श्रीमनकामेश्वर रामलीला महोत्सव में करुणा, प्रेम और धर्म का अद्भुत संदेश
आगरा। गढ़ी ईश्वरा, दिगनेर, शमशाबाद रोड में चल रहे बाबा श्रीमनकामेश्वर रामलीला महोत्सव के आठवें दिन सोमवार को हुए मंचन ने श्रद्धालुओं की आंखों को आँसुओं से भर दिया और हृदय को भक्ति से परिपूर्ण कर दिया।
आगरा। गढ़ी ईश्वरा, दिगनेर, शमशाबाद रोड में चल रहे बाबा श्रीमनकामेश्वर रामलीला महोत्सव के आठवें दिन सोमवार को हुए मंचन ने श्रद्धालुओं की आंखों को आँसुओं से भर दिया और हृदय को भक्ति से परिपूर्ण कर दिया।
लीला का प्रारंभ दशरथ मरण प्रसंग से हुआ। राजा दशरथ पुत्रवियोग की वेदना में व्याकुल होकर राम का नाम लेते-लेते देह त्याग करते हैं। मंच पर जब दशरथ जी ने अंतिम सांस ली, तो दर्शक भावविभोर हो उठे और सम्पूर्ण वातावरण करुणा से भर गया। इसके बाद मंचित हुआ भारत मिलाप। नंदिग्राम में वनवास का व्रत लेकर रह रहे भरत जी जब चित्रकूट पहुंचे और श्रीराम से भेंट हुई, तो दोनों भाइयों का आलिंगन देखकर दर्शकों की आंखें छलक पड़ीं।
“मिलि गये दोउ भ्राता प्रेम-सरिता, बहि नयन जल झर-झर टपका।” इस मिलन ने भाईचारे, प्रेम और भक्ति की अद्भुत झलक प्रस्तुत की। आगे अगस्त्य ऋषि दर्शन प्रसंग का मंचन हुआ। ऋषि अगस्त्य ने भगवान श्रीराम का स्वागत कर उन्हें दिव्य बाण और धनुष प्रदान किए तथा धर्म पालन और असत्य के विनाश का संदेश दिया। यह प्रसंग रामलीला की आध्यात्मिक गरिमा को और ऊँचा करने वाला रहा।
संध्या का विशेष आकर्षण रहा पंचवटी आगमन प्रसंग। जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी पंचवटी पहुंचे, तो दर्शकों ने वनवास जीवन की झलक का सजीव अनुभव किया। “रामु लखन सिय संग बसा, पंचवटी सुखधाम। वन जीवन मंगलमय भयो, गूंजे राम-गुण-गान॥”
इस अवसर पर श्री महंत योगेश पुरी ने कहा कि दशरथ मरण हमें पुत्र और पिता के अटूट प्रेम की स्मृति कराता है, वहीं भारत मिलाप त्याग और भक्ति की परम पराकाष्ठा का संदेश देता है। पंचवटी की लीला हमें यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और मर्यादा का पालन ही सच्चा मार्ग है। मठ प्रशासक हरिहर पुरी ने बताया कि रामलीला के प्रत्येक प्रसंग में मानव जीवन के लिए गहन शिक्षा निहित है। अगस्त्य ऋषि के दर्शन और पंचवटी आगमन यह संदेश देते हैं कि प्रभु सदैव धर्म की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। मंगलवार को सीता हरण शबरी माता प्रसंग हनुमान जी से भेंट सुग्रीव से मित्रता आदि लीला मंचन होंगे।