भक्ति रस से सराबोर हुआ ब्रजः पं. भक्तमाली के प्रिया-प्रीतम मिलन महोत्सव का दूसरा दिन
वृन्दावन। जानकी भवन में ब्रज के मूर्धन्य संत पं. जगन्नाथ प्रसाद भक्तमाली के 41वें प्रिया-प्रीतम मिलन महोत्सव के अंतर्गत द्वितीय दिवस का आयोजन भक्ति और अध्यात्म की धारा से ओतप्रोत रहा। संत विद्वत सम्मेलन में देशभर के प्रमुख संत-महात्माओं ने अपने विचार रखे।
महंत फूलडोल बिहारी दास महाराज ने कहा कि भगवान और भक्त में कोई भेद नहीं है। भक्तमाली जी एवं गोविंद एक ही भाव के प्रतीक रहे। भक्त का स्मरण ही भगवान का स्मरण है।
भानुदेव आचार्य (आचार्य कुटी) ने कहा कि भक्तमाली जी के नेत्रों से भक्ति की भागीरथी सदैव प्रवाहित होती थी। उनकी प्रत्येक श्वास में प्रभु का भजन होता था।
डॉ. अच्युत लाल भट्ट ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि करपात्री जी महाराज, मां आनंदमयी व स्वामी अखंडानंद जी जैसे संत भी उनसे कथा सुनकर भावविभोर हो जाते थे।
कृष्णा नन्द सरस्वती ने उन्हें भगवान द्वारा भेजा गया पार्षद बताया, जिन्होंने भक्ति की धारा प्रवाहित की। डॉ. राम कृपाल भक्तमाली (चित्रकूटी) ने कहा कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए आचार्यों और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा जरूरी है। भक्तमाली जी से जो भी जुड़ा, उसका जीवन धन्य हो गया।
महंत अमर दास व ब्रजबिहारी दास महाराज ने उन्हें सरलता और भक्ति का सुमेरु पर्वत कहा। डॉ. नन्द कुमार शास्त्री ने उनके दर्शन को आनंदमयी और वाणी को मधुर बताया। राजू भैया और मुकेश मोहन शास्त्री ने कहा कि उनका चिंतन परमात्मा का ही गुणानुवाद था। स्वामी कृष्णानंद सरस्वती, महंत मधुमंगल दास और बृज बिहारी दास ने कहा कि भक्तमाली जी वात्सल्य की प्रतिमूर्ति और उच्च विचारों वाले संत थे।
रात्रि 8 बजे रासाचार्य रामबल्लभ शर्मा की मंडली ने महाभारत काल के चार भक्तों भीष्म पितामह, द्रौपदी, विदुरानी और अर्जुन पर आधारित मनोहारी प्रसंग प्रस्तुत किया।
प्रातःकालीन सत्र में संतों द्वारा श्री भक्तमाल जी का समूह पाठ हुआ और श्याम प्रकाश चतुर्वेदी ने नरसी जी के चरित्र पर प्रकाश डाला।
समन्वय – राजेश शर्मा, देवेंद्र शर्मा, संजय शर्मा ने किया जबकि संयोजन किया डॊ. अनूप शर्मा ने। आभार पं. रसिक शर्मा ने जताया।