‘बुजुर्गों की संगत में बैठे नहीं हो, घरों के शिवाले संभालोगे कैसे…’ गीत–ग़ज़ल के कारवां में वीर, श्रृंगार, करुणा और प्रेम रस की सतरंगी बारिश, ताज साहित्य उत्सव में कविताओं ने दिए संस्कारों से जुड़े रहने के गहरे संदेश

आगरा। जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल में आयोजित ताज साहित्य उत्सव–2026 के मंच पर जब गीत–ग़ज़ल का कारवां सजा, तो कभी चेहरे पर मुस्कान तैर गई, तो कभी आंखें नम हो उठीं। कहीं देश के लिए मर-मिटने का जज़्बा कविता बनकर गूंजा, तो कहीं बुजुर्गों, मां–बाप और संस्कारों से जुड़े रहने का संदेश शायरी के जरिए दिलों में उतरता चला गया। तालियों की गड़गड़ाहट और बार-बार उठती “वाह-वाह” की गूंज ने कवियों को सिर्फ प्रोत्साहित ही नहीं किया, बल्कि उन्हें आत्मानंद से भर दिया।

Jan 10, 2026 - 23:04
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‘बुजुर्गों की संगत में बैठे नहीं हो, घरों के शिवाले संभालोगे कैसे…’ गीत–ग़ज़ल के कारवां में वीर, श्रृंगार, करुणा और प्रेम रस की सतरंगी बारिश, ताज साहित्य उत्सव में कविताओं ने दिए संस्कारों से जुड़े रहने के गहरे संदेश
ताज साहित्य उत्सव में गीत गजल कारवां कार्यक्रम में मंच पर मौजूद कवि एवं साहित्यसेवी।

काव्य-सत्र की शुरुआत अभीसार गीता शुक्ला ने श्रीराम को समर्पित पंक्तियों से की—

रिस-रिस के दरिया जैसे रवानी पे आ गया,
वैसे ही दुख भी ख के पानी पर आ गया…
पतंगें, चरखियां हैं पर उड़ाना भूल जाता हूं…
उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति ने श्रोताओं के मन में गहरी छाप छोड़ी।

इसके बाद मनु वैशाली ने रिश्तों और स्मृतियों की संवेदनशील तस्वीर उकेरते हुए पढ़ा-

दिन ढलते रोज द्वारे पर बिछती थी एक खटिया,
बाबा बुलाते थे फिर—ओ कहां हो बिटिया…
और
चप्पल पहनकर जिनकी चलते थे शौक से हम,
तुम पूछते हो नंगे पांव में क्या रखा है…
जिसने श्रोताओं को संस्कारों और जड़ों की याद दिला दी।

सपना ने मां के हाथों के स्वाद और स्नेह को शब्दों में पिरोते हुए कहा-

रसोई में खुशी से चूमें हैं नैनें हाथ अपने,
बना है वैसा खाना जैसा मां बनाती है…

अंजु सिंह ने आधुनिक दौर की विडंबनाओं पर कटाक्ष करते हुए पढ़ा-

अजब हैं मायने इस दौर की गूंगी तरक्की के,
हंसी बेजान सी लब पर, बदन टूटे थकानों में…
साथ ही मां पर आधारित पंक्तियों—
फूलों की रंगोली है मां, आशाओं की डोली है मां…
से सभागार को भावुक कर दिया।

सपना मूलचंदानी ने श्रृंगार रस की रंगत बिखेरी-

अगर नाचूं नहीं तो पांव मेरे रूठ जाते हैं,
अगर नाचूं जरा खुलकर तो घुंघरू टूट जाते हैं…

मालविका चौधरी ने आत्मविश्वास और संघर्ष की आवाज बुलंद की-

कभी हवाओं में अपनी भी सदा गूंजेगी,
अभी तो शोर जमाने का सुन रहे हैं हम…

वहीं दीपा सैनी की पंक्तियां-

बुजुर्गों की संगत में बैठे नहीं हो,
घरों के शिवाले संभालोगे कैसे…
ने पूरे काव्य-सत्र का सार समेट दिया।

कार्यक्रम का सशक्त और संवेदनशील संचालन इटावा के कुमार मनोज कुमार ने किया। उन्होंने भी अपनी रचना-

नई तहज़ीब में पड़कर पुरानी भूल बैठे हैं,
बग़ीचे की हवा, बारिश का पानी भूल बैठे हैं…
सुनाकर श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया।

कुल मिलाकर, गीत–ग़ज़ल का यह कारवां केवल साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और सामाजिक चेतना का उत्सव बनकर सामने आया, जिसने ताज साहित्य उत्सव को एक नई ऊंचाई दी।

SP_Singh AURGURU Editor