ट्रेन की टक्कर से अपंग हुई हथनी की बच्ची बानी की जिजीविषा की जीत: दो साल के उपचार ने रचा चमत्कार, अब सहारे बिना खड़ी हो रही है अनाथ हथनी
आगरा/मथुरा। रेल पटरी पर मौत से संघर्ष करती एक नन्ही जान, जिसने दो साल पहले जीवन की उम्मीद लगभग खो दी थी, आज वही बानी उम्मीद, करुणा और वैज्ञानिक उपचार की मिसाल बन चुकी है। उत्तराखंड में एक भीषण ट्रेन दुर्घटना में मां को खोने और खुद गंभीर रूप से घायल होने के बाद मथुरा के हाथी अस्पताल में लाई गई अनाथ हथनी बानी ने अपने उपचार के दो साल पूरे कर लिए हैं। यह कहानी केवल एक हाथी की नहीं, बल्कि समय पर हस्तक्षेप, विशेषज्ञ देखभाल और मानवीय संवेदना की जीत की कहानी है।
रेल हादसा, मां की मौत और लकवाग्रस्त जीवन
दो साल पहले उत्तराखंड में तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आने से 9 महीने की मादा हथनी की बच्ची गंभीर रूप से घायल हो गई थी। हादसे में उसकी मां की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि बानी पटरी से गिरकर बुरी तरह जख्मी हो गई। उसके पिछले पैर लकवाग्रस्त हो गए थे और वह अपने पैरों पर खड़ी तक नहीं हो पा रही थी। जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही इस नन्ही हथनी के लिए तत्काल मदद ही एकमात्र उम्मीद थी।
वन विभागों की तत्परता और जीवनरक्षक फैसला
उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के वन विभागों की त्वरित और समन्वित कार्रवाई ने बानी की जिंदगी की दिशा बदल दी। उसे तत्काल मथुरा स्थित हाथी अस्पताल परिसर ले जाया गया, जहां वाइल्डलाइफ एसओएस ने उसका इलाज शुरू किया। यह फैसला बानी के लिए जीवनरक्षक साबित हुआ।
दो साल का कठिन पुनर्वास और वैश्विक सहयोग
जब बानी अस्पताल पहुंची, तब उसका शरीर लगभग निष्क्रिय हो चुका था। बीते दो वर्षों में वाइल्डलाइफ एसओएस की पशु-चिकित्सा टीम ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से उसके लिए एक गहन और बहुआयामी पुनर्वास योजना लागू की। इन निरंतर प्रयासों का परिणाम यह है कि अब बानी बिना किसी सहारे के खड़ी हो सकती है, जो अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है। हालांकि वह अभी भी पिछले पैरों को कुछ हद तक घसीटकर चलती है, लेकिन उसकी चाल में लगातार सुधार हो रहा है। उसके पैरों की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए जूते इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिससे तलवों को नुकसान न पहुंचे।
सुरक्षित बाड़ा, मानसिक सक्रियता और सर्दियों की खास व्यवस्था
बानी के बाड़े को उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें एक पूल, खरोंचने के लिए प्राकृतिक पेड़, रोलर-ड्रम फीडर और केज फीडर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।
सर्दियों में उसके बाड़े को मोटी चादरों से ढका जाता है, वह ऊन से भरी तिरपाल की जैकेट पहनती है और रात में हेलोजन लाइटों के नीचे गर्म रखी जाती है, जिससे उसे आरामदायक तापमान मिल सके।
दो साल पूरे होने पर खास जश्न
अपने उपचार के दो साल पूरे होने पर वाइल्डलाइफ एसओएस टीम ने बानी के लिए एक विशेष पौष्टिक भोज तैयार किया। उसके नियमित दलिया के साथ चावल से बना केक और तरबूज, पपीता, अमरूद, केला, कद्दू, चुकंदर और खजूर जैसे फलों का समृद्ध भोज शामिल था। यह जश्न उसके अब तक के संघर्ष और प्रगति का सौम्य उत्सव था।
वाइल्डलाइफ एसओएस के पशु-चिकित्सा सेवाओं के उप-निदेशक डॉ. इलयाराजा एस संस्था के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण औप वाइल्डलाइफ एसओएस की सह-संस्थापक और सचिव गीता शेषमणि ने कहा बानी रिकवरी, समर्पित देखभाल और करुणा की शक्ति का जीवंत उदाहरण है।