काहे के विश्व गुरु? जब गुड मैनर्स और तहजीब की भाषा ही लुप्त हो रही हो?
आज के समाज में लुप्त होती शिष्ट भाषा, अदब और मानवीय संवेदनशीलता गहरी चिंता का विषय है। तकनीकी दक्षता के साथ-साथ विनम्रता, कृतज्ञता और सहानुभूति का अभाव सामाजिक पतन का संकेत है। भाषा ही व्यक्ति और समाज की असली पहचान होती है। बिना तहज़ीब के विश्व गुरु होने का दावा खोखला है।
-बृज खंडेलवाल-
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।
कबीर दास का कहना था, ऐसी मीठी और विनम्र बातें करो कि मन का अहंकार (आपा) दूर हो जाए। इससे दूसरों को शांति और सुख मिले, और खुद भी शीतल (शांत व प्रसन्न) हो जाओ।
लेकिन आज समाज में मीठी वाणी लुप्त हो रही है। सोशल मीडिया की अनॉनिमिटी, बढ़ता तनाव, सांस्कृतिक बदलाव और डिजिटल समझ की कमी से गाली-गलौज सामान्य बन गई है। असहिष्णुता बढ़ी है।
क्या शिक्षा बिना सभ्यता के, भाषा बिना शिष्टाचार के, और रवैये बिना कृतज्ञता के कोई मायने रखती है? हम किस तरह के भविष्य के नागरिक पैदा कर रहे हैं, जो तकनीक में माहिर तो हैं, लेकिन दिलों को जोड़ने वाली तहजीब से महरूम? आज की पीढ़ी, जेन ज़ी (Gen Z) के नाम से जानी जाने वाली, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन बोलचाल की मिठास और अदब की कमी से समाज की जड़ें कमजोर पड़ रही हैं। "कृपया", "धन्यवाद" और "माफ कीजिए" जैसे छोटे-छोटे शब्द, जो रिश्तों को मजबूत बनाते हैं, धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। उनकी जगह ले रही है गालियों की भाषा, अधूरे वाक्यों की जल्दबाजी और एक-दूसरे के प्रति उदासीनता। यह सिर्फ भाषाई प्रदूषण नहीं, बल्कि दिलों के बीच बढ़ती दूरी है, जो पीढ़ियों के संवाद को मुश्किल बना रही है।
दुनिया के कई देशों में, बच्चों को बचपन से ही कृतज्ञता, अनुशासन और दूसरों की इज्जत सिखाई जाती है। कुछ साल पहले मैंने जापान के स्कूलों का भ्रमण किया था। देख कर हैरान था, वहां स्कूलों में तमीज, समय की पाबंदी और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल का सलीका सिखाया जाता है। बच्चे "सुमिमासेन" (माफ कीजिए) और "अरिगातो" (धन्यवाद) जैसे शब्दों से परिचित होते हैं, जो उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। नतीजा? एक ऐसा समाज जहां सहानुभूति और शालीनता की नींव मजबूत है। इसके विपरीत, हमारे यहां नेताओं तक को शिष्टाचारी भाषा की समझ नहीं है। "सब चलता है" की सोच हावी हो रही है। क्यू तोड़ना, दूसरों के प्राइवेट स्पेस में दखल देना, नियमों को मजाक समझना, ये सब आम हो गए हैं। सड़कों पर हॉर्न की तेज आवाज, बसों में धक्कामुक्की और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, ये सब उस संस्कारहीनता के लक्षण हैं, जो समाज को खोखला बना रही है।
यह हालात चिंताजनक हैं। बिना सहानुभूति, सब्र और शालीनता के कोई समाज मजबूत नहीं रह सकता। अगर आज हम अदब नहीं सिखाते, तो कल सिर्फ तेज रफ्तार होगी, इंसानियत नहीं। जग जाहिर है कि हमारा समाज संस्कारविहीन होता जा रहा है। थोड़ा-सा पद, पैसा या प्रतिष्ठा पाते ही लोग दूसरों की उपेक्षा करने लगते हैं, जो बिल्कुल उचित नहीं। मधुर भाषा बोलने में किसी तरह का आर्थिक नुकसान नहीं होता। इसलिए मीठा बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। यह छोटी-छोटी आदतें ही हैं जो बड़े बदलाव लाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में इन मूल्यों की क्या जगह है? स्कूलों में पाठ्यक्रम तो भरे पड़े हैं, लेकिन जीवन के सबक कहां हैं? माता-पिता व्यस्त हैं, टीचर दबाव में, और बच्चे स्क्रीन्स में खोए हुए। नतीजा, एक ऐसी पीढ़ी जो स्मार्ट है, लेकिन संवेदनशील नहीं।
इस कमी को समझाने के लिए एक पुरानी कथा याद आती है, जो आज भी प्रासंगिक है। एक बार एक राजा अपने सहचरों के साथ शिकार खेलने जंगल में गया। शिकार के चक्कर में वे एक-दूसरे से बिछड़ गए। राजा अपने साथियों को खोजते हुए एक नेत्रहीन संत की कुटिया में पहुंचा और पूछा, "महाराज, क्या आपको इधर से किसी के गुजरने की आहट मिली?" संत ने शांत भाव से कहा, "महाराज, सबसे पहले आपके सिपाही गुजरे हैं, फिर आपके मंत्री, और अब आप स्वयं पधारे हैं। इसी रास्ते से आगे जाएं, तो मुलाकात हो जाएगी।"
राजा संत के बताए रास्ते पर घोड़ा दौड़ाया और जल्दी ही अपने साथियों से मिल गया। सब कुछ संत के कथनानुसार ही था, सिपाही आगे, मंत्री उनके पीछे। लेकिन राजा के मन में एक सवाल घर कर गया: नेत्रहीन संत को कैसे पता चला कि कौन किस ओहदे का है? लौटते समय राजा अपने अनुचरों के साथ संत की कुटिया में पहुंचा और पूछा, "महाराज, आप नेत्रविहीन होते हुए भी कैसे जान गए कि कौन जा रहा है?"
संत मुस्कुराए और बोले, "महाराज, आदमी की हैसियत का ज्ञान नेत्रों से नहीं, उसकी बातचीत से होता है। सबसे पहले जब आपके सिपाही गुजरे, तो उन्होंने मुझसे कहा, 'ऐ अंधे, इधर से किसी के जाते हुए की आहट सुनाई दी क्या?' मैं समझ गया कि ये संस्कारविहीन व्यक्ति छोटी पदवी वाले सिपाही ही होंगे।"
"फिर जब आपके मंत्री आए, तो उन्होंने पूछा, 'बाबाजी, इधर से किसी को जाते हुए...' मैं समझ गया कि ये किसी उच्च ओहदे वाले हैं, क्योंकि बिना संस्कारित व्यक्ति बड़े पद पर नहीं पहुंचता। इसलिए मैंने कहा कि सिपाहियों के पीछे मंत्रीजी गए हैं।"
"और जब आप स्वयं आए, तो आपने कहा, 'सूरदासजी महाराज, आपको इधर से निकलकर जाने वालों की आहट तो नहीं मिली?' मैं समझ गया कि आप राजा ही हो सकते हैं। क्योंकि आपकी वाणी में आदरसूचक शब्दों का समावेश था। दूसरों का आदर वही कर सकता है, जिसे खुद आदर प्राप्त होता है। जिसे कभी कोई चीज नहीं मिलती, वह उसके गुणों को कैसे जान सकता है!"
संत ने आगे कहा, "दूसरी बात, यह संसार एक वृक्ष स्वरूप है। वृक्ष में डालियां तो बहुत होती हैं, लेकिन जिस डाली में ज्यादा फल लगते हैं, वही झुकती है। इसी अनुभव के आधार पर मैंने, नेत्रहीन होते हुए भी, सिपाहियों, मंत्रियों और आपके पद का पता लगाया। अगर गलती हुई हो, तो क्षमा करें।"
राजा संत के अनुभव से इतना प्रभावित हुआ कि उसने संत की जीवन-वृत्ति का प्रबंध राजकोष से करने का आदेश दिया और वापस महल लौट आया।
यह कथा हमें सिखाती है कि भाषा और रवैया हमारी पहचान बनाते हैं। पद कितना भी ऊंचा हो, बिना शिष्टाचार के वह खोखला है। आज की जेन ज़ी को अगर हम स्मार्ट बनाना चाहते हैं, तो साथ में संवेदनशील भी बनाएं। स्कूलों में संस्कारों की शिक्षा अनिवार्य हो, माता-पिता उदाहरण बनें, और समाज "सब चलता है" की बजाय "सब सही चलता है" की ओर बढ़े। तभी हम एक मजबूत, सभ्य समाज का निर्माण कर पाएंगे। अन्यथा, तेज रफ्तार में हम इंसानियत को पीछे छोड़ देंगे। क्या हम तैयार हैं इस बदलाव के लिए?Top of Form
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