समाज को आईना दिखाता अकेलेपन का सचः घर के भीतर मर जाता है आदमी और बाहर चलती रहती है दुनिया, क्या हम रिश्तों में संवाद, संवेदना और सहभागिता खो चुके हैं? अब भी नहीं चेते तो देर हो जाएगी

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के दुर्गपुर स्थित आवास में सेवानिवृत्त जिला विकलांग अधिकारी जावेद फारुकी (65 वर्ष) का शव बिस्तर पर मिलने की घटना केवल एक आकस्मिक मृत्यु नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की उस भयावह सच्चाई को उजागर करती है, जहां भीड़ के बीच इंसान भीतर से अकेला होता जा रहा है। यह उस समाज का आईना है, जहां दरवाज़े भीतर से बंद रहते हैं और बाहर ज़िंदगी शोर मचाती हुई गुजर जाती है। 24 घंटे तक एक घर में मौत पड़ी रही और किसी को भनक तक नहीं लगी। इससे अधिक भयावह दृश्य आधुनिक सभ्यता का शायद ही कोई हो।

Jan 3, 2026 - 12:40
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समाज को आईना दिखाता अकेलेपन का सचः घर के भीतर मर जाता है आदमी और बाहर चलती रहती है दुनिया, क्या हम रिश्तों में संवाद, संवेदना और सहभागिता खो चुके हैं? अब भी नहीं चेते तो देर हो जाएगी
प्रतीकात्मक इमेज।

आगरा से सेवानिवृत्त हुए जावेद फारुकी की मौत की खबर 24 घंटे बाद तब सामने आई, जब पड़ोसियों ने घर से कोई हलचल न होने पर पुलिस को सूचना दी और दरवाज़ा तोड़कर भीतर प्रवेश किया गया। तब तक जीवन बहुत पीछे छूट चुका था। सवाल यह नहीं कि मौत कैसे हुई, सवाल यह है कि इतनी देर तक किसी को खबर क्यों नहीं हुई?

जावेद फारुकी रिटायरमेंट के बाद अपनी पत्नी जबी, जो शिक्षिका हैं, और छोटी बेटी के साथ रहते थे। चार दिनों से पत्नी और बेटी बाहर गई हुई थीं, और इसी दौरान घर में अकेले रह रहे फारुकी को संभवतः हार्ट अटैक आया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। विडंबना यह रही कि पड़ोस में लोग रहते हुए भी किसी को समय पर यह अहसास नहीं हुआ कि घर के भीतर एक जीवन समाप्त हो चुका है।

भीड़ के बीच बढ़ता सन्नाटा

इस घटना को लेकर आहत सेंटर फॉर सेल्फ एंड करियर डेवलपमेंट (सीएससीडी) के डायरेक्टर डॉ. नवीन गुप्ता कहते हैं. ‘जावेद फारुकी की मृत्यु हमें गहराई से सोचने को मजबूर करती है। हम एक ऐसे दौर में हैं, जहां बाहरी शोर के बीच भीतर खामोशी घातक बन चुकी है। एक ओर रेस्तरां लोगों से भरे हुए हैं, पर्यटन स्थल भीड़ से अटे पड़े हैं और सड़कें जाम से कराह रही हैं, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति भीतर से असहनीय एकाकीपन से जूझ रहा है। यह त्रासदी हमारे सामाजिक ताने-बाने, रिश्तों की औपचारिकता और उस अदृश्य अकेलेपन पर सवाल खड़े करती है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।‘

साथ रहते हुए भी दूर

विडंबना यह है कि परिवार साथ रहते हुए भी दूर हैं। बच्चे करियर और सुविधाओं की तलाश में भौगोलिक ही नहीं, भावनात्मक रूप से भी दूर चले गए हैं। दिन की शुरुआत ‘नमस्ते’ से होती है और अंत ‘गुड नाइट’ पर, बीच का समय किसी नोटिफिकेशन की भेंट चढ़ जाता है। घंटों नहीं, बल्कि कई-कई दिनों तक परिवार के साथ बैठकर खुलकर बातचीत करना भी दुर्लभ होता जा रहा है। सुबह-शाम की औपचारिक नमस्ते या चरणस्पर्श ही मानो रिश्तों की पूरी परिभाषा बन गई है। बुजुर्गों के लिए पूछना, सुनना, समझना अब समय की बर्बादी समझा जाने लगा है।

वृद्धाश्रम: मजबूरी या विकल्प?

इसी खालीपन का परिणाम है कि आज अच्छे वृद्धाश्रमों की मांग बढ़ रही है। यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का बदलता स्वरूप है। अब ‘फाइव स्टार’ वृद्धाश्रम केवल अंतिम विकल्प नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक जीवनशैली बनते जा रहे हैं, जहां बुजुर्ग अपने जैसे लोगों के बीच, बिना बोझ बने, कुछ सुकून के पल तलाशना चाहते हैं। यह सोच अपने आप में एक गंभीर प्रश्न है कि क्या घर अब भावनात्मक सुरक्षा नहीं दे पा रहे?

डॊ. नवीन गुप्ता बताते हैं, ‘उनके एक मित्र ने पहले ही एक अच्छे वृद्धाश्रम में कुछ धन जमा कर अपने लिए कमरा बुक कर लिया है, ताकि हमउम्र लोगों के बीच कुछ समय सुकून से बिता सकें। कई बुजुर्ग मानने लगे हैं कि साल में कुछ महीने ऐसे स्थानों पर बिताना शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से अधिक उपयोगी हो सकता है।‘

यह समाज के लिए चेतावनी है

सीतापुर की यह घटना हमें झकझोरती है। यह बताती है कि अकेलापन केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की बीमारी बन चुका है। अगर समय रहते रिश्तों में संवाद, संवेदना और सहभागिता नहीं लौटी तो आगे भी बंद दरवाजों के पीछे ऐसे ही जिंदगियां खामोश होती रहेंगी और हम अखबारों में एक और ‘शव मिला’ पढ़कर आगे बढ़ जाएंगे।

अब भी वक्त है। किसी पड़ोसी से हाल पूछ लेना, माता-पिता के पास कुछ देर बैठ जाना, मोबाइल रखकर बातचीत कर लेना, ये छोटे कदम शायद किसी बड़े हादसे को रोक सकें। हम समय रहते अपने आसपास के लोगों को देखें, सुनें और महसूस करें, क्योंकि कई बार एक साधारण दस्तक, एक फोन कॉल या एक हालचाल पूछना किसी ज़िंदगी को बचा सकता है। क्योंकि मौत से अधिक डरावना है वह जीवन, जो जीते-जी किसी को याद न आए।

SP_Singh AURGURU Editor