नगर निगम अधिनियम पर भाजपा के दो पार्षदों ने ही मेयर को कठघरे में खड़ा किया, सामान्य सदन व कार्यकारिणी बैठकों का आंकड़ा नियमों के मुकाबले महज़ 24%, पार्षद रवि माथुर बोले- नगरायुक्त को 10 लाख तक के काम ऒफलाइन कराने का अधिकार शासन व कार्यकारिणी से मिला हुआ है
आगरा। नगर निगम में कानून की दुहाई देने वाली महापौर खुद ही नियमों के घेरे में आ गई हैं। एक ओर हेमलता दिवाकर कुशवाह लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री को नगर निगम अधिनियम 1959 के उल्लंघन की शिकायत करती हैं, तो दूसरी ओर उन्हीं के कार्यकाल में नियमों की धज्जियां उड़ने के आरोप उनकी ही पार्टी के पार्षद खुलकर लगा रहे हैं। सदन की बैठक से लेकर कार्यकारिणी तक, हर स्तर पर नियमों का पालन न होने के गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
दूसरी ओर नगर निगम सदन की बगैर अधिकारियों की मौजूदगी के दो दिन पहले हुई बैठक में पास हुए निंदा प्रस्ताव को मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह ने सीधे मुख्यमंत्री को भेजा है। प्रस्ताव के साथ ही मेयर ने नगर निगम प्रशासन पर तमाम आरोप लगाते हुए खासकर ऒफलाइन हो रहे निर्माण कार्यों की जांच कराए जाने की मांग फिर से उठाई है।
कानून की बात, लेकिन खुद ही उल्लंघन के आरोप
महापौर द्वारा मुख्यमंत्री को बताया गया था कि नगर निगम में निर्माण कार्य ऑफलाइन प्रक्रिया से कराए जा रहे हैं, जो नगर निगम अधिनियम 1959 के विपरीत है। लेकिन नगर निगम अधिनियम का ही हवाला देकर भाजपा के वरिष्ठ पार्षद रवि माथुर और राकेश जैन ने मेयर को कठघरे में खड़ा कर दिया है। विगत दिवस हुए नगर निगम सदन की बैठक में इन दोनों पार्षदों ने कहा कि नगर निगम में अधिनियम का पालन शुरू से ही नहीं हो रहा है।
बैठकों का गणित: आंकड़े खुद बयां कर रहे हालात
दोनों भाजपा पार्षदों के मुताबिक अब तक सदन की करीब 17 सामान्य बैठकें हो जानी चाहिए थीं, लेकिन हुईं सिर्फ चार। यही नहीं कार्यकारिणी की 35 बैठकें अपेक्षित थीं, जबकि हुईं मात्र नौ। जबकि नगर निगम अधिनियम साफ कहता है कि हर महीने कार्यकारिणी की एक बैठक अनिवार्य है। हर दो महीने में सदन की सामान्य बैठक जरूरी है। इन आंकड़ों ने मेयर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
रवि माथुर तो सदन की सामान्य बैठकें और कार्यकारिणी की बैठकें नियमित न होने से बेहद आहत हैं। वे कहते हैं कि सदन दोनों बैठकें बुलाने का अधिकार मेयर के पास है और नगर आयुक्त को इसका पालन करना होता है। उन्होंने कहा कि ऐसा कई बार हो चुका है कि सदन की बैठक बुलाई गई। एजेंडा भी जारी हो गया और ऐन मौके पर बैठक स्थगित कर दी गई। रवि माथुर कहते हैं, पार्षदों के पास अपनी बात कहने का एकमात्र माध्यम सदन की सामान्य बैठक है। वह भी नियमों के अनुसार नहीं हो रहीं तो पार्षद कहां जाएं और जनता के सवालों का जवाब कैसे दें।
नगरायुक्त को दस लाख के काम ऒफलाइन कराने का अधिकार है
भाजपा पार्षद रवि माथुर ने बुधवार को प्रेसवार्ता कर कहा कि नगर आयुक्त को दस लाख रुपये तक के कार्य ऒफलाइन कराने का अधिकार है। श्री माथुर ने कहा कि जब वे कार्यकारिणी समिति के उप सभापति थे, तब उन्होंने ही इस आशय का प्रस्ताव रखा था कि नगर आयुक्त को 10 लाख रुपये तक के कार्य ऒफलाइन कराने का अधिकार दिया जाए। श्री माथुर ने कहा कि उन्होंने यह प्रस्ताव शासनादेश के अनुरूप रखा था, जिसमें नगरायुक्त को 10 लाख रुपये तक के कार्य कराने का अधिकार होने की बात कही गई थी। दस लाख रुपये से ऊपर के कार्य ऒनलाइन टेंडर में जाएंगे।
पार्षद रवि माथुर के इस खुलासे से मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह द्वारा बनाये जा रहे उस माहौल की भी हवा निकल गई है, जिसमें वे मुख्यमंत्री से यह शिकायत करके आई थीं कि नगरायुक्त ने 40-50 करोड़ के कार्य ऒफलाइन कराए हैं, जिससे नगर निगम को नौ करोड़ की क्षति होने का अनुमान है। मेयर इसी मुद्दे पर नगरायुक्त को घेर रही थीं, लेकिन अब उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठतम पार्षद ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। रवि माथुर के अनुसार तो नगरायुक्त द्वारा जो भी कार्य कराए गए हैं, वे उन्होंने शासन और कार्यकारिणी से प्रदत्त अधिकार के तहत किए हैं।
मेयर vs नगर आयुक्त की जंग में पिस रही जनता
भाजपा के एक और पार्षद राकेश कनौजिया ने भी विगत दिवस सदन की बैठक के दौरान मेयर के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी थी। उनका कहना था कि जंग महापौर और नगर आयुक्त के बीच चल रही है, जिसका खामियाजा सीधे जनता भुगत रही है। उन्होंने दो टूक कहा कि जनता को इस लड़ाई से कोई मतलब नहीं, लेकिन जवाब हमें देना पड़ता है। जनता हमारी गर्दन पकड़ती है, ऐसे में हम उन्हें कैसे संतुष्ट करें?
राकेश कनोजिया ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि कार्यकाल के 3 साल बीत चुके हैं और अगर यही हाल रहा तो आने वाले 2 साल में जनता को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। वरिष्ठ पार्षदों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में सिस्टम की खामियां उजागर कर दीं।
सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम
नगर निगम में बैठकों की अनदेखी, नियमों की अनदेखी और आपसी टकराव इन सबने मिलकर आगरा के समूचे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब बड़ा सवाल यही है कि कानून की बात करने वाले खुद कानून का पालन कब करेंगे?