इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला- मकान मालिक बोलेगा तो किरायेदार को घर-दुकान खाली करना होगा, टिप्पणी- नये कानून में मकान मालिक की जरूरत सर्वोपरि, ‘वास्तविक आवश्यकता’ या ‘तुलनात्मक कठिनाई’ साबित करने की बाध्यता नहीं रही
प्रयागराज। किरायेदारी विवादों में बड़ा और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उत्तर प्रदेश में मकान मालिक की आवश्यकता सर्वोपरि होगी। न्यायालय ने कहा है कि यदि मकान मालिक अपने उपयोग के लिए मकान या दुकान की जरूरत बताता है, तो किरायेदार को परिसर खाली करना ही होगा। पुराने कानून की तरह अब ‘वास्तविक आवश्यकता’ या ‘तुलनात्मक कठिनाई’ साबित करने की बाध्यता नहीं रही।
ऐतिहासिक फैसला, नए कानून की स्पष्ट व्याख्या
यह अहम निर्णय न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने श्याम पाल बनाम बी.एस. एंटरप्राइजेज मामले में सुनाया। अदालत ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 21(2)(a), (b) और (m) की व्याख्या करते हुए साफ किया कि मकान मालिक को अब अतिरिक्त कानूनी बोझ उठाने की जरूरत नहीं है।
यह था पूरा मामला
कानपुर नगर के गांधी नगर स्थित ‘P’ रोड पर मकान संख्या 106/376 में किरायेदार श्याम पाल मात्र 500 रुपये मासिक किराए पर दुकान चला रहे थे। संपत्ति के मालिक बी.एस. एंटरप्राइजेज ने विरासत में यह संपत्ति मिलने के बाद दुकान खाली कराने के लिए आवेदन किया। उनका तर्क था कि वे इस स्थान पर अपनी फर्नीचर कार्यशाला और आवास विकसित करना चाहते हैं।
किरायेदार की दलीलें हुईं खारिज
श्याम पाल ने अदालत में दलील दी कि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक नहीं है। उनके पास अन्य विकल्प मौजूद हैं। यह दुकान उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है और नोटिस सही तरीके से नहीं दिया गया। लेकिन अदालत ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि नए कानून में ये दलीलें अब प्रासंगिक नहीं रहीं।
निचली अदालतों का भी यही रुख था।
इसी मामले में 19 जून 2025 को किराया प्राधिकरण ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला दिया था। 30 जनवरी 2026 को किराया न्यायाधिकरण ने अपील खारिज कर दी थी। इसके बाद श्याम पाल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया
पुराने और नए कानून में बड़ा अंतर
अदालत ने स्पष्ट किया कि 1972 के पुराने कानून में मकान मालिक को ‘बोनाफाइड आवश्यकता’ साबित करनी होती थी। किरायेदार की तुलना में अपनी कठिनाई अधिक दिखानी होती थी, लेकिन 2021 के नए कानून में ये शर्तें पूरी तरह हटा दी गई हैं। अब केवल मकान मालिक की स्पष्ट आवश्यकता ही पर्याप्त है।
‘आवश्यकता’ का कानूनी अर्थ
न्यायालय ने विदेशी न्यायिक मिसाल आयरलैंड बनाम टेलर (1949) का हवाला देते हुए कहा कि ‘आवश्यकता’ का मतलब मकान मालिक की सच्ची और ईमानदार मंशा है। जब तक यह मंशा वास्तविक है, अदालत उसकी तर्कसंगतता पर सवाल नहीं उठा सकती।
अदालत कानून में शब्द नहीं जोड़ सकती
न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब विधायिका ने जानबूझकर कुछ शब्द हटा दिए हैं, तो अदालत उन्हें वापस नहीं जोड़ सकती। ‘बोनाफाइड’ या ‘तत्काल आवश्यकता’ जैसे शब्दों को फिर से जोड़ना न्यायिक अतिक्रमण होगा।
किरायेदार पर बढ़ा साक्ष्य का बोझ
अब यदि मकान मालिक अपनी आवश्यकता बता देता है, तो किरायेदार की जिम्मेदारी है कि वह ठोस साक्ष्य से उसे गलत साबित करे। केवल मौखिक या सामान्य दलीलें पर्याप्त नहीं होंगी।
अंतिम आदेश और राहत
उच्च न्यायालय ने श्याम पाल की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराया। हालांकि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें 2 दिसम्बर 2026 तक दुकान खाली करने का समय दिया गया, साथ ही शर्तें भी तय की गईं कि दो सप्ताह में शपथ पत्र दाखिल करें। हर महीने 7 तारीख तक 2000 रुपये उपयोग शुल्क जमा कराएं। शर्त के उल्लंघन पर राहत स्वतः समाप्त हो जाएगी।
क्यों अहम है यह फैसला
यह निर्णय पूरे उत्तर प्रदेश के मकान मालिकों और किरायेदारों के लिए मील का पत्थर है। ‘एएफआर’ श्रेणी में आने के कारण यह सभी निचली अदालतों पर बाध्यकारी होगा और भविष्य के मामलों में मार्गदर्शक बनेगा।
किरायेदारों के लिए चेतावनी
वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन कहते हैं, अब किरायेदारों को यह समझना होगा कि केवल सहानुभूति या पुराने तर्क काम नहीं आएंगे। मकान मालिक की आवश्यकता को चुनौती देने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। समय रहते कानूनी सलाह लेना अनिवार्य हो गया है।