किशोरों की बिगड़ती सोच बनी चुनौती: सहपाठी द्वारा ही छात्रा के साथ दुराचार ने उठाए कई सवाल
आगरा। ट्रांस यमुना कॉलोनी में 11वीं की छात्रा के साथ उसी के घर में हुई दुराचार और मारपीट की घटना ने जहां परिजनों को झकझोर कर रख दिया है, वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि किशोरवय उम्र में ही लड़कों के अंदर इस तरह के घिनौने अपराध की सोच आ रही है। घर में मां की मौजूदगी में जिस तरह तीन किशोरों ने छात्रा पर हमला किया, वह यह सोचने को मजबूर करता है कि आज की किशोर पीढ़ी की सोच और दिशा किस ओर जा रही है।
-सहपाठी ने छात्रा के साथ उसी के घर में दिया इस अपराध को अंजाम, उसके दोनों दोस्तों ने छेड़छाड़ की थी, किशोर न्याय व्यवस्था और पारिवारिक संस्कारों पर उठे सवाल
घटना के अनुसार, पीड़िता का सहपाठी अपने दो दोस्तों के साथ रात करीब आठ बजे उसके घर पहुंचा था। छात्रा की मां अपने कमरे में सोने जा चुकी थीं। सहपाठी होने के नाते छात्रा ने भरोसे के साथ उसे घर में प्रवेश दिया, लेकिन उसका यह भरोसा उसके ही खिलाफ इस्तेमाल हो गया। आरोप है कि पहले तो सहपाठी के दोनों दोस्तों ने लड़की से छेड़छाड़ की और फिर सहपाठी ने दुराचार की घटना को अंजाम दिया। इस दौरान गाली गलौज, मारपीट भी की गई। सहपाठी ही सबसे बड़ा हैवान निकला।
छात्रा के शोर मचाने पर मां कमरे से बाहर आईं और दो आरोपी मौके से भाग निकले, जबकि सहपाठी को मां ने पकड़ लिया। स्थानीय लोग जुटे और पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लिया और किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया। पकड़ा गया आरोपी टेढ़ी बगिया इलाके का निवासी है। पुलिस अब फरार दो अन्य किशोरों की तलाश में दबिश दे रही है।
किशोरावस्था में अपराध का बढ़ता ग्राफ
यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि किशोरों के बीच घिनौनी आपराधिक प्रवृत्तियां कैसे गहराती जा रही हैं। स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र अब केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, डिजिटल गेम्स, और गली मोहल्ले की गलत संगतों में पड़कर अपराध की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
सामाजिक विशेषज्ञों की मानें तो किशोरावस्था में भावनात्मक असंतुलन, घर में संवादहीनता, इंटरनेट पर खुली पहुंच और फिल्मों में हिंसा के महिमामंडन ने बच्चों को असंवेदनशील बना दिया है।
पारिवारिक निगरानी और स्कूल की भूमिका पर भी सवाल
कई बार अभिभावक यह सोचकर संतुष्ट हो जाते हैं कि उनका बच्चा स्कूल जा रहा है या सहपाठियों से मिल रहा है, लेकिन वह यह नहीं समझते कि किशोर मन कितना विचलनशील होता है।
इस मामले में भी, छात्रा और आरोपी एक ही स्कूल में पढ़ते थे, ऐसे में यह घटना स्कूल प्रशासन और माता-पिता दोनों के लिए चेतावनी है कि बच्चों की मानसिक दशा और उनके व्यवहार पर सतत निगरानी जरूरी है।
किशोर न्याय कानून की कसौटी पर अपराध
आरोपी चूंकि किशोर है, इसलिए उसे बाल सुधार कानून के तहत न्याय प्रक्रिया से गुजरना होगा। लेकिन सवाल यह है कि यदि कोई नाबालिग इस तरह की गंभीर घटना को अंजाम देता है तो क्या वह केवल सुधार के योग्य है या समाज की सुरक्षा के लिए कठोर सज़ा के योग्य भी?
इस प्रकरण ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि किशोरों के लिए बने कानून वर्तमान समय की गंभीर परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त हैं या नहीं।
समाज को लेना होगा जागरूकता का संकल्प
इस घटना ने आगरा जैसे शहर में रहने वाले अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हम अगली पीढ़ी को क्या संस्कार और क्या दृष्टिकोण दे रहे हैं? किशोरों की बढ़ती उद्दंडता और संवेदनहीनता को रोकने के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि सामाजिक सुधारों, संवाद और जिम्मेदार पालन-पोषण की भी उतनी ही जरूरत है।
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