हम सब रावण हैं- हमारे भीतर बैठा अत्याचारी तानाशाह ही असली दुश्मन!

हर साल रावण को जलाने का नाटक करते हैं, पर असली रावण कभी मरता नहीं, वो हमारे भीतर जिंदा रहता है। जब कोई कमजोर पर हुकूमत करता है, जब अहंकार से किसी की आत्मा तोड़ता है, वहीं से तानाशाही जन्म लेती है। धर्म, सत्ता, पूंजी और रिश्ते, सब इस भीतर के रावण की अलग-अलग मुखौटे हैं। असली दशहरा तभी होगा, जब इंसान अपने अंदर के इस मौन तानाशाह को पहचानकर ‘ना’ कहने का साहस जुटाएं। यही बगावत इंसानियत की आख़िरी उम्मीद है।

Oct 5, 2025 - 11:40
 0
हम सब रावण हैं- हमारे भीतर बैठा अत्याचारी तानाशाह ही असली दुश्मन!

-बृज खंडेलवाल-

वो रावण जिसे हम हर साल दशहरे पर जलाते हैं, शायद कभी मरता ही नहीं। उसका एक हिस्सा हमारे भीतर जिंदा रहता है। जब हम किसी कमजोर पर हुकूमत करते हैं, जब हम किसी को बोलने नहीं देते, जब हम अपने अहंकार से किसी का मन तोड़ते हैं। हम मशालें लेकर “बुराई के अंत” का तमाशा करते हैं, मगर असल बुराई तो हमारे ही भीतर मुस्कुराती रहती है — एक मौन तानाशाह के रूप में।

हम सबके भीतर एक सूक्ष्म, चालाक, पर बेहद खतरनाक तानाशाह पलता है- जो दूसरों पर हुकूमत करने में आनंद महसूस करता है। यही कारण है कि धर्म, पूंजी, सत्ता और यहां तक कि प्रेम के रिश्तों में भी अत्याचार का चेहरा बार-बार लौट आता है। इंसान आज भी उतना ही खूंखार तानाशाह है जितना मध्यकाल का कोई राजा — बस उसकी तलवार और बंदूकों की जगह अब शब्दों और व्यवहार की हो गई है।

धर्म से बाज़ार तक: तानाशाही के बदलते रूप

पुराने ज़माने में तानाशाही धर्म के नाम पर होती थी। पादरी और राजा अपनी सत्ता को “ईश्वर की मर्ज़ी” बताते थे। 15वीं सदी के स्पेन का इन्क्विज़िशन याद कीजिए, जहाँ हज़ारों निर्दोष लोगों को जिंदा जला दिया गया, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने चर्च की आज्ञा नहीं मानी। भारत में भी अंग्रेज़ों ने मिशनरियों और धर्म के नाम पर जनता को गुलाम बनाया। “सभ्यता” के नाम पर उन्होंने भूख, अपमान और लूट का साम्राज्य खड़ा किया।

फिर विचारधारा आई — और उसने वही खेल नए नाम से खेला। स्टालिन, माओ, पोल पॉट — सबने समानता के नाम पर लाखों को कुचल डाला। विचारधारा सिर्फ एक मुखौटा थी, जिसके नीचे सत्ता का वही पुराना चेहरा मुस्कुराता रहा।

अब धर्म और विचारधारा दोनों पीछे हैं — तानाशाही ने नया लिबास पहन लिया है — बाज़ार का। आधुनिक पूँजीपति अब “आज़ादी” और “विकास” के नाम पर इंसानों की आत्मा निचोड़ रहे हैं।

अमेरिका में ट्रंप की नीतियाँ इसका जीवंत उदाहरण हैं — जहाँ टैक्स कट्स ने अरबपतियों को तोहफ़े दिए और मज़दूरों को महँगाई का कोड़ा। अब 2025 के उनके नए टैरिफ़, गरीबों की जेब से रोटी छीनने की तैयारी हैं।

भारत में भी धर्म और पूँजी का यह गठजोड़ साफ दिखता है। सांप्रदायिक श्रेष्ठता के नाम पर हिंसा, जाति के नाम पर भेदभाव, और धर्म के नाम पर राजनीति — यह सब जनता के मन में बैठे तानाशाह का ही खेल है। सऊदी अरब में मज़दूरों का शोषण हो या हमारे यहाँ धार्मिक स्थलों और बाजार की साझी तानाशाही — सत्ता का केंद्र अब “आस्था” और “पैसे” का मिलाजुला रूप बन चुका है।

रोज़मर्रा के तानाशाह: सत्ता की छोटी क्रूरताएं

तानाशाह अब सिर्फ संसद या राजमहलों में नहीं रहते — वो दफ्तरों, घरों और दिमाग़ों में बसते हैं। वो अकाउंटेंट जो किसी गरीब कर्मचारी का पेमेंट महीनों रोक देता है; वो दुकानदार जो अपने मज़दूर को गालियाँ देकर “काम सिखाता” है; वो बॉस जो छोटे से गलती पर किसी की आत्मा तोड़ देता है — ये सब छोटे-छोटे रावण हैं, जिनका दहन कभी नहीं होता।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "हमने बाजारों में ऐसे मालिक देखे हैं जो मज़दूरों को इंसान नहीं, औज़ार समझते हैं। तनख्वाह काटना, बेइज़्ज़ती करना, “तू” कहकर बुलाना — यह आधुनिक दासता का नया चेहरा है। उनके पास लकदक सूट हैं, पर दिलों में वही पुराना सामंती अहंकार। और घरों में भी यही दृश्य दोहराया जाता है। पति “कमाने” के अहंकार में पत्नी को मौन सज़ा देता है। कहीं सास अपने “अनुभव” के नाम पर बहू पर हुकूमत करती है। कहीं माँ-बाप बच्चों पर अपने सपनों की तानाशाही थोपते हैं। प्रेम और रिश्ते भी अब सत्ता के खेल बन गए हैं — जहाँ भावनाएँ नहीं, आदेश चलते हैं।"

हमारे समाज की विडंबना यही है कि हम “लोकतंत्र” का दावा करते हैं, पर व्यवहार में अभी भी फ्यूडल , सामंतवादी सोच ज़िंदा है। हम नेता की आलोचना करते हैं, पर अपने घर में उसी की तरह पेश आते हैं। "कितनी बहुएं आज भी पिटती हैं, कितने बच्चे हिंसा का शिकार होते हैं, हर जगह, हर समय सिर्फ मैं  में मैं की गूंज सुनाई देती है, मैने ये किया, मैने वो किया, यही सामाजिक तानाशाही है," कहती हैं सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर।

भीतर के रावण को पहचानना

हम हर साल रावण जलाते हैं, पर भीतर का रावण और भी ताकतवर होकर लौट आता है — हमारे शब्दों में, हमारी चुप्पियों में, हमारे व्यवहार में। असली युद्ध लंका में नहीं, हमारे भीतर है। तानाशाही कभी बाहर से नहीं आती, वह हमारे डर, हमारी असुरक्षा और हमारे झूठे गर्व से जन्म लेती है।

अगर हम सचमुच किसी तानाशाह को गिराना चाहते हैं, तो पहले अपने भीतर के छोटे तानाशाह को पहचानना होगा — वो जो कमजोर को नीचा दिखाकर सुकून पाता है, जो आदेश देने में गर्व महसूस करता है, जो दूसरों की चुप्पी को अपनी जीत समझता है।

अंत नहीं, शुरुआत

तानाशाही का मुकाबला सिर्फ कानून से नहीं, साहस से होता है।

जब कोई मज़दूर अपने मालिक से कहे “अब बस”,

जब कोई पत्नी अपने पति की गालियों पर चुप न रहे,

जब कोई बच्चा अपने माता-पिता से कहे कि “मुझे भी सुनो”—

तभी असली दशहरा होगा।

हर बगावत एक शब्द से शुरू होती है — “ना।” यह “ना” ही पहला वार है उस भीतर के रावण पर जो हर रोज़ नया रूप लेता है। और शायद उसी दिन, जब हम सब अपने भीतर के इस अदृश्य तानाशाह का दहन करेंगे — तभी दुनिया थोड़ी आज़ाद होगी, थोड़ी इंसानियत बची रहेगी।

SP_Singh AURGURU Editor