भैंस भारत की ‘ब्लैक गोल्ड’, इसके संरक्षण और वैज्ञानिक विकास से ही सुदृढ़ होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था : डॉ. अमरेश कुमार

भैंस भारत की पशुधन अर्थव्यवस्था की वह अमूल्य धरोहर है, जो केवल दुग्ध उत्पादन तक सीमित न रहकर ग्रामीण आजीविका, पोषण सुरक्षा, निर्यात और जलवायु अनुकूलन तक बहुआयामी योगदान दे रही है। बदलते समय में ‘ब्लैक गोल्ड’ कही जाने वाली भैंस के संरक्षण, आनुवंशिक सुधार और वैज्ञानिक विकास पर विशेष ध्यान देना अब राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है।

Dec 16, 2025 - 18:36
 0
भैंस भारत की ‘ब्लैक गोल्ड’, इसके संरक्षण और वैज्ञानिक विकास से ही सुदृढ़ होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था : डॉ. अमरेश कुमार
महानिदेशक, केसीएमटी डॉ. अमरेश कुमार,  ने मंगलवार को भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर–आईवीआरआई), इज्जत नगर, बरेली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय भैंस विकास सम्मेलन–2025 के समापन सत्र में मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए।

Top of Form

-रमेश कुमार सिंह-

बरेली। केसीएमटी के महानिदेशक डॉ. अमरेश कुमार ने कहा कि भैंस भारत की “ब्लैक गोल्ड” है और यह केवल दूध देने वाला पशु नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और आजीविका का मजबूत आधार रही है। उन्होंने कहा कि भैंस के संरक्षण और वैज्ञानिक विकास पर समग्र एवं योजनाबद्ध दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक है।

डॉ. अमरेश कुमार भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय भैंस विकास सम्मेलन–2025 के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में भैंस को परंपरागत रूप से संपत्ति के रूप में देखा जाता रहा है। पहले भैंस केवल दूध का स्रोत नहीं थी, बल्कि ग्रामीण जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा थी। आज परिस्थितियाँ बदली हैं, लेकिन भैंस की उपयोगिता और महत्त्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भैंस मांस (बफैलो मीट) के निर्यात से भारत को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही है, लेकिन इसके बावजूद नर भैंसों के वैज्ञानिक उपयोग और मांस उत्पादन के क्षेत्र में अपेक्षित योजनाबद्ध विकास नहीं हो पाया है। देश के विभिन्न हिस्सों में नर भैंस पालन एवं मांस उत्पादन से जुड़े कई प्रोजेक्ट संचालित हो रहे हैं, जिनमें निजी कंपनियाँ भी प्रोत्साहन दे रही हैं, परंतु इन्हें व्यापक नीति समर्थन की आवश्यकता है।

डॉ. कुमार ने आईसीएआर द्वारा पूर्व में किए गए शोधों का उल्लेख करते हुए बताया कि विभिन्न आयु वर्गों में नर भैंसों के पोषण एवं प्रबंधन पर हुए अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि प्रारंभिक अवस्था में वैज्ञानिक पोषण देने से मांस की गुणवत्ता, प्रोटीन कंटेंट और ऑर्गेनोलैप्टिक गुणों में उल्लेखनीय सुधार होता है तथा फैट कंटेंट में कमी आती है।

भैंसों के आनुवंशिक सुधार पर बल देते हुए डॉ. अमरेश कुमार ने कहा कि भारत में ब्रीडर सोसायटी का गठन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि एक मुर्रा भैंस 25 लीटर दूध देती है और दूसरी केवल 5–10 लीटर, तो वैज्ञानिक आधार पर उच्च उत्पादक नस्लों से ही जेनेटिक सुधार किया जाना चाहिए। बीते दशकों में नस्ल सुधार की गति अपेक्षित नहीं रही, जबकि यूरोपीय देशों में नस्ल आधारित पशुपालन से उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

इस अवसर पर सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. एस. के. सिंह, संयुक्त निदेशक (शोध) एवं कार्यवाहक निदेशक, आईवीआरआई ने कहा कि यह राष्ट्रीय सम्मेलन भैंस अनुसंधान एवं विकास से जुड़े वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, विकास अधिकारियों और निजी क्षेत्र के बीच सार्थक संवाद का प्रभावी मंच बनकर उभरा है। सम्मेलन में आनुवंशिक सुधार, प्रजनन, पोषण, रोग प्रबंधन, जलवायु सहनशीलता और किसान आय वृद्धि जैसे विषयों पर व्यापक मंथन हुआ।

समापन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. इंद्रजीत सिंह, अध्यक्ष, इंडियन सोसाइटी फॉर बफ़ेलो डेवलपमेंट एवं कुलपति, बिहार एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी, पटना ने कहा कि भारत के पास विश्व की लगभग 56 प्रतिशत भैंस आबादी है और वैश्विक भैंस दुग्ध उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 68 प्रतिशत है। भैंस मांस की अंतरराष्ट्रीय मांग अत्यधिक है और इससे जुड़े सभी शोध पत्रों व सिफारिशों को नीति-सुझाव पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर नीति निर्माताओं तक पहुंचाया जाएगा।

आयोजन सचिव डॉ. ज्ञानेन्द्र सिंह ने सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए सभी का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि तकनीकी सत्रों में जीनोमिक चयन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एम्ब्रियो ट्रांसफर, सेक्स्ड सीमेन, संतुलित आहार, डिजिटल टूल्स और वैल्यू चेन विकास जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। सम्मेलन में देश-विदेश से लगभग 230 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

SP_Singh AURGURU Editor