आगरा क्यों पिछड़ रहा है? योजनाओं की भ्रांतियां, नेतृत्व का अभाव और चमचागिरी की बेड़ियां!

आगरा के औद्योगिक और योजनागत विकास की गति सशक्त नेतृत्व, दूरदर्शी रणनीति और इच्छाशक्ति के अभाव में बाधित हो रही है। दर्जनों संस्थाएं होते हुए भी स्वार्थ, फोटोबाज़ी और चमचागिरी के चलते शहर प्रगति की दौड़ में मथुरा, गाजियाबाद और कानपुर जैसे शहरों से पिछड़ता जा रहा है। जब तक नेतृत्व सामूहिक हित को प्राथमिकता नहीं देगा और प्रशासन तंत्र प्रजा-तंत्र के अनुरूप कार्य नहीं करेगा, तब तक आगरा विकास की मुख्यधारा में नहीं आ पाएगा।

Jul 25, 2025 - 11:15
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आगरा क्यों पिछड़ रहा है? योजनाओं की भ्रांतियां, नेतृत्व का अभाव और चमचागिरी की बेड़ियां!

आगरा! दुनिया के सात अजूबों में शुमार ताजमहल के शहर को भले ही विश्व पटल पर सांस्कृतिक और पर्यटन मानचित्र में अद्वितीय स्थान मिला हो, लेकिन विकास और औद्योगिक नवाचार की दौड़ में यह लगातार पिछड़ता जा रहा है। कारण गहराई में तलाशें तो सबसे बड़ा संकट सशक्त नेतृत्व और दूरदर्शी प्लेटफॉर्म की कमी नजर आती है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आगरा जैसे संभावनाशील शहर में दर्जनों ट्रेड संगठन, आधा दर्जन राष्ट्रीय व प्रादेशिक संस्थाएं होने के बावजूद कोई ठोस रणनीति आकार नहीं ले पा रही। आखिर दोष किसका है? क्या हम स्वयं दोषी नहीं? सवाल यह है कि क्या केवल स्वार्थ, फोटोबाजी और चमचागिरी के चलते शहर का विकास अवरुद्ध हो रहा है?

न संवाद की तैयारी, न पैनी पैरवी

अधिकांश संगठन केवल नाम भर को हैं। कोई भी प्रतिनिधि प्रदेश स्तर की जानकारी जुटाने के लिए तैयार नहीं। न ही हमारे मंच शासन-प्रशासन तक योजनाओं को दमदारी से रख पाते हैं। नतीजा ये होता है कि अखबारों में खबरें उन्हीं की चलती हैं जो सत्ताधारी खेमे के हित में हों या फिर जिनके पीछे जेबी संस्थाएं खड़ी हों।

मथुरा, जेवर, गाजियाबाद हमसे आगे क्यों?

कभी मथुरा से बहुत आगे रहने वाला आगरा अब उससे भी पिछड़ता नजर आ रहा है। जेवर एयरपोर्ट और यमुना एक्सप्रेसवे का सर्किट मथुरा को नई गति दे रहा है, वहीं गाजियाबाद एजुकेशन हब और कारोबारी नगरी के रूप में चमक रहा है। कानपुर जूता उद्योग में लंबी छलांग लगा चुका है। हम यहां न कार्गो सेंटर बना सके, न एमएनसी बेस, न कोई प्रमुख कॉर्पोरेट हब।

संजय गांधी की सोच का हुआ बंटाधार

कभी स्व. संजय गांधी ने आगरा को पेरिस बनाने का सपना देखा था। जहां आज संजय प्लेस है, वहां पहले मौजूद सेंट्रल जेल को इसीलिए शिफ्ट किया गया था। संजय प्लेस इसकी बुनियाद था, जहां जूता ट्रेडिंग की रीढ़ खड़ी होनी थी। आज वहां मुश्किल से एक चौथाई जूता व्यापारी हैं। यही हाल कपड़ा व्यापार का है। हर बरसात में बाजार डूबते हैं, पार्किंग नदारद है और स्ट्रीट वेंडरों की भरमार ने ग्राहकों को शहर से दूर कर दिया है।

पर्यावरण नीति के नाम पर उद्योगों की बलि

ढलाई घर, डीजल इंजन, जनरेटर, जूता, पेठा, मार्बल, जरदोज़ी, आर्टिफिशियल ज्वेलरी, इन सभी पर पर्यावरणीय नियमों की तलवार लटक रही है। सरकार धार्मिक पर्यटन पर तो ध्यान दे रही है, लेकिन रोजगार और उद्यमिता के स्रोत कुंठित हो रहे हैं।

जूता मंडी की अधूरी इमारतें और भूले-बिसरे बोर्ड

मायावती शासनकाल में पंचकुइया रोड पर जूता मंडी के लिए बहुमंजिला भवन बना, जो आज भी उपयोग की बाट जोह रहा है। इसी प्रकार जयपुर हाईवे पर प्रस्तावित लैदर पार्क जमीन अधिग्रहण के बाद भी आकार नहीं ले सका है। कहीं लेम्को भवन, कहीं भारत लेदर बोर्ड, सब काल के गाल में समा गए। इनमें से अधिकांश भवन और संस्थान कुछ खास लोगों की मलाईखोरी के शिकार बन गए हैं।

आगरा चौपाटी और शहीद स्मारक, पालीवाल पार्क और सुभाष पार्क पुनरुद्धार, स्मार्ट सिटी मिशन, संजय खान भूमि विवाद, टीटीजेड के प्रतिबंध, एसटीपीआई भवन, मिनी क्लस्टर और म्यूज़ियम परियोजना जैसी तमाम परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन नतीजा शून्य ही दिखता है।

ट्रांसपोर्ट नगर और कालिंदी विहार अधूरी महत्वाकांक्षाएं

ट्रांसपोर्ट नगर और कालिंदी विहार में न तो पेठा यूनिट पहुंची और न ही ट्रांसपोर्ट हब आकार ले सका। कुछ ऑफिस जरूर खुले, पर असल कारोबार वहीँ है जहाँ नर्क जैसी स्थिति हर बारिश में देखने को मिलती है।

मेट्रो से कुछ उम्मीदें, पर नियोजन फिर भी अधूरा

मास्टर प्लान, आईआईटी की रिपोर्टें, स्मार्ट सिटी मिशन, म्यूजियम परियोजना, सब फाइलों में बंद हैं। मेट्रो से कुछ उम्मीद है, लेकिन यदि कार्गो परिवहन की सुविधा न आई तो केवल पैसेंजर बेस ट्रांसपोर्ट शहर के उद्योग को गति नहीं दे सकेगा।

इच्छाशक्ति, नीयत और दूरदृष्टि की दरकार

जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति और ठोस नेतृत्व नहीं होगा, तब तक योजनाएं कागज़ों पर ही दम तोड़ती रहेंगी। सिर्फ आयोजन नहीं, अब अभियान और अनुशासन की जरूरत है। शहर को चमचों से नहीं, विचारशील नेतृत्व से प्रगति मिलेगी।

-राजीव गुप्ता 'जनस्नेही कलम' से
लोक स्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor