। कई वजहें हैं, और कई पहलू भी। विश्वास का काफी हद तक उतर जाना शायद अलग से एक बड़ा मुद्दा है।

आज एक अखबार बंद होता है, तो किसी दूसरे नाम से फौरन शुरू हो जाता है। सच और सपाट बोलने-लिखने वाले, वो कलम चलाने वाले अब कम ही पसंद किए जाने लगे हैं। परंतु अपनी कहें, तो दूसरी तरफ अनेक पहचान वाले और कई मित्र आज भी हैं, जिनकी कलम या उच्चाव पैसे की थैली और सिक्कों की खनखनाहट और "ता-था-थैया" भी लुभा न सकी। वे फिर अलग हटते चले गए, कुछेक तो हाशिए पर भी पहुंच गए। पर अपनी कलम या उच्चाव का भरोसा हमेशा कायम ही रखा। बोले तो वे दबे और बिके नहीं। आज तभी तो हम जैसे बहुत सारे लोग उनको ढूंढ-ढांढ कर उनके पास पहुंच ही जाते हैं।

ज्यादातर लोग अपनों की देखी-सुनी पर ही विश्वास करने लगे हैं। यारों दोस्तों की भी सुन लेते हैं। उनसे पता चलता है कि कौन विश्वास लायक बचा है। पंसेरी और परचून की दुकानें वीरान सी हो ली हैं। जिनका पुराना उधार खाता चल रहा है, वे ही ज्यादातर वहां पहुंचते हैं, या जिसको बेहद जल्दी हो। वरना तो लोग अब बहुत सोच-समझकर ही चलने लगे हैं।

पत्रकारिता और मीडिया पर बोलें तो कुबेरपतियों की कुछ विशेष ही कृपा दृष्टि बन चुकी है। लोगों से सुना है कि कई मीडिया हाउस तो बिक चुके हैं, और बचे-कुचे पर गिद्ध दृष्टि सी लगती है। परंतु ऐसा नहीं कि सब कुछ समाप्तप्राय सा है। कुछेक इज्जतदार और भरोसेमंद चेहरे अभी भी हैं, जो मेनलाइन प्रकाशन और मीडिया से अब दूर तो हो चुके हैं, या खुद दूरी बना ली है, पर उनके अनेक फैंस और फॉलोअर रोज ही बढ़ते जा रहे हैं। उनमें भरपूर काबिलियत, और उसके साथ-साथ, न थिरकने और ता-था-थैया न करने वाली कलम और वाणी थी।  चांदी अथवा सोने के सिक्के भी उन्हें बदल न सके।

एक और भी पहलू है पत्रकारिता में। बोले तो जैसे क्रिकेट के पुराने गेंदबाजों की बॉलें एक समय जाकर बुरी तरह पिटने लग जाती हैं, ठीक उसी तरह से ही हैं अब पत्रकारिता व मीडिया में वर्षों से पांव जमाए लोग। हटने को, और दूसरे को जगह देने के लिए वे तैयार नहीं। उनके उच्चाव, और लेख की कीमत व विश्वसनीयता दिन-ब-दिन घटती ही जा रही है।

टीआरपी और मुद्दा भटकाने का भी फेर है शायद, जो एक के बाद एक, उनसे हड़बड़ी में बाउंड्री-पार ही गेंदें फिकवाता जा रहा है, जिससे पहले कहा ना कि सारा मजा ही खत्म हो रहा है।

आज का आलम यह है कि वह जिज्ञासा और तल्लीनता अखबारों और मीडिया न्यूज़ से खत्म सी हो रही है। कई लोगों ने देखा ही होगा कि राजधानी एक्सप्रेस, व अन्य वर्ल्ड फेम की ट्रेनों में फ्री में अखबार दिए जाते हैं। हवाई अड्डों, होटलों, और लाइब्रेरीयों में पहले उन अखबारों को पाने के लिए थोड़ी बहुत छीना-झपटी भी होती थी। पहले तो हर सीट पर बांटे जाते थे। तब अखबारों की संख्या भी बहुत रहती थी, और कई अलग-अलग प्रेस के होते थे, और अलग-अलग खबरें मिलती रहती थीं। परंतु अब? ज्यादातर लोग अखबार देख कर मुंह मोड़ लेते हैं। भरोसा ही नहीं रहा। कोई गोदी है, तो कोई अलग खेमे के। आज मतिभ्रम है कि आखिर कोई है जो देश और समाज के लिए खड़ा है।

एक वह भी समय था जब एक पक्ष किसी के पीछे पड़ उसे पप्पू बनाते घूमते थे, तो दूसरा गुट पप्पू के धब्बे मिटाते घूमते। आज तो यह आलम हो रहा है कि ज्यादातर पत्रकारिता और मीडिया पढ़ी-लिखी और जागरूक जनता को ही अपनी किंवदंती, खोखली, और छल्लेदार बातों में घुमाने सा लगता है। पैसा दो तो पूरा अखबार भी आपका। जिसे चाहें तो आसमान में चढ़ा दें। और चाहें तो ऊपर एक इंच भी न उठने दें। भरोसा और मर्यादा की कई बार धज्जियां उड़ती दिखती हैं।

बातें ऐसी कि यदि कहीं ढलान वाले निचले हिस्से के यदि दस बीघे खेत में थोड़ा भी पानी भर जाए, तो खबरें उसे बाढ़ भी बना देती हैं। अब असर दो तरह का होता है। उस खेत में जो भी लगा था, उसकी वजह से तो पूरे क्षेत्र व राज्य में बुरी बर्बादी का पूर्वानुमान राज्य और देश के स्तर पर सभी तरफ शुरू सा हो जाता है। कुछेक जानकारों के अनुसार उस फसल के अचानक दाम बढ़ते हैं। जमाखोरी होती है। सरकारें तक हिल जाती हैं। आम इंसान पर क्या असर पड़ता है, उस से किसी का अब क्या लेना देना। कलम और वाणी तो चल गई, उसी बताए और मीटिंग में हुए हिसाब से। शेयर भी उछलते और टूटते हैं खबरों से, चाहे उनकी पुष्टि हुई हो या नहीं। विज्ञापन का माध्यम बनते हैं। नवरत्न कौन बनेंगे, फैसला भी उन्हीं के माध्यम से कई बार होने लगा है।

आज पेट्रोल, डीज़ल, गैस पर किसे पूरा भरोसा है? सोने, गहने पर? राशन -परचून पर? आज इंसान इंतजार कर रहा है कि कब पेट्रोल-डीज़ल-गैस का बढ़िया विकल्प आए। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री जी के काफिले की 19 गाड़ियों में पानी मिश्रित पेट्रोल कुछेक दिन पहले ही तो डाला था, जब सारी गाड़ियां एक साथ बंद हो गईं। साधारण इंसान कैसे और कब तक बचेगा ऐसी धांधलीबाजी से?

पंसारी से सामान लो, तो मिलावट, घट तौली, पुराना, और न जाने किन-किन कमियों के साथ जूझना पड़ता है। सरकार ने भी तो अरहर दाल में खेसरी दाल की मिलावट को कुछ हद तक मंजूरी दे दी है। खाने के तेल में सरकारी छूट है पाल्म ऑयल और राइस ब्रैन ऑयल मिलाने की कुछ हद तक की छूट है। यदि थोड़ी ज्यादा मिलावट हो जाए, जो आदत सी बन जाए, फिर? भरोसा कब तक करेगा एक इंसान?

शिक्षा को लें। पढ़ाई होती है क्या? या कोचिंग और ट्यूशन का ज़माना है? कभी किसी ने पता लगाया कि स्कूल या कॉलेज में किन्हीं सब्जेक्ट में बेहद कम नंबर आते हैं, या बच्चे फेल हो जाते हैं? क्या बच्चों की ही गलती है, या उन विषयों को सही तरह से न पढ़ा पाने वाले शिक्षकों की?

एक बड़े व्यवसायी फिर से ईडी के शिकंजे में फँस रहे हैं। क्या कोई कार्यवाही होगी इस बार? करप्शन जड़ें मजबूत कर चुका है। लोगों ने सरे आम क्या क्या नहीं कहा इस पर, पर फिर वही ढाक के तीन पात। कोई असर नहीं होता। एक विधि से संबंधित व्यक्ति के घर में नोटों की अथाह गड्डियाँ अग्नि को भेंट चढ़ गईं। हजार-दो हजार रुपये की हेराफेरी करने वाले न जाने कितने जेल की सलाखों के पीछे होंगे, पर हजार-दस हजार-बीस हजार करोड़ की हेराफेरी करने वाले सूट-टाई पहने धड़ल्ले से खुले घूम रहे हैं।

मुद्दे बहुत हैं देश के सामने। घुसपैठ भी एक मुद्दा है। आखिर किसने उन्हें इतनी ज्यादा तादाद में देश में घुस आने दिया? किसकी ड्यूटी थी उन्हें बॉर्डर के पार न आने देने की? किसने उनके आधार, वोटर कार्ड, पैन कार्ड और राशन कार्ड अपने हस्ताक्षर से बनवाए और बनाए? गजवाए हिन्द भी बड़ा मुद्दा है। किस पर भरोसा करें?

सड़कें और पुल बनने की देर नहीं होती, लाल फीते भी कट जाते हैं, और कई पुल, सड़कें, शासकीय बिल्डिंग उखड़ जाती हैं, तबाह भी हो जाती हैं। सरकार पुराने ढर्रे को सुधारने हेतु प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा दे रही दिखती है। पर क्या यह जाना है कि ढर्रे में वही पुरानी गंध और स्वाद वापस आ चुका है? देश पर बलिदानियों का ही खून हूं। कहीं अब सरकार के भरोसे पर भी संशय न उठ खड़ा होने लगे, इसलिए यह सब हमने लिखा।

(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं। आप विदेश से प्रकाशित छह चिकित्सा पुस्तकों के लेखक हैं। आपने विश्व के लिए 100 से अधिक नई और नवाचारी चिकित्सकीय उपचार तकनीकों का विकास किया है।)

SP_Singh AURGURU Editor