चोरी के बदलते मापदंड.....ईमानदारी का पतन और स्वार्थ का उदय!
समाज में अब छोटी-मोटी चोरी को अपराध नहीं माना जाता। भ्रष्टाचार हर वर्ग में घुल चुका है। पहले जिन लोगों पर कालिख पोती जाती थी, उस चरित्र के लोग अब सम्मानित पदों पर हैं। आज ईमान और चरित्र पुराने फैशन बन चुके हैं, जबकि स्वार्थ और मिलीभगत ही सफलता की गारंटी माने जा रहे हैं।
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
जब तरक्की के माप काफी हद तक बदल रहे हैं, तब चोरी के मापदंड बदलते कितनी देर लगेगी। सुनने में आता है कि सन 1962 में चीनी आक्रमण से पहले एक चवन्नी और अठन्नी की चोरी या उतना भी गबन अथवा हेरा-फेरी भी समाज को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था। परंतु आज? चरित्र, चोले और नीयत बदलती जा रही है। कहते हैं न कि बस एक बूंद नींबू का रस ही काफी होता है सैकड़ों लीटर दूध को बिगाड़ने के लिए, पर अब तो घने नींबुओं के फलदार वृक्ष हर जगह सहायतार्थ खड़े हुए हैं।
एक तरफ अभी भी देवगुरु बृहस्पति हैं, जो हमेशा सही मार्ग दिखाते चले आए हैं, परंतु उनके विपरीत पाले में देवगुरु शुक्राचार्य भी तो मौजूद हैं, जो अपने आशीर्वाद और अपनी कृपा बरसाने में कभी कोई कमी आज भी शायद नहीं करते। बस उनके स्वरूप बदल गए हैं। समाज के अलग-अलग, या कहें कि सभी वर्ग और कार्य-श्रेणी में उनके अंश घुल-मिल गए हैं। मिलीभगत से कार्यसिद्धि आसानी से होती रहती है। पाप-पुण्य का भेद भी पल भर में मिटा सकते हैं। हमें न कहिए और खुलासा करने के लिए, क्योंकि जानते आप भी सभी कुछ हैं, परंतु नेत्र और बढ़िया दिमाग होने के बावजूद धृतराष्ट्र बनने का ढोंग करने की होड़ सी अब मच गई है।
आज पुरुषार्थ और स्वार्थ का द्वंद्व है। जब स्वार्थ सिद्धि ही अर्जुन की चिड़िया की आंख और एकप्रायः ध्येय बनते जाएं, तो फिर पुरुषार्थ कब तक पग से पग मिला पाएगा। आजकल वैसे भी ईमान, ईमानदारी, पढ़ाई-लिखाई, अंतर्मन की शुद्धि, इत्यादि पुराने फैशन हो चुके हैं, जो खत्म से ही हो गए हैं। आज गुरु बृहस्पति जी के अनुयायी संख्या में बेहद कम हैं। गुरु शुक्राचार्य के हवन-मंत्र-तंत्र न केवल सर्वसिद्धि हासिल करने में सहायक हैं, बल्कि सारे पापों से हर दिन भी, या एकमुष्ट पापमुक्त करा देते हैं।
आजकल वकील भी तो निरे हैं। कुछ सही के साथ हैं, तो कुछेक इंतजार करते हैं गलत और पापी का सरेआम साथ निभाने को। उनकी आजीविका का सवाल है। अतएव मना भी तो नहीं कर सकते। यह बात अलग है कि दक्षिणा और चढ़ावा ऊपर से नीचे तक पहुंचता रहता है, जिससे सभी खुश रहते हैं। आजकल जो ज्यादा खनकता और चमकता है, वही तो शायद श्रेष्ठ है। ताल्लुकात भी सभी से हैं। उसका ही रुतबा है। सरल, सच्चे, डायनासोर आखिर बचे ही कितने हैं।
सरेआम अब धता बताते और गरियाते देवगुरु शुक्राचार्य के अनुयायी हर ओर दिख जाएंगे। कुछेक पचास-साठ साल की आयु के ऊपर के लोगों ने बचपन में "तिल्ली - लिल्ली - भुस्स्स" कहते किसी को शायद सुना हो। मतलब उसका साफ था- कर लो, जो कर सको, अपुन नहीं मानेगा या सुधरेगा।
आज बढ़ती मौजां, बैंक बैलेंस और समाज में स्टेटस और इज्जत के पीछे केवल देवगुरु बृहस्पति की कृपा नहीं है। देवगुरु शुक्राचार्य को साधने और वरदान पाते रहने की कला भी जरूरी है। देवगुरु शुक्राचार्य प्रसन्न, तो मानो मिलीभगत और सर्वसिद्धि योग चालू। पहले कुछेक लोग ही बदमाश, चोर, मिलावटखोर, कालाबाजारी और बुरे कर्म और जुर्म करने वाले के चेहरे पर कालिख पोत देते थे, या फिर आधे सर के बाल मुंडवा देते थे, जिससे वह व्यक्ति शर्मिंदा रहता था और छुपा-छुपा अपने गंजेपन या कालिख को ढंकता हुआ घूमता था।
आज देखिए जमाना। कालिख पुते लोग कहां नहीं पहुंच गए। और अब आलम यह है कि कोई कालिख पोतने की सोचने की हिम्मत भी नहीं कर सकेगा। न जाने आज हमारी विधि द्वारा कितनों को बाइज्जत बरी कर दिया गया है, और यह संख्या बढ़ती जा रही है, और एक-दूसरे को संबल भी। पहले एक रुपया या अठन्नी की चोरी भी दर्ज होती आई, पर अब छोटी-मोटी चोरी को चोरी मानना ही बंद कर दिया है समाज ने। ऐसे में खुलेआम सभी की "तिल्ली - लिल्ली - भुस्स्स"।
क्या कर लोगे, यदि अब माल्या, चोकसी जैसे, जो लाखों-करोड़ों के कांड करते गए? इनकम टैक्स की चोरी, या फिर जीएसटी की चोरी, अब चोरी नहीं लगती, क्योंकि यदि पकड़े भी गए तो कालिख पुतेगी नहीं। और ऊपर वाले की कृपा बनी रही तो सारा केस भी रफा-दफा हो सकता है, या मामूली पेनल्टी देकर छुटकारा। हमाम तो अब लगभग भरा ही जा रहा है। न्याय व्यवस्था ने तो शादीशुदा महिला-पुरुष में बढ़ते अनैतिक संबंधों को भी माफ कर दिया है। अब कोई लक्ष्मण जैसी सजा नहीं, और न कोई चरित्र पर दाग और न कोई सवाल।
थोड़ा क्या अब भी शक है कि नहीं हो पाई हमारी "तिल्ली - लिल्ली - भुस्स्स"?
(ये लेखक के अपने विचार हैं। लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं और कई पुस्तकों के लेखक हैं।)