यूपी में एक्सप्रेस वेज क्यों बन रहे डेथवेज़? लापरवाह और तेज़ रफ़्तार सड़कों को क़त्लगाह बना रही है
उत्तर प्रदेश की एक्सप्रेसवे सड़कों पर तेज़ रफ़्तार, कमजोर निगरानी और संस्थागत लापरवाही ने उन्हें डेथवे में बदल दिया है। हर हादसा सिर्फ़ जान नहीं लेता, बल्कि परिवार, रोज़गार और अर्थव्यवस्था को भी तबाह कर देता है। रात में ओवरस्पीड, थके या नशे में ड्राइवर, अपर्याप्त पेट्रोलिंग, देर से एम्बुलेंस और सुरक्षा निवेश की कमी, ये सब मिलकर रोज़ मौतों का सिलसिला बना रहे हैं। जब तक सख़्त क़ानून-पालन, आधुनिक निगरानी और जवाबदेही लागू नहीं होती, विकास की ये सड़कें क़त्लगाह बनी रहेंगी।
-बृज खंडेलवाल-
मरोड़े हुए लोहे के ढांचे से एक-एक कर शव निकाले जा रहे हैं। कुछ ही मिनट पहले यही ढांचा हंसता-खेलता परिवार था, छुट्टियां मनाने निकला हुआ। खून से सनी सीटों के बीच एक बच्चे का जूता पड़ा है। टूटी हुई स्टीयरिंग एक बेजान जिस्म को जकड़े हुए है। कहीं खोपड़ी सीट से टकराकर चटक गई, कहीं पलटी गाड़ी के नीचे हाथ-पैर कुचल गए। यह किसी दुर्लभ या अचानक हुए हादसे की डरावनी तस्वीर नहीं है। यह भारत की सबसे तेज़ सड़कों की रोज़मर्रा की हक़ीक़त है। उत्तर प्रदेश की एक्सप्रेसवे सड़कों पर मौत अब कोई मेहमान नहीं, बल्कि रोज़ का मुसाफ़िर बन चुकी है।
हर टक्कर सिर्फ़ ज़िंदगी नहीं छीनती, वह बरसों की मेहनत और पूँजी को भी पल भर में राख कर देती है। ट्रक, बस, ट्रैक्टर और निजी गाड़ियाँ, जिन पर लोगों की रोज़ी-रोटी टिकी होती है, चंद सेकंड में कबाड़ बन जाती हैं। घर का कमाने वाला चला जाए तो बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है, इलाज सपना बन जाता है और रसोई की आग ठंडी पड़ने लगती है। जली हुई खेप, कुचला हुआ माल और बर्बाद वाहन, ये सब मिलकर हर साल करोड़ों के आर्थिक नुकसान में बदल जाते हैं। यहाँ दुख सिर्फ़ निजी नहीं है; यह आर्थिक है, सामाजिक है और पूरे सिस्टम को खोखला कर देने वाला है।
फिर भी हर रात, उन चमचमाती काली सड़कों पर, जिन्हें कभी विकास की धमनियाँ बताया गया था, परिवार उजड़ते रहते हैं। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर एक बस 140 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से अँधेरे को चीरती हुई दौड़ती है। मील के पत्थरों के बीच कहीं उसकी मुलाक़ात मौत से हो जाती है। आँकड़ों में एक और संख्या जुड़ जाती है। सोशल मीडिया पर एक और संवेदना संदेश लिखा जाता है। “जाँच” और “समीक्षा” के वादे सुबह होते-होते हवा हो जाते हैं। जो सड़कें कभी तरक़्क़ी की पहचान थीं, वे अब चुपचाप मौत के फंदे बन चुकी हैं, सरकार द्वारा बनाई गईं, सरकार द्वारा चलाई गईं और सरकार की ही बेपरवाही में छोड़ी गईं।
आँकड़े इस सच्चाई को और भी बेरहम बना देते हैं। सिर्फ़ 2025 के पहले नौ महीनों में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर 1,077 हादसे और 94 मौतें दर्ज हुईं। इनमें से 70 प्रतिशत मौतें रात के समय हुईं। रात का यह ख़ूनी आंकड़ा दिन के मुक़ाबले लगभग दोगुना है और यह साफ़ दिखाता है कि निगरानी और क़ानून-पालन में कितनी बड़ी चूक है। एक वरिष्ठ सड़क-सुरक्षा विशेषज्ञ का कहना है, “अगर हालात नहीं बदले तो इन सड़कों को ‘एक्सप्रेसवे’ नहीं, ‘एक्सप्रेस डेथवे’ कहना पड़ेगा।”
यमुना एक्सप्रेसवे तो पहले ही इस बदनामी की मिसाल बन चुका है। 2012 से 2023 के बीच यहाँ 1,320 लोगों की जान गई और 11,000 से ज़्यादा लोग घायल हुए, औसतन हर साल 110 मौतें। सिर्फ़ 2024 में 165 किलोमीटर के इस हिस्से पर 462 लोग मारे गए, यानी लगभग हर किलोमीटर पर तीन मौतें। इसकी तुलना मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे या दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे से करें तो उत्तर प्रदेश की तस्वीर और भी शर्मनाक हो जाती है।
पिछले कुछ महीनों की खबरें टाली जा सकने वाली त्रासदियों की सूची जैसी लगती हैं। नवंबर 2024 में बस-ट्रक की टक्कर में पाँच मौतें। एक तेज़ रफ़्तार कैंटर कई कारों से टकराया, एक और जान गई। मार्च 2025 में टायर फटने से एसयूवी पलटी, तीन लोग मारे गए। जुलाई में मथुरा के पास कई हादसों में छह जानें चली गईं। नवंबर में छात्रों से भरी कार पलटी, फिर कुछ दिन बाद बस उलटी, घायल और मरे हुए। हर हादसे की वजह वही, तेज़ रफ़्तार, कोहरा, थकान या तकनीकी ख़ामी, और हर बार वही “वर्ल्ड-क्लास” सड़क।
इस संकट की जड़ सिर्फ़ इंजीनियरिंग की कमी नहीं है। यह लापरवाह ड्राइविंग और संस्थागत नाकामी का ज़हरीला मेल है। ओवरस्पीड, नींद में झूलते ड्राइवर और नशे में गाड़ी चलाना आम हो चुका है, क्योंकि सज़ा का डर नाममात्र है। वर्षों से विशेषज्ञ रात की स्पीड लिमिट घटाने, अनिवार्य विश्राम-स्थल और 24 घंटे निगरानी की माँग करते आ रहे हैं। लेकिन अफ़सोस, ये आवाज़ें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं।
ज़िम्मेदारी उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण और ट्रैफ़िक पुलिस जैसे संस्थानों पर आती है, जिनकी सुस्ती अब जानलेवा बन चुकी है। कैमरे हैं, लेकिन गिने-चुने। पेट्रोलिंग दुर्लभ है। एम्बुलेंस देर से पहुँचती हैं। ड्राइवरों के लिए सुरक्षित और रोशनी वाले विश्राम-स्थल लगभग नदारद हैं। टोल से हर महीने करोड़ों वसूले जाते हैं, लेकिन जीवन-रक्षक तकनीक और निगरानी में निवेश बेहद कम है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे पर पैदल यात्रियों और जानवरों की मौतें भी बढ़ रही हैं। सवाल उठता है, ये लोग और पशु इन बंद सड़कों पर आते कैसे हैं? हर हादसे के बाद सवाल उठता है, फिर अगले हादसे में दब जाता है।
यह अब सिर्फ़ सड़क-सुरक्षा का मामला नहीं रहा। यह शासन और ज़िम्मेदारी की पूरी नाकामी है। फ़ीता काटने और राजस्व गिनने में इंसानी जानें पीछे छूट गई हैं। जब तक रात में सख़्त क़ानून-पालन, अनिवार्य ड्राइवर प्रशिक्षण, वैज्ञानिक विश्राम-स्थल और टोल की कमाई से आधुनिक निगरानी व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तब तक यह क़त्लेआम रुकेगा नहीं।
आज भारत की एक्सप्रेसवे सड़कों पर एक कड़वी सच्चाई लिखी है, रफ़्तार जान लेती है, लेकिन असली हादसा व्यवस्था की नाकामी कराती है। जब तक जवाबदेही, बेपरवाही की जगह नहीं लेती, ये सड़कें विकास नहीं, मौत के सौदागर बने रहेंगे।Top of Form
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