दुख की घड़ी को अवसर न बनाएं, संवेदना का सम्मान करें

दुख की घड़ी को कभी भी 'अवसर' या 'सामाजिक उपस्थिति' का मंच न बनाएं। यह समय है परिवार के साथ मौन खड़े रहने का, उनके आंसू पोंछने का, न कि स्मृति चित्रों की प्रतियोगिता में भाग लेने का।

Jul 14, 2025 - 12:22
 0
दुख की घड़ी को अवसर न बनाएं, संवेदना का सम्मान करें

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां हर क्षण, हर भावना और हर संबंध मोबाइल कैमरे और सोशल मीडिया पोस्ट का हिस्सा बन चुका है। तकनीक ने जहां संवाद और संपर्क को सहज बनाया है, वहीं यह संवेदना और मर्यादा की सीमाओं को भी धुंधला कर रही है।

आज यह चलन बन चुका है कि लोग मृत्यु, शोक या दुख की घड़ी में भी तस्वीरें खींचते हैं, उन्हें साझा करते हैं और सामाजिक मंचों पर शोक संदेश के साथ अपने चेहरे, मुलाकातों या ‘मौन श्रद्धांजलि’ की तस्वीरें डालते हैं। सोचने वाली बात यह है कि क्या किसी परिवार की असहनीय पीड़ा, एक प्रियजन के बिछड़ने का दुःख, कोई ऐसा दृश्य है जिसे प्रचारित किया जाए?

जब परिवार किसी अपने को खोकर टूट चुका हो, तब उन्हें सहारा, चुपचाप कंधे पर थपकी और मौन संवेदना की आवश्यकता होती है, न कि कैमरे की फ्लैश और सोशल मीडिया की लाइक्स की। दुख की इस घड़ी में हमारे एक क्लिक से किसी का दुख और अधिक गहरा हो सकता है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिष्टाचार और संवेदनशीलता दो ऐसे स्तंभ हैं जिन पर इंसानियत की नींव टिकी होती है। शोकसभा या अंतिम दर्शन के समय फोटो खिंचवाना और उसे पोस्ट करना न केवल अशोभनीय है, बल्कि मृतक और उनके परिजनों के प्रति असम्मान भी है।

हमें सोचना चाहिए कि क्या हम किसी के दुःख को अपना प्रदर्शन मंच बना रहे हैं?

ऐसे समय में हमारी भूमिका शांति, सहानुभूति और मर्यादा निभाने की होनी चाहिए। मौन में की गई प्रार्थना, कंधे पर रखा सांत्वना का हाथ और दिल से निकली संवेदना किसी भी ‘पोस्ट’ से अधिक मूल्यवान होती है।

-राजीव गुप्ता, ‘जनस्नेही कलम से’

लोक स्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor