कभी अजेय नहीं रहा अमेरिका, वियतनाम, अफगानिस्तान से जंग हार कर भागना पड़ा था
खुद को दुनिया का दादा कहने वाला अमेरिका कभी अजेय नहीं रहा। वह छोटे-छोटे देशों के आगे पस्त हो गया। उसकी नाकामियां पूरी दुनिया के समक्ष उजागर हो गईं।
वाशिंगटन। अमेरिका ने भले ही वेनेजुएला पर स्ट्राइक कर उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया हो, मगर हकीकत ये है कि वह कभी अजेय नहीं रहा है। उसे छोटे-छोटे देशों ने जंग में पस्त कर दिया और उसे शर्मसार होकर उल्टे पैर भागना पड़ा। अमेरिका की दादागीरी इन देशों में काम नहीं आई। ये देश अमेरिका के मुकाबले बेहद छोटे हैं। ये हैं वियतनाम और अफगानिस्तान। आबादी हो या क्षेत्रफल या अर्थव्यवस्था...हर मामले में अमेरिका इनसे कई गुना आगे रहा है। उसकी फौज दुनिया में हर मामले में आगे मानी जाती है। मगर, अमेरिका की ताकत इन देशों के आगे कमजोर पड़ गई और उसे शर्मसार होते हुए बिना जीत के ही लौटना पड़ा।
वियतनाम युद्ध वियतनाम , लाओस और कंबोडिया की बीच चली लड़ाई थी, जो 1 नवंबर 1955 से 30 अप्रैल 1975 तक चला था। यह जंग तब खत्म हुई, जब अमेरिका समर्थित दक्षिण वियतनाम की राजधानी साइगॉन पर उत्तरी वियतनाम के गुरिल्ला लड़ाकों के संगठन यानी वियतकॉन ने कब्जा जमा लिया। आधिकारिक तौर पर यह युद्ध उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम के बीच लड़ा गया था। उत्तरी वियतनाम का समर्थन जहां रूस कर रहा था, वहीं, दक्षिणी वियतनाम का सपोर्ट अमेरिका कर रहा था।
वियतनाम युद्ध तब शुरू हुआ, जब अगस्त, 1964 की शुरुआत में उत्तरी वियतनाम के गुरिल्ला युद्ध में माहिर वियत कॉन्ग यानी वियतनामी लड़ाकों ने उत्तरी वियतनाम के तट के पास टोंकिन की खाड़ी में अमेरिकी जंगी जहाजों पर हमला कर दिया। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉनसन ने उत्तरी वियतनामी नौसैनिक अड्डों पर जवाबी बमबारी हमला करवाया। फरवरी 1965 में गुरिल्ला लड़ाकों को मारने के लिए अमेरिका ने ऑपरेशन रोलिंग थंडर चलाया, जिसमें वियतनामी गुरिल्लाओं पर जमकर बमबारी की गई। बताया जाता है कि इन लड़ाकों ने वियतनाम के दलदली और जंगली इलाके में अमेरिकी फौजों को लड़ने के लिए मजबूर किया, जिसके आदी वो नहीं थे। वहीं, वियतनामी गुरिल्ला लड़ाके इसमें माहिर थे।
वियतनाम युद्ध तकरीबन 20 साल चला था। इस युद्ध में 20 लाख नागरिक मारे गए थे। 11 लाख वियतनामी लड़ाके और सैनिक मारे गए थे। वहीं, 1.20 लाख अमेरिकी सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी। इससे अमेरिका की आज तक छीछालेदर होती है।
उत्तरी वियतनाम के करिश्माई नेता हो ची मिन्ह ने अपने भाषणों से गुरिल्लाओं को ताकत दी। हो ची मिन्ह ने ही उत्तरी वियतनाम और दक्षिणी वियतनाम के एकजुट होने में अहम भूमिका निभाई। उन्हीं की अगुवाई में वियतनाम जंग अमेरिका कभी जीत नहीं पाया। 2008 में अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि युद्ध पर कुल 686 अरब डॉलर खर्च हुआ था, जो आज के वक्त 950 अरब डॉलर से ज्यादा है।
11 सितंबर, 2001 को अलकायदा आतंकियों ने अमेरिका पर हमला कर दिया। इसके कुछ हफ्ते बाद ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर हमले का ऐलान कर दिया, जिस पर उस वक्त तालिबान का शासन था। बुश ने कहा था कि तालिबान शासन ने ओसामा बिन लादेन सहित अन्य अल-कायदा आतंकवादियों को सौंपने की उनकी मांग को ठुकरा दिया था, जिन्होंने अमेरिका में हमलों की साज़िश रची थी। अफगानिस्तान के अंदर अमेरिका के नेतृत्व में NATO सैनिकों ने तालिबान शासन को शीघ्र ही शासन से हटा दिया तथा एक ‘संक्रमणकालीन सरकार’ की स्थापना की थी।
मई 2003 में अमेरिकी रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने घोषणा की कि अफगानिस्तान में प्रमुख सैन्य अभियान समाप्त हो गए हैं। इसके बाद अमेरिका ने इराक पर आक्रमण कर दिया, जबकि अफगानिस्तान में पश्चिमी शक्तियों ने एक केंद्रीकृत लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थानों के निर्माण में मदद की। हालांकि, इसने न तो युद्ध को समाप्त किया और न ही देश को स्थिर किया। राष्ट्रपति बराक ओबामा से सबसे पहले अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को वापस लाने का वादा किया था। लेकिन वे इसके लिये ‘फेस-सेविंग एग्ज़िट’ भी चाहते थे। बाद में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ सीधे बातचीत करने के लिये अफगानिस्तान में एक विशेष दूत जल्मे खलीलजाद को नियुक्त किया था। फरवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान विद्रोहियों के मध्य समझौता हुआ। उक्त समझौते में ट्रंप प्रशासन ने वादा किया कि वह 1 मई, 2021 तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेगा। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी ‘ट्रंप-तालिबान समझौते’ का समर्थन किया है, लेकिन वापसी की समय-सीमा को 11 सितंबर तक बढ़ा दी।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2001 में तालिबान के खिलाफ युद्ध शुरू होने के बाद से 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में जान गंवा चुके थे, जबकि 20660 सैनिक लड़ाई के दौरान घायल हुए। अफगानिस्तान में अमेरिका के पुनर्निर्माण प्रयासों पर नजर रखने वाली एजेंसी ने अक्टूबर 2020 में अमेरीकी कांग्रेस में पेश अपनी रिपोर्ट में बताया था कि मई 2009 से दिसंबर 2019 के बीच अफगानिस्तान में 19 अरब डॉलर का नुकसान भी हुआ।
अमेरिका अफगानिस्तान में कई कारणों से हारा। इसमें तालिबान की मजबूत पकड़, अफगान सरकार और सेना की कमजोरी, अमेरिका का लंबा और महंगा युद्ध और तालिबान के साथ किया गया समझौता शामिल है। इसके बाद 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी और तालिबान का सत्ता में लौटना हुआ, जिससे लगभग 20 साल की लड़ाई का अंत हुआ।