जब देश की उड़ानें ज़मीन पर आ गिरीं: इंडिगो के धड़ाम से बैठे इंजन ने खोखला कर दिया भारत का पूरा विमानन तंत्र
इंडिगो के संकट ने पूरे भारतीय विमानन तंत्र की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। नियामकों की लापरवाही, पायलटों की कमी, अव्यवस्थित नीति, किराया–लूट और यात्रियों की बदहाली ने साबित कर दिया कि एक एयरलाइन के डगमगाने से पूरा ढांचा कैसे चरमरा जाता है।
-बृज खंडेलवाल-
बेंगलुरू एयरपोर्ट की चमकती रोशनियों के बीच, दो ज़िंदगियां एक ही सवाल से टकरा रहीं थीं—आख़िर उड़ानें रुकी क्यों?
हाथरस का प्लंबर राम भरोसी बहन की शादी के लिए दहेज़ का कुछ सामान लेकर बेंगलुरू एयरपोर्ट पर अटक गया, पर मंडप सज गया, फेरे हो गए… और वह टर्मिनल की कुर्सी पर ही ठगा-सा बैठा रह गया। दूसरी ओर, आगरा घूमने निकला रामस्वामी परिवार बैग्स के पहाड़ के बीच फँसा था, उनकी होटल की बुकिंगें धरी रह गईं, जेब भी हल्की हो गई, फ्लाइट कैंसिल हो चुकी थी।
दो तीन दिनों में दिल्ली-मुंबई से दर्जनों लोग अपनी इंटरनेशनल फ्लाइट्स मिस कर चुके हैं। सैकड़ों यात्री अभी भी टर्मिनल में इधर-उधर भटक रहे हैं, न कोई ठीक जवाब, न कोई समाधान। इस अव्यवस्था का असली कसूरवार कौन है? व्यवस्था या नीति निर्धारक?
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, जहां आमतौर पर हवाई पंखों की गूंज से आसमान कांपता रहता है, आजकल सन्नाटे के साए में अजीब सी रहस्यात्मक आपदा से घिरे हुए हैं!!
इंडिगो के हज़ारों पंख एक साथ मुर्दा हो गए, और देश के एयरपोर्ट यात्री शिविर बन गए, हर कोने में बेबस चेहरों की भीड़, चमकती स्क्रीनों पर “डिलेड” और “कैंसिल्ड” के लाल अक्षर, थके कर्मचारियों की घबराहट और यात्रियों की चीखती बेचैनी। जैसे किसी ने पूरे आकाश पर “ऑफ” का बटन दबा दिया हो।
रातभर जागते लोग ज़मीन पर अख़बार बिछाकर सोने लगे, बच्चे दूध के लिए रोते रहे, एयरलाइन काउंटरों पर इंसाफ़ की भीख मांगते यात्रियों की आंखों में सिर्फ़ एक सवाल था, “अब उड़ान कब?” किसी के पास जवाब नहीं था।
यह किसी एक दिन की खराबी नहीं, बल्कि सालों से पलती उस लापरवाही का चरम था जिसे भारत का विमानन तंत्र हमेशा ‘तकनीकी दिक्कत’ कहकर टालता रहा है।
जब इंडिगो का इंजन बैठा, तो सिस्टम की पोल खुली। देश का सबसे बड़ा एयरलाइन, जिसके कांपते ही पूरा ढांचा चरमरा जाता है, यही मॉडल हमारी नीति की असली विफलता है। अकासा और एयर इंडिया एक्सप्रेस जैसे छोटे खिलाड़ी अपने पैरों पर टिके रहे, पर जब एक कंपनी का झटका पूरे उद्योग को हिला दे, तो समझ लीजिए ‘वन-कंपनी नेशन’ बन चुका है।
DGCA का कदम उतना ही देर से आया जितना ‘माफ़ी’ किसी हादसे के बाद आती है। पांच दिसंबर को उसने FDTL नियमों का अर्ध-निलंबन किया, न अर्ध-साहस दिखा न पूरा समाधान। मंत्रालय ने जांच कमेटी गठित कर औपचारिकता पूरी कर दी, मानो हर संकट को ठंडे बयानों से सुलाया जा सकता है।
सालों से देश के पास न कोई विमानन आपदा प्रबंधन नीति है, न सार्वजनिक डेटा, न किराया नियंत्रण, न जवाबदेही तय करने की पारदर्शी प्रणाली। और यह तब जबकि हर साल 11 करोड़ से ज़्यादा यात्री हवाई सफ़र करते हैं जिनमें ज्यादातर वे हैं जिनके लिए हवाई टिकट लक्ज़री नहीं, बची हुई नौकरी या समय पर अस्पताल पहुंचने की उम्मीद होती है।
इंडिगो का संकट मार्च 2024 में बोया गया बीज था, जब हाई कोर्ट के आदेश से नए FDTL नियम लागू होने थे। नौ महीने का वक्त मिला, मगर इंडिगो ने न अतिरिक्त पायलट रखे, न बैकअप प्लान बनाया। डीजीसीए को भी परवाह नहीं थी कि उड़ानें कौन उड़ाएगा। और जैसे ही दिसंबर की धुंध आई, पायलटों की कमी की हवा ने पूरा ढांचा उड़ा दिया।
देश के एयरपोर्टों पर उस दिन अराजकता थी, हज़ार उड़ानें रद्द, विमान ज़मीन पर जाम होकर खड़े, और बाकी एयरलाइंस देरी की चेन में फंसी रहीं। जिनके टिकट कैंसिल हुए, वे नए टिकट चार गुना कीमत पर खरीदने को मजबूर हुए। दिल्ली–चेन्नई 68 हज़ार, दिल्ली–मुंबई 40 हज़ार। यह “डायनामिक प्राइसिंग” नहीं, बल्कि खुलेआम संकट-लूट का दूसरा नाम था।
ऐसे में मंत्रालय को अधिकतम किराया कैप लगाना चाहिए था, ट्रेनें चलानी चाहिए थीं, अतिरिक्त उड़ानें मंज़ूर करनी चाहिए थीं, एयरपोर्टों पर मुआवज़ा डेस्क खोलनी चाहिए थी। पर हुआ सिर्फ़ एक औपचारिक एडवाइजरी, जैसे घोषणा ही समाधान हो।
असलियत यह है कि इंडिगो तो कुछ दिनों में उड़ान भर लेगा, मगर देश का नियामक अभी भी नींद में है। जब तक मंत्रालय और डीजीसीए को समझ नहीं आता कि जवाबदेही और दूरदर्शिता कॉर्पोरेट एडवाइजरी से नहीं आती, यह संकट मुसीबत की तरह दोबारा लौटेगा। भारत को अब पायलटों की नहीं, जागे हुए नियामकों की ज़रूरत है। उड़ानें फिर उभर सकती हैं, व्यवस्था अगर धरातल से उठने को तैयार हो।