डेढ़ दशक के लोकतंत्र के बाद नेपाल में राजशाही की आवाजें क्यों?
पड़ोसी मुल्क नेपाल में एक बार फिर उथल-पुथल है। 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद नेपाल में लोकतंत्र आया था। डेढ़ दशक की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद नेपाल में लोग एक बार फिर राजतंत्र की वापसी की मांग को लेकर आंदोलित हैं। दरअसल नेपाल की राजनीतिक पार्टियों ने नेपाल के लोगों को अब तक निराश ही किया है और इसी निराशा का लाभ उठाना चाहते हैं नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र। नेपाल की मौजूदा स्थिति पर एक रिपोर्ट-
-राजीव जैन-
नेपाल में फिर से शाही राज की आवाजें उठने लगी हैं। इसके साथ ही अधिकतर लोग चाहते हैं कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाएI इन मुद्दों को लेकर नेपाल में पिछले कुछ दिनों से लगातार प्रदर्शन किये जा रहे हैंl
नेपाल की जनता राजशाही के जाने के बाद लोकशाही में व्यापक रूप से फैले भ्रष्टाचार तथा भाई भतीजावाद को लेकर काफी नाराज हैl लोगों का मानना है कि राजतंत्र खत्म होने के बाद नेपाल में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। उल्टा लोकतंत्र के अंतर्गत राजनेताओं ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दींl नेपाल की जनता इस बात से भी परेशान है कि एक सरकार चीन के दबाव में काम करती है तो दूसरी भारत केl
नेपाल के लोगों की अपेक्षा थी कि राजशाही जाने के बाद वे अपने पैरों पर खड़े होकर नेपाली प्रभुसत्ता को कायम कर सकेंगेl बरसों बीत गए, किंतु नेपाली प्रभुसत्ता को कायम करने में लोकतंत्र के अंतर्गत जितनी भी राजनीतिक पार्टियां आईं, वो सफल नहीं हो सकीं l राजनीतिक पार्टियों की आपसी लड़ाइयां तथा गुटबंदिया इस कदर हावी हुईं कि पिछले 20 साल में कोई भी सरकार पांच साल तक कायम नहीं रह सकीl
हर दूसरे साल नेपाल को सरकार चुनने के लिए चुनाव कराने पड़ते हैं, जिससे धन का भारी अपव्यय होता है। फिर भी उन्हें टिकाऊ तथा भरोसेमंद सरकार नहीं मिल पातीI फ्लॉप सरकारों के लगातार आने से अब वहां की जनता में काफी निराशा हैl
राजशाही खत्म होने के बाद वहां के राजा चुपचाप फेल होती सरकारों को दूर से देख रहे थे। राजा ने निराश हुई जनता की भावनाओं को देखते हुए अब चुपचाप अपने मित्र नेताओं के माध्यम से नेपाल में प्रदर्शन शुरू करा दिए हैं। उनकी कोशिश है कि जनता को समझाया जाए के वर्तमान असफल सरकारों को छोड़कर लोग दोबारा राजतंत्र में विश्वास करेंl तमाम प्रयासों के बावजूद नेपाल में हिंदू राष्ट्र की स्थापना नहीं हो सकी। अतः अब यही शिगूफा फैलाने की कोशिश हो रही है कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाना है तो राजतंत्र को वापस लाना होगा क्योंकि लोकतांत्रिक सरकारों के रहते हुए नेपाल कभी हिंदू राष्ट्र नहीं बन सकताl
हमने नेपाल के व्यापारियों से बात की तो उन्होंने बताया कि नेपाल में व्यापार की स्थिति बहुत खराब हो चुकी है। शिक्षकों से बात करने पर बताया गया कि वर्तमान राजनीतिक दलों की प्रतिद्वंद्विता के कारण हर तरफ निराशा का माहौल हैl आर्थिक हालात लगातार कमजोर होते जा रहे हैंl इन लोगों से समाधान पूछा जाता है तो वे कंफ्यूज हो जाते हैं कि वे जायें तो किधर जाएंl
वे मानते हैं कि अगर चीन का सहारा लेते हैं तो उसके दूरगामी दुषप्रभाव होंगे क्योंकि चीन की विस्तारवादी नीति से वह हमेशा डरे रहते हैं, जबकि भारत के साथ उनके रिश्ते खटास भरे हो गए हैं। नेपाली लोग कहते हैं कि भारतीय उन्हें अपेक्षित इज्जत प्रदान नहीं करते और बहादुर कहकर बुलाते हैंl
इसी कन्फ्यूजन का फायदा उठाकर वर्तमान में पूर्व राजा की कोशिश है कि वे अपनी पुरानी शक्तियां फिर से कायम कर सकें, लेकिन वे अभी खुलकर सामने नहीं आतेl राजा द्वारा अपनी पालतू राजनीतिक पार्टियों के माध्यम से जनता के बीच इस तरह के संदेश भेजे जाते हैं क़ि राजा ही नेपाल को हिंदू राष्ट्र बना सकते हैंI राजा भी इस बात को समझते हैं कि नेपाल के लिए चीन की निकटता कभी भी रिस्की हो सकती है जबकि भारत से रिश्ते बनाने में विस्तारवादी रिस्क नहीं हैl हिंदू राष्ट्र के शिगूफे के साथ वह नेपाल में फिर से सत्ता पाना चाहते हैंl
नेपाल की जनता को समझना चाहिए क़ि चीन के भुलावे में न आकर भारत से अपनी नजदीकियां फिर से पुनर्स्थापित करें तथा राजशाही की गुलाटियों से भी बचकर रहेंl इसी में उनकी भलाई हैl
(लेखक नेपाल के एवरेस्ट बैंक, काठमांडी में उप महाप्रबंधक पद पर कार्यरत रहे हैं)