'मनोभाव', 25 साल पहले दिवाली का सामान महिलाएं घरों में बनाती थीं फिर मेले भी लगते थे, पढें राजीव गुप्ता की कलम से

आगरा। वे भी क्या दिन थे, इन दिनों तमाम कहानियां याद आ रही हैं। 25 साल पहले का वह जमाना खासकर याद आता है जब संपन्न परिवारों की महिलाएं अपने घर में तमाम चीजें या तो खुद तैयार करती थीं या अपने निर्देशन में तैयार कराती थीं। फिर उनकी मेले के रूप में प्रदर्शनी लगती। बिक्री भी होती थी। साथ में मनोरंजन के साधन भी हुआ करते थे।

Oct 29, 2024 - 16:11
Oct 29, 2024 - 16:11
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'मनोभाव',  25 साल पहले दिवाली का सामान महिलाएं घरों में बनाती थीं फिर मेले भी लगते थे, पढें राजीव गुप्ता की कलम से

बहुत ही नॉमिनल पैसे की टिकट लेकर पूरा शहर उमड़ता था इन मेलों में। मनोरंजन के साथ स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेते थे लोग। आतिशबाज़ी के नये प्रयोग होते थे। 

सन् 1975 से ऐसे आयोजन लायंस क्लब और महिला हस्तशिल्प संगठन द्वारा शुरू किए गए थे। लायंस क्लब और महिला संगठनों द्वारा लगाए जाने वाले मेले अब ज़मींदोज से हो गये हैं या इतिहास के पन्नों में दफ़न हो चुके हैं। 

कुछ लोगों का कहना यह है कि संपन्नता के आगे अब आदमी अपनी खरीद की हर चीज की हर समय पूर्ति करने लगा है। साथ ही उसकी इनकम भी पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है, जिस वजह से अब वह नए-नए उपभोग की वस्तुओं का आनंद लेने लगा है। 

वैसे तो समाज में हर जगह ही राजनीति होती है। प्रतिस्पर्धा की  वजह से भी ऐसे आयोजन विलुप्त होते हुए नजर आए हैं। अब मशीन के काम रुझान भी बढ़ गया है। अब सीमित परिवार की तरह ही हर संस्था द्वारा होटल और मैरिज गार्डन के अंदर इस तरह के आयोजन होने लगे हैं। 

SP_Singh AURGURU Editor