चकबंदीः चौधरी चरण सिंह के भू-सुधारों की श्रृंखला में मील का एक पत्थर
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होते ही ब्रितानिया शासक ने जब देश से बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी शुरू कर दी तो देश के बडे़ नेता सत्ता हस्तान्तरण के बाद का तंत्र के ताना-बाना तैयार करने में जुट गये। वहीं उत्तर प्रदेश की अंतरिम सरकार में पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरी चौधरी चरण सिंह राजनैतिक आजादी के इस मौके को जाया न कर इसकी महक उपेक्षित, अभावग्रस्त व गरीबी की बेड़ियों में जकड़े ग्रामीणों/किसानों तक पहुंचाने की जुगत में जुट गये। उनकी इस मुहिम में सूबे के मुख्यमंत्री पं. गोविन्द बल्लभ पंत का उन्हें पूरा सहयोग व समर्थन मिलता रहा।
आजादी से पहले लगभग 82 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी। उसी तरह देश की अर्थव्यवस्था में इसका योगदान भी महत्वपूर्ण था। मध्यम वर्ग न के बराबर था और सेवा सेक्टर होता ही नहीं था। पूरे देश के किसानों की अमूमन एक जैसी स्थिति थी। खेती पूर्णतः प्रकृति की कृपा पर आधारित थी। गांव में कुछ ही कदीमी रास्ते आने-जाने हेतु होते थे। किसान के पास जमीनें छोटे-छोटे टुकड़ों में कई जगह छिटकी होती थीं। वह मेडों से होकर कंधे पर हल रखकर बैल के रस्से कमर से बांधकर जैसे-तैसे अपनी जमीन तक पहुंचकर खेतीबाड़ी कर पाता था।
सार्वजनिक उपयोग हेतु कोई जमीन होती नहीं थी। सिंचाई हेतु हर जमीन के टुकडे़ पर पानी पहुंचाना आर्थिक रूप से संभव ही नहीं था। जो बीज जमीन में डाल दिया और प्रकृति की मेहरबानी हुई तो फसल के रूप में आ गया। नहीं तो मुंह में निवाला डालने लायक भी नहीं। आज से सौ साल पहले उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द ने अपने कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ में भारत के ग्रामीण समाज तथा उसकी जिंदगी की दुष्वारियों व समस्याओं के मार्मिक चित्रण से रूबरू कराया था। यह उत्तर प्रदेष के वास्तविक ग्रामीण जीवन का एक आइना था।
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होते ही ब्रितानिया शासक ने जब देश से बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी शुरू कर दी तो देश के बडे़ नेता सत्ता हस्तान्तरण के बाद का तंत्र के ताना-बाना तैयार करने में जुट गये। वहीं उत्तर प्रदेश की अंतरिम सरकार में पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरी चौधरी चरण सिंह राजनैतिक आजादी के इस मौके को जाया न कर इसकी महक उपेक्षित, अभावग्रस्त व गरीबी की बेड़ियों में जकड़े ग्रामीणों/किसानों तक पहुंचाने की जुगत में जुट गये। उनकी इस मुहिम में सूबे के मुख्यमंत्री पं. गोविन्द बल्लभ पंत का उन्हें पूरा सहयोग व समर्थन मिलता रहा।
गांव की दुश्वारी की जिंदगी उन्होंने स्वयं अनुभव की थी। उसकी पीड़ा वे झेले हुए थे। उन दिनों देश भर में प्रतिष्ठित आगरा कॊलेज से 1924 में लॊ ग्रेजुएशन की डिग्री लेकर वे गाजियाबाद के अवर न्यायालयों में प्रेक्टिस भी कर चुके थे। जमीदारी विनाश अधिनियम उन्होंने पास कराया जो भारतवर्ष में प्रथम प्रयोग था। ये हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक चैलेंज हुआ था, लेकिन सभी फोरम से इसे हरी झंडी मिल गई थी।
आचार्य नरेन्द्र देव, जय प्रकाश नारायण व राम मनोहर लोहिया सुशिक्षित, विचारक, चिंतक व समाजवाद के ज्ञाता तथा प्रवर्तक थे, लेकिन चौधरी चरण सिंह ने समाजवाद को धरातल पर उतारने का काम किया था। तभी तो मशहूर कम्यूनिस्ट नेता ईएमएस नंबूदरीपाद ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा था-‘‘जो भूमि सुधार कार्य केरल व बंगाल में कम्यूनिस्ट सरकारें नहीं कर पायी थीं, उन्हें चौधरी चरण सिंह ने आजादी के बाद ही कांग्रेस में रहते हुए पूरा कर दिया था।’’
जमींदारी उन्मूलन योजना के सफल कार्यान्वयन से उत्साहित उन्होंने भूमि-व्यवस्था में क्रांतिकारी कदम के रूप में जो चकबंदी व्यवस्था लागू करायी थी। इसका मूख्य उद्देश्य कृषि को अलाभकारी से लाभकारी बनाना, सिंचाई के साधन उपलब्ध कराना तथा उसकी गुणवत्ता व उत्पादकता बढ़ाना था। 1946 से 1960 तक अनवरत, अहर्निष काम करते हुए उन्होंने जमींदारी उन्मूलन, जोत-चकबंदी, जमींदारों के टूल वंशानुगत पटवारी पद की समाप्ति, तकाबी व कोआपरेटिव बैंकों से मामूली ब्याज दर पर कृषि ऋणों की व्यवस्था व बड़ी जोत वालों पर कृषि भूमि सीलिंग जैसी ग्रामीण/कृषि अर्थव्यवस्था कें आमूल चूल परिवर्तन की योजनाएं न केवल विधायी प्रक्रिया से पास कराई वरन उन्हें जमीन पर उतरवा भी दिया।
कृषि की उन्नति हेतु उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम 1953 के पास होते ही 1954 की 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) से इस योजना को मुजफ्फरनगर जिले की कैराना तहसील और सुल्तानपुर जिले की मुसाफिरखाना तहसील में प्रक्रिया शुरू कर दी गई। शुरूआत में यूपी के 26 जनपदों में इसे लागू किया गया। ईमानदार व ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के उत्सुक पीसीएस अधिकारी चौधरी साहब ने साक्षात्कार लेकर एसओसी के रूप में इन जिलों में तैनात किये। इसी तरह एसीओ भी ईमानदारी और निष्ठा वाले छांटकर इन जिलों में तैनात किये गये।
इस व्यवस्था का क्रांतिकारी स्वरूप यह था कि खुले में सार्वजनिक स्थलों पर जनसहभागिता से इस योजना को कार्यान्वित किया गया। गांव में ग्राम चकबंदी समिति बनाई गई, जिसे पूर्ण शक्ति दी गई कि सार्वजनिक उपयोग की कहां-कहां कि कितनी जमीनें छोड़ी जानी हैं। कितनी कटौती किसानों की जोतों से होनी है, यह भी समिति ही तय करती है। हर चक तक चकरोड, नाली की व्यवस्था से किसान सशक्त व सम्पन्न होने लगे थे। इस योजना को 1977 तक पहले चरण में पूरे राज्य में 97 प्रतिशत तक लागू किया जा चुका था।
भारत सरकार की एक सैम्पल स्टडी में पाया गया था कि चकबंदी की वजह से सिंचाई क्षेत्रफल में 56 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हो गई थी, क्योंकि किसानों ने अपनी मालिकाना भूमि एक या दो जगह पर काम्पैक्ट हो जाने पर कुएं, नाली, ट्यूबवैल जैसे उपक्रम लगा लिए थे। खेती की उत्पादकता व उन्नति का जो सपना चौधरी चरण सिंह ने देखा था, वह फलीभूत हो चुका था। पिछली सदी के छठवें दशक में हरित क्रांति की सफलता का मुख्य कारण भी चकबंदी योजना को जाता है।
चकबंदी प्रक्रिया के दौरान ही गांव के भूमिहीन, निर्बल व दलित वर्ग के लोगों के आवास हेतु भूमि आरक्षित की गयी थीं। जिन पर बाद की सरकारों द्वारा अनुदान देकर मकान बनवा दिये गये। पंचायत घर, खेल का मैदान, स्कूल, खाद के गड्ढे़, श्मशान, कब्रिस्तान, शौचालय, अस्पताल आदि सार्वजनिक उपयोगों हेतु भू-खण्ड निश्चित कर दिये गये थे।
दीवानी व माल की अदालतों में कब्जे, बंटवारे, हक-हकूक के पूरे प्रदेश में लाखों केस लम्बित थे। इस प्रक्रिया के नोटिफाई होते ही ये केस वहां निष्क्रिय हो गये और चकबंदी अदालतों के अधिकार क्षेत्र में चले गये। इससे अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितना श्रम, धन किसानों का बर्बाद होने से बच गया। इस तरह चकबंदी जैसी जमीनी योजना से चौधरी चरण सिंह ने प्रदेश के असंख्य दलितों, पिछड़ों, किसानों, खेतिहर मजदूरों व गरीबों की न केवल मुक्ति की वरन उन्हें प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी का अहसास भी कराया।
गांधीवादी चौधरी चरण सिंह की ग्राम-स्वराज की अवधारणा वाली यह एक प्रजातंत्र की पहली पायदान-ग्राम पंचायत की खुली व प्रभावी जनसहभागिता वाली योजना थी। वे अकेले ऐसे राजनेता थे जिनकी सोच किसान व खेती के विकास व उन्नति के इर्द-गिर्द ही घूमती थी।
इस योजना की सफलता व स्वीकार्यता का मुख्य कारण इसके कार्यान्वयन में अनिवार्य जनसहभागिता व पारदर्शिता थी। इसकी पुष्टि अमेरिका से उस दौर में केस स्टडी हेतु उत्तर प्रदेश के गांवों के स्टडी टूर पर आए अर्थशास्त्री/समाजशास्त्रियों ने भी की थी। भारत सरकार के योजना आयोग ने अपने विषय विषेशज्ञ फील्ड में भेज चकबंदी योजना के जमीनी कार्यान्वयन से कृषि उत्पादकता पर इसके प्रभाव की जांच परख कराई थी।
थॊमस आर मेटकाफ, वाल्टर सी. नील, रिचर्ड एस. नेवल, पॊल आर ब्रास, जोसेफ डब्लू ऐल्डर, फिलिप ओलडनबर्ग और राफ एच रेट्जलाफ जैसे अमेरिकन प्रोफेसर चकबंदी हुए गांवों में खाक छानते रहे। उन्हें इतनी व्यापक स्कीम के कार्यान्वयन में कोई उल्लेखनीय भ्रष्टाचार नहीं मिला था। उन्होंने खेती को आर्थिक, लाभप्रद व उन्नतशील बनाने हेतु सभी राज्यों में इस स्कीम को लागू करने की वकालत भी की थी।
चौधरी चरण सिंह की असली पाठशाला तो ग्रामीण जिन्दगी थी। आम कृषक हित के सारे विधान बनाने की प्रेरणा उन्हें अपने जीवन के अनुभवों से मिली थी, जो सामाजिक यथार्थ की भूमि पर जन्म लिये थे। इसीलिए उनके द्वारा बनाए व लागू किए गए भू-सुधार न केवल क्रांतिकारी व लोकप्रिय साबित हुए वरन देश-विदेश की एकेडमिक सर्किल में कोतूहल पैदा करने वाले भी थे।
यह महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि एक हकीकत है कि चकबंदी प्रक्रिया अपनाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश, हरियाणा व पंजाब ही हरित क्रांति के सूत्रधार बने और आज भी इन्हीं राज्यों के कारण देश के अनाज के भंडार गृह भरे रहते हैं और हम 80 करोड़ भारतीयों को मुफ्त राशन देने की स्थिति में हैं।
23 दिसम्बर (किसान दिवस) की जन्मतिथि के अवसर पर चौधरी चरण सिंह को विनम्र श्रृद्धाजंलि।
-चोब सिंह वर्मा,
पूर्व डिप्टी डायरेक्टर चकबंदी,
आईएएस (सेवानिवृत्त)।