यूपी में एसआईआर और भाजपा का सच: सीएम योगी के चिंता जताने के बावजूद भाजपाइयों की उदासीनता की वजह बता रही है कि भाजपा का कार्यकर्ता वह नहीं रहा, जिसके लिए उसकी पहचान हुआ करती थी

उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) की रफ्तार ने सत्ता के शीर्ष तक बेचैनी पैदा कर दी है। चिंता सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक रीढ़ की है, जिस पर भाजपा की पहचान टिकी रही है। योगी आदित्यनाथ की चेतावनी के बावजूद जमीनी सक्रियता का ठंडा पड़ना इस बात का संकेत है कि भाजपा का कार्यकर्ता का कार्यकर्ता वह नहीं रहा, जो पार्टी के प्रति उसके समर्पण की पहचान था। भाजपा का कार्यकर्ता बदल चुका है, और पार्टी के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है। ऐसा लगता है कि पार्टी के सत्तारूढ़ होने के साथ भाजपा का वर्कर भी सुविधाभोगी हो चुका है। अब घर-घर जाकर एसआईआर के फॊर्म भरवाने में उसे शायद तौहीन लगती है।

Dec 20, 2025 - 13:03
 0
यूपी में एसआईआर और भाजपा का सच: सीएम योगी के चिंता जताने के बावजूद भाजपाइयों की उदासीनता की वजह बता रही है कि भाजपा का कार्यकर्ता वह नहीं रहा, जिसके लिए उसकी पहचान हुआ करती थी

आंकड़े जो भाजपा नेतृत्व को बेचैन करते हैं

निर्वाचन आयोग द्वारा चल रही एसआईआर प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश के पुराने 15.44 करोड़ मतदाताओं के मुकाबले अब तक सिर्फ करीब 12 करोड़ फॉर्म जमा होना, सवालों की कतार खड़ी करता है। मुख्यमंत्री का आकलन कि शेष चार करोड़ में 80–90 प्रतिशत भाजपा समर्थक हो सकते हैं, संगठन की नींद उड़ाने के लिए काफी है। इसी आशंका के चलते मुख्यमंत्री का प्रदेशव्यापी दौरा, मंडल मुख्यालयों पर सांसद-विधायक से लेकर जिलाध्यक्षों तक के साथ बैठकें, सब हुआ। असर? सीमित।

निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त बीएलओ द्वारा घर-घर जाकर एसआईआर के फॊर्म उपलब्ध कराने की व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए राजनीतिक दलों की ओर से भी क्षेत्रवार बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) नियुक्त किये गये हैं। आगरा का ही उदाहरण लें तो भाजपा के बीएलए इस प्रक्रिया में बहुत कम संख्या में बीएलओ के साथ नजर आए।

क्यों नहीं चल रहा संगठन का इंजन?

असल समस्या उत्साह के साथ, समन्वय की कमी की भी है। जिलाध्यक्ष और मंडल अध्यक्षों के बीच खींचतान ने कमान ढीली कर दी है। मंडल अध्यक्षों की निष्ठा संगठन से ज्यादा ‘सिफारिशकर्ता’ सांसद या विधायक के प्रति दिखती है। नतीजा, जिलाध्यक्ष का निर्देश हवा हो जाता है, फील्ड खाली रह जाता है।

दूसरी बड़ी वजह आयातित नेतृत्व है। बाहर से आए नेताओं के समर्थकों को पद तो मिल गए, पर इनके अंदर भाजपा की कार्यप्रणाली नहीं आ पाई। पार्टी के काम को वे उसी ढर्रे पर लेते हैं, जैसा पुराने दलों में था, न अनुशासन, न समर्पण और न जवाबदेही।

भाजपा का समर्पित वर्ग: मेहनत भी, मोहभंग भी

भाजपा की विचारधारा के लिए काम करने वाला एक वर्ग आज भी एसआईआर में जी-जान से जुटा है, बिना किसी पद के, बिना शोर किए। लेकिन इसी वर्ग का बड़ा हिस्सा उपेक्षा से क्षुब्ध होकर किनारे बैठ गया है। कारण साफ है। कुछ जूनियर या नए चेहरे ‘साम-दाम-दंड-भेद’ से पैसा कमा रहे हैं, पार्टी की बदनामी हो रही है, फिर भी कार्रवाई नहीं। पहले शिकायत पर सख्ती होती थी, आज चुप्पी है। यही चुप्पी कार्यकर्ता को खामोश कर रही है।

विधायकों का निजी नेटवर्क, संगठन का खालीपन

स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि जिन इलाकों में एसआईआर फॉर्म कम हैं, वहां विधायक संगठन से उम्मीद छोड़कर निजी नेटवर्क के सहारे काम करा रहे हैं। यानी पार्टी का कैडर पीछे, व्यक्तिगत व्यवस्था आगे, यह भाजपा जैसी पार्टी की संगठनात्मक स्थिति के लिए शुभ संकेत नहीं।

खतरे की घंटी क्यों नहीं सुनाई दे रही?

मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद भी भाजपा कार्यकर्ताओं का सक्रियता का न बढ़ना बताता है कि समस्या सतही नहीं, संरचनात्मक है। भाजपा की ताकत हमेशा उसका अनुशासित, समर्पित कार्यकर्ता रहा है। अगर वही उदासीन हो जाए, तो चुनावी मशीनरी भी लड़खड़ाती है।

एसआईआर महज एक प्रक्रिया नहीं, संगठन का आईना है। आंकड़े डराते हैं, लेकिन उनसे ज्यादा डरा रहा है भाजपा कार्यकर्ता का मौन। अगर भारतीय जनता पार्टी को अपनी पुरानी धार वापस चाहिए, तो संदेश साफ है, समन्वय बहाल हो, आयातित नेतृत्व को प्रशिक्षण मिले, और भ्रष्ट आचरण पर तत्काल कार्रवाई दिखे। वरना खतरे की घंटी बजती रहेगी, और सुनने वाला कोई नहीं होगा।

SP_Singh AURGURU Editor