ईरान को दुश्मन बनाकर ही बिकते हैं हथियार: यही है अमेरिका की रणनीति
आगरा। ईरान और इजराइल के बीच छिडे युद्ध को लेकर आगरा में भी चिंता जताई जा रही है। शहर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और मस्जिदों से भी युद्धविराम की अपील उठी हैं। जामा मस्जिद, रावली और बोदला क्षेत्र में आम नागरिकों ने शांति की दुआ के साथ खाड़ी देशों की भूमिका पर सवाल उठाए। हिंदुस्तानी बिरादरी ने इस युद्ध में अमेरिका की भूमिका को सवालों के घेरे में लिया है।
पश्चिम एशिया में ईरान-इज़राइल युद्ध के पीछे की रणनीति पर गंभीर चिंता जताते हुए हिंदुस्तानी बिरादरी के अध्यक्ष डॉ. सिराज कुरैशी ने कहा कि यह सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि युद्ध का व्यवसायीकरण है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका, खासकर डोनाल्ड ट्रंप, इस पूरे युद्ध को हथियार व्यापार का ज़रिया बना रहे हैं।
उन्होंने कहा, ट्रंप चाहते हैं कि ईरान ज़ख़्मी रहे, लेकिन मरे नहीं। क्योंकि एक ज़िंदा दुश्मन ही अरब देशों को हथियार बेचने का आधार बनता है। अमेरिका की असली नीति यही है।
डॉ. कुरैशी के मुताबिक इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी कमीशन की चेतावनी और चीन-रूस की सक्रियता यह दिखाती है कि अमेरिका खुद सीधे युद्ध में नहीं कूदा है, लेकिन पर्दे के पीछे उसकी ही चालें चल रही हैं।
हिंदुस्तानी बिरादरी के वाइस चेयरमैन विशाल शर्मा ने कहा कि अमेरिका ने सऊदी, यूएई और क़तर को अरबों डॉलर के हथियार बेचे हैं और यह सिलसिला तभी चलता है जब ईरान जैसा कोई स्थायी खतरा बना रहे। ट्रंप की नजर में युद्ध एक उत्पाद है और शांति एक दुर्घटना।
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ज़ियाउद्दीन ने कहा कि अमेरिका को न फिलिस्तीन से सहानुभूति है, न ईरान से दुश्मनी। मक़सद केवल डॉलर कमाना है। उन्होंने कहा, ट्रंप कभी संयम की बात करते हैं, कभी युद्ध को हवा देते हैं, यह सब एक सुनियोजित खेल है।
भारतीय मुस्लिम विकास परिषद के अध्यक्ष समी आग़ाई ने कहा कि यह युद्ध अंततः आम मुसलमानों को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने इस्लामी देशों की चुप्पी को दुखद बताते हुए कहा कि भारत जैसे देश को शांति की पहल करनी चाहिए, क्योंकि अब यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक असंतुलन की वजह बन रहा है।