क्या सुमन विवाद से बदल पाएगी समाजवादी पार्टी की राजनीतिक ज़मीन?
राणा सांगा पर सांसद रामजी लाल सुमन के बयान और इस बयान के विरोध तक समाजवादी पार्टी इस मामले में अपने सांसद के बचाव तक सीमित दिख रही थी, लेकिन करणी सेना के सांसद आवास पर उग्र प्रदर्शन और अब राणा सांगा की जयंती के आगरा में बड़े आयोजन के बाद सपा इस मुद्दे को ठंडा नहीं होने देना चाहती। पार्टी को यह मुद्दा दलितों से जुड़ने का एक अवसर नजर आ रहा है।
-एसपी सिंह-
आगरा। सपा सांसद रामजी लाल सुमन द्वारा राणा सांगा को लेकर दिए गए विवादित बयान के बाद उपजे सियासी घमासान में अब समाजवादी पार्टी को संभावनाओं की एक नई दिशा दिखाई देने लगी है। जिस पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठजोड़ को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव आगे बढ़ रहे हैं, उसमें "डी" यानी दलित वर्ग का अब तक नाम तो है, लेकिन वास्तविक समर्थन का अभाव स्पष्ट रहा है।
बसपा के बिखरते जनाधार को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में सपा अब इस विवाद को 'दलित अस्मिता' से जोड़ने की रणनीति पर काम करती दिख रही है, भले ही इसके लिए उसे ‘राजपूत विरोधी’ होने का ठप्पा क्यों न झेलना पड़े।
विवाद से अवसर तक: सपा की रणनीति में आया बदलाव
शुरुआत में समाजवादी पार्टी इस पूरे मामले में सांसद सुमन के बचाव तक सीमित थी। लेकिन जैसे ही करणी सेना ने सांसद आवास पर उग्र प्रदर्शन किया, सपा की रणनीति में बड़ा बदलाव देखा गया।
सांसद सुमन, जो पहले अपने बयान पर सफाई दे रहे थे, अचानक कहने लगे कि वह माफ़ी नहीं मांगेंगे। यह यू-टर्न सपा की उस नई सोच का संकेत था, जिसमें उसे यह विवाद राजनीतिक लाभ दिलाने का एक ज़रिया नजर आया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुद भी शुरुआत में राजपूतों की नाराजगी न लेने के लिए राणा सांगा की वीरता का बखान कर रहे थे, लेकिन सुमन के आवास पर प्रदर्शन के बाद वे भी इस मुद्दे को दलित सांसद पर हमले के रूप में प्रचारित करते दिखे।
बसपा की चिंताएं और मायावती की सजगता
बसपा सुप्रीमो मायावती सपा की इस संभावित चाल को भांप चुकी हैं। यही वजह है कि अखिलेश यादव ने जब सुमन के आवास पर प्रदर्शन को दलित सांसद पर हमला बताया तो मायावती ने अखिलेश यादव को 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाते हुए दो टूक कहा कि सुमन को 'दलित सांसद' नहीं, 'सपा सांसद' कहें।
दरअसल मायावती यह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी कि समाजवादी पार्टी उनके वोट बैंक पर नजर डाले।
दलितों का भरोसा ही मायावती को अब तक देश में सबसे बड़ी दलित नेता बनाए हुए है। मायावती अच्छी तरह जानती हैं कि दलित समाज, खासकर जाटव वर्ग, अब भी उनके साथ जुड़ा हुआ है। हाल के चुनावों में भले ही बसपा का वोट बैंक कमजोर हुआ हो, लेकिन दलितों के बीच उनकी पकड़ बरकरार है। वे दलितों में फिर से भरोसा जगाने के लिए अपने संगठन को भी फिर से मोहल्ला स्तर पर पहुंचाने में जुट चुकी हैं।
राजपूत वोट बैंक की स्थिति और सपा का आकलन
उत्तर प्रदेश में राजपूत समाज पहले से ही भाजपा के पाले में रहा है, खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे नेताओं की मौजूदगी के चलते।
ऐसे में सपा नेतृत्व को इस वर्ग से कोई बड़ी उम्मीद नहीं है। इसलिए पार्टी ने राजपूतों की नाराजगी का जोखिम उठाने का फैसला किया है, ताकि वह दलित वर्ग को जोड़ने का प्रयास कर सके। हालांकि सपा के इस बदले हुए सोच से सपा में पहले से सक्रिय राजपूत नेताओं में बेचैनी है। ऐसी भी सूचनाएं हैं कि जिलों के स्तर पर तमाम राजपूत नेता पार्टी छोड़ भी चुके हैं।
सामाजिक समीकरण और नेतृत्व की खोज
सपा इस समय दो मोर्चों पर काम कर रही है। बसपा के शून्य होते जनाधार को भरना और विपक्षी खेमे में दलित नेतृत्व की कमी को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना। सांसद सुमन जैसे नेताओं के माध्यम से पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अब सपा ही दलितों की असली आवाज बन रही है। यह कोशिश ‘अस्मिता आधारित राजनीति’ को साकार रूप देने की दिशा में एक पहल है।
क्या बनेगा नया आधार?
हालांकि, यह दांव जोखिमों से मुक्त नहीं है। यदि मायावती ने अपना जनाधार साधे रखा और राजपूत समाज सपा से पूरी तरह कट गया, तो पार्टी को नुकसान ही उठाना पड़ेगा। लेकिन यदि सपा इस विवाद को सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित न रखकर, इसे नीतिगत प्राथमिकता, प्रतिनिधित्व और जमीनी संगठन में रूपांतरित कर पाई, तो यह 2024 के बाद की राजनीति में उसे एक नया स्थायी वोट बैंक भी दे सकता है।
चिंगारी से चिंगारी की तलाश
रामजी लाल सुमन का बयान भले ही विवाद का कारण बना हो, लेकिन समाजवादी पार्टी ने इसे संवेदनशील राजनीति की चिंगारी के रूप में देखा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सपा इस चिंगारी को दलित अस्मिता की आग में बदल पाती है या फिर यह सिर्फ एक क्षणिक राजनीतिक उठापटक बनकर रह जाएगी।