जब एक मुर्दा रहा 15 घंटे तक राजनीति का शिकार, क्यों और कहां, जानिए

आगरा। अछनेरा थाना क्षेत्र के हंसेला के मजरा नगला बंजारा में आज एक मुर्दे को भी राजनीति का शिकार होना पड़ गया। बीमारी से मृत इस गांव के कप्तान सिंह पुत्र सागर का शव 15 घंटे तक अपने अंतिम संस्कार का इंतजार करता रहा। दाह संस्कार इसलिए नहीं हो पा रहा था क्योंकि गांव की राजनीति में दो बड़े भी अप्रत्यक्ष रूप से इनवाल्व हो गए थे। 

Nov 11, 2024 - 18:00
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जब एक मुर्दा रहा 15 घंटे तक राजनीति का शिकार, क्यों और कहां, जानिए
अछनेरा थाना क्षेत्र के नगला बंजारा गांव में अंतिम संस्कार के इंतजार में रखा कप्तान सिंह का शव।

नगला बंजारा ऐसा गांव है जहां पर कोई श्मशान घाट नहीं है। गांव के लोग लम्बे समय से श्मशान स्थल की मांग करते आ रहे हैं। इसी गांव के एक किसान के खेत के पास दो विस्वा भूमि सरकारी है। इसी जमीन पर लोग श्मशान स्थल बनाने की मांग करते चले आ रहे हैं। 

इसके लिए एसडीएम से लेकर तहसीलदार के यहां तक गुहार लगाई जा चुकी है। उधर ये सरकारी भूमि जिस किसान के खेत के पास है, उसका कहना था कि इस दो विस्वा भूमि के बदले वह चार बिस्वा भूमि देने को तैयार है, लेकिन वह यह जमीन न होकर दूसरी जगह पर थी। 

इस किसान ने विगत छह नवंबर को इस आशय का दानपत्र भी तहसीलदार को दे दिया था, लेकिन किसान के इस दानपत्र पर भी तहसील प्रशासन ने कोई फैसला नहीं लिया। 

गांव में अभी यह खींचतान चल ही रही थी कि विगत रात्रि गांव के कप्तान सिंह पुत्र सागर की मृत्यु हो गई। कप्तान सिंह के परिवारीजन शव को अंतिम संस्कार करने के लिए उसी दो विस्वा सरकारी भूमि के पर लेकर पहुंच गए, जिसे गांव वाले श्मशान भूमि घोषित करने की मांग करते चले आ रहे हैं। 

दरअसल जिस किसान के खेत के पास ये सरकारी भूमि है, उसने इसे अपने खेत का हिस्सा बना लिया है। किसान यह तो मानता है कि दो विस्वा सरकारी भूमि है। वह यह भी कहता है कि गांव में श्मशान स्थल होना चाहिए, लेकिन इस किसान का एक ही अनुरोध था कि इस दो विस्वा जमीन को उसके खेत का हिस्सा बन जाने दिया जाए और इसके बदले में वह चार विस्वा यानि इससे दूनी जमीन दूसरी जगह पर देने को तैयार है। 

इस आशय का दानपत्र भी किसान द्वारा तहसीलदार को दिया जा चुका है। तहसीलदार के यहां से कोई निर्णय हो पाता कि इससे पहले कप्तान सिंह की मौत हो गई और गांव का एक पक्ष इसी सरकारी भूमि पर अंतिम संस्कार की मांग पर अड़ गया। 

दो विस्वा सरकारी भूमि पर कप्तान सिंह का शव पहुंच चुका था, लेकिन किसान की आपत्ति के कारण उसका अंतिम संस्कार नहीं हो सका। पार्टीबंदी के आधार पर गांव दो खेमों में बंट गया। गांव की पार्टीबंदी में सत्ता पक्ष के दो बड़ों का हाथ भी अपने अपने पक्ष के लोगों के सिर पर है। गांव वालों की मानें तो बात दोनों बड़े नेताओं तक भी पहुंच चुकी थी। 

इधर गांव में अंतिम संस्कार रुकने की सूचना मिली तो पुलिस भी दौड़ी-दौड़ी मौके पर पहुंची। लोगों को समझाया लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद तहसीलदार, एसीपी और एसडीएम समेत अन्य सरकारी अमला भी गांव में पहुंच गया। 

सरकारी अधिकारी गांव के दोनों पक्षों के लोगों को समझाकर किसी प्रकार रास्ता निकालने की कोशिश करते रहे, लेकिन मामला नहीं सुलझा। चूंकि दो विस्वा सरकारी भूमि राजस्व रिकार्ड में श्मशान भूमि के रूप में अभी दर्ज नहीं हुई थी, इसलिए अधिकारी उसे श्मशान भूमि बताकर अंतिम संस्कार भी नहीं करा सकते थे। 

गांव की आपसी चकल्लस में 15 घंटे बीत गए। कप्तान सिंह का शव उसी दो विस्वा सरकारी भूमि पर अपने दाह संस्कार का इंतजार करता रहा। थक-हार कर कप्तान सिंह के परिवारीजनों ने उसका अंतिम संस्कार अपनी निजी भूमि पर ही किया। इसके बाद अधिकारियों ने भी राहत की सांस ली। 

SP_Singh AURGURU Editor