कर्ण जैसा समर्पण और कृष्ण जैसा मार्गदर्शनः आज के दौर में भी चाहिए ऐसी सच्ची दोस्ती!
आज मित्रता दिवस है। मित्रता सिर्फ रिश्ता नहीं, विचारों की वह श्रृंखला है जो जिंदगी की हर परिस्थिति में साथ निभाती है। कर्ण हो या कृष्ण, दोनों ने दोस्ती के मायनों को युगों से अमर कर दिया है। कर्ण ने जानते-बूझते दुर्योधन का साथ दिया, तो कृष्ण ने सुदामा की गरीबी को मित्रता की अमीरी में बदल दिया। असली दोस्त वही है, जो समय आने पर ठोक-बजाकर रास्ता भी दिखाए और आखिरी सफर तक साथ भी चले।
अब भी जिंदा है दोस्ती का जादू
आज भी देश में ऐसे कई दोस्त हैं जो 50-50 साल से साथ हैं और सुदामा-कृष्ण की मित्रता को जी रहे हैं। दोस्त सिर्फ व्यक्ति नहीं होता, वह भावनाओं और भरोसे की जीवंत संस्था है। वह एनसाइक्लोपीडिया की तरह होता है, जो यह नहीं पूछता कि ‘क्यों चाहिए’, बल्कि वह पूछता है ‘क्या चाहिए’ है। संयुक्त परिवारों में रिश्ते एक-दूसरे के बीच ऐसे ही पनपते हैं, जैसे आंगन में तुलसी।
70 साल पुरानी दोस्ती की नम मिसाल
मंदसौर के जवासिया गांव में 70 वर्षीय सोहनलाल जैन ने अपने जिगरी दोस्त अंबालाल प्रजापत को एक चिट्ठी लिखी थी- ‘जब मेरा अंत हो, तो तू नाचकर मुझे विदा करना।‘
जनवरी 2021 में लिखी वह चिट्ठी अगस्त 2025 में हकीकत बनी, जब अंबालाल ने रोते हुए भी अपनी आंखों में मुस्कान लिए, गांव वालों के सामने नाचकर अपने दोस्त को वैसी ही विदाई दी जैसी उसने चाही थी। यही होती है सच्ची दोस्ती, जहां जीवन का हर मोड़ साझा होता है, यहां तक कि अंतिम विदाई भी।
नारी शक्ति की दोस्ती भी अब परंपरा तोड़ रही
अब महिलाएं भी दोस्ती को खुलकर जीती हैं। वे दोस्त के साथ रात में प्रोग्राम, बाइक पर लॉन्ग ड्राइव, चाय की दुकान पर चुस्कियां और शहर दर शहर की यात्राएं भी करती हैं।
इनमें से कई समूह तो आपसी मित्रता में इतना आगे बढ़ चुके हैं कि परिवार भी उन्हें पूरा सहयोग देता है। आज की नारी दोस्ती निभाने में किसी पुरुष से पीछे नहीं है, सहयोगी, भावनात्मक और सुरक्षा देने वाले- तीनों रूपों में आगे हैं।
मां-बाप हो सकते हैं शालीन दोस्त, लेकिन यार नहीं
आज बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को 'मित्र बनो' कहते हैं, परंतु यह ध्यान रखना जरूरी है कि दोस्ती का अनुशासन परिवार से अलग होता है। संस्कारों के अनुरूप माता-पिता को शालीन दोस्त कहा जा सकता है, लेकिन वे 'यार' नहीं हो सकते। यह सनातन मूल्यों की मर्यादा है।
सच्चा दोस्त वही जो बगैर रीचार्ज के भी नेटवर्क में रहे
आज की दोस्ती को अब जाति, सामाजिक हैसियत, बुद्धि और स्वार्थ के आधार पर भी परखा जाने लगा है। सामाजिक माध्यमों (सोशल मीडिया) ने तो जैसे सच्चे दोस्तों की जगह आभासी अनुयायियों को बैठा दिया है।
फिर भी, असली दोस्त वही होता है जो वक्त पर साथ दे, बिना रीचार्ज के भी नेटवर्क में रहे। आज की पीढ़ी को यह समझना होगा कि 5000 इंस्टाग्राम फ्रेंड्स भी उस एक सच्चे दोस्त की जगह नहीं ले सकते जो मुश्किल वक्त में साथ खड़ा होता है।
ब्रेड-समौसे और सड़क किनारे की चाय वाली दोस्ती
मैं अपने पांच दशक से ज्यादा के दोस्तों को मित्रता दिवस के मौके पर शुभकामनाएं देने के साथ यह भी कहना चाहता हूं कि वे अपनी नई पीढ़ियों को ब्रेड में समोसा और टोस्ट में मक्खन लगाकर सड़क पर खड़े होकर चाय पीने का आनंद बदाएं। पांच दशक पहले की उस दोस्ती की गर्माहट अब आज के एसी कैफे में नहीं, जो सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे थी।
इस बार दोस्ती का बंधन बांधें दिल से
मित्रता दिवस पर अपने दोस्त की कलाई पर लोकस्वर बंधन बैंड बांधिए, गले लगाइए और कहिए- तेरे बिना कुछ अधूरा सा है। क्योंकि ज़िंदगी के हर मोड़ पर, दोस्त ही वो रौशनी है जो रास्ता दिखाती है।
-राजीव गुप्ता- जनस्नेही कलम से
-लोकस्वर, आगरा