882 टन स्वर्ण भंडार देश की समृद्धि का संकेत!
-पराग सिंघल- विश्व स्वर्ण परिषद (डब्ल्यूजीसी) द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट में बताया है कि भारतीय रिजर्व बैंक दुनिया भर के केन्द्रीय बैंकों में सबसे अधिक सोना खरीदने वाला बैंक बन गया है। डब्ल्यूजीसी के अनुसार अकेले अक्टूबर माह में भारतीय रिजर्व बैंक ने 27 टन सोना खरीदा।
उल्लेखनीय है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने जनवरी से लेकर अक्टूबर 2024 तक 77 टन सोना खरीदा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से पांच गुना अधिक है। इस खरीद के चलते भारत का कुल स्वर्ण भंडार बढ़कर 882 टन हो गया, जो वर्तमान भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता को तो दर्शाता ही है, साथ ही वित्तीय स्थिति के प्रति निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के दृष्टि से भी अत्याधिक महत्वपूर्ण है।
देश का इतना विशाल स्वर्ण भंडार देश की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने और रणनीतिक निर्णय लेने में दृढ़ता प्रदान करता है। आर्थिक कठिनाइयों, मुद्रा अस्थिरता और भू-राजनीतिक चिंताओं के मामले में भी स्वर्ण रचनात्मक उपाय के रुप में काम करता है।
आपको याद होगा कि चन्द्रशेखर सरकार के कार्यकाल में भारत को 1991 में विदेशी मुद्रा संकट से निबटने के लिए अपने स्वर्ण भंडार के एक बड़ा हिस्से को गिरवी रखना पड़ा था। अपने विशान स्वर्ण भंडार के कारण ही अमेरिका वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अपना दबदबा बनाए हुए है।
भारत के स्वर्ण भंडार में वृद्धि का अर्थ है कि इससे हमारी मुद्रा रुपया को मजबूत आधार मिलेगा और वैश्विक वित्त में भारत की भागीदारी भी बढ़ेगी। चूंकि विश्व के विकसित देश फिलहाल वैश्विक मंदी से जूझते नजर आ रहे हैं। कदाचित यही कारण है कि उभरते बाजारों के केन्द्रीय बैंक ने इस वर्ष सोने की खरीद में अग्रणी भूमिका निभाई।
रिपोर्ट के अनुसार भारत के बाद तुर्किये और पौलेण्ड क्रमशः 72 और 69 टन सोने की खरीद के साथ सोना खरीदने के मामले में दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। हालांकि इसका दूसरा पहलू यह है कि केन्द्रीय बैंकों की ताबड़तोड़ खरीदारी के कारण भी बाजार में सोने की कीमतों में तेजी देखी गई।
बहरहाल, सबसे अधिक सोना खरीदकर रिजर्व बैंक ने दुनिया भर के केन्द्रीय बैंकों में अपनी स्थिति तो मजबूत बना ली है, अब आशा की जा सकती है कि सोने का यह बढ़ा हुआ भंडारण केन्द्रीय बैंक को अपनी नीतियों को मजबूत दिशा देने में और प्रभावी बनाने में सहायक होगा।
इसके अलावा एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि अन्य क्षेत्रों में भी भारत अपनी मजबूत स्थिति बनाता जा रहा है। डीएसपी म्यूचुचल फंड्स की रिपोर्ट के अनुसार सतत रुप से उच्च मानक का प्रदर्शन करने वाली कंपनियों की संख्या की दृष्टि से भारत दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे पायदान पर पहुंच गया, जो सिर्फ भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति का ही परिचायक ही नहीं है, बल्कि देश में उद्यमियों, नवाचार और व्यावसायिक रणनीतिकों की सफलता को भी दर्शाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह भारतीय कंपनियों के एक दशक से भी अधिक समय से इक्विटी पर लगातार बीस प्रतिशत से अधिक शेयर बाजार को मजबूत बनाने के मूल सिद्धांतों को भी रेखांकित करता है। गौर करने वाली बात है कि भारतीय कंपनियां ऐसे दौर में हैं, जब दुनिया के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं अनिश्चित आर्थिक परिस्थिति से जूझ रही हैं।
दरअसल, देश में डिजिटल क्रांति ने भारतीय उद्योगों को नयी ऊर्जा प्रदान में अग्रणी भूमिका निभायी है। आईटी के क्षेत्र से लेकर ई-कॊमर्स और फार्मा सेक्टर तक, भारतीय कंपनियों ने न केवल घरेलू बाजार, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमदार उपस्थिति दर्ज करवा दी है। यहीं नहीं, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहल ने उद्यमियों को प्रोत्साहित किया।
देश का व्यापारिक वातावरण को आकर्षक बना है, साथ ही विदेशी निवेश को भी पूरी तरह आकर्षित किया। आईटी, ऒटोमोबाइल्स, फार्मा और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों का योगदान उल्लेखनीय है, जिन्होंने न केवल देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाया, बल्कि रोजगार के लाखों अवसर पैदा किये।
भारत का इस सूची में उच्च स्थान पर होना ही केवल आर्थिक सफलता की कहानी स्वर्ण अक्षरों में लिखने में समर्थ हो गया। यह इस बात का भी प्रमाण है कि देश ने वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं कर समझा और उस पर खरा भी उतरा। एशियाई विकास बैंक ने नीति निवेश एवं आवास मांग में कमी के कारण के चलते वालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर में मामूली कमी करने का प्रयास किया है।
अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दबाव, पर्यावरणीय चुनौतियों और श्रम बाजार की अनिश्चितताओं का सामना करते हुए भारतीय कंपनियों को अपने प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखनी होगी। सरकार को भी व्यापारिक वातावरण को सुलभ बनाने, नीतिगत सुधार लागू करने और नवाचार को बढ़ावा देने के प्रयासों जारी रखने की आवश्यकता है।
साथ ही भारत सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह सफलता चंद नामी कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे व मध्यम उद्योगों को भी वैश्विक स्तर पर उभरने का अवसर मिलता रहे। 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए देश को एक स्थायी व समावेशी आर्थिक मौडल की जरुरत है और यह उपलब्धियों को ऐसे आर्थिक मौडल की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
यदि बात करें वृद्धि दर की तो देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अनंत नागेश्वर के सुझाव पर गौर करना होगा कि सात प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर रखने के लिए सामने आने वाली विभिन्न चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। जीडीपी वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष में 6.5-7 प्रतिशत रह सकती है। दूसरी तिमाही में जीडीपी में तेज गिरावट कुछ अस्थायी कारणें के चलते सामने आयी या कुछ बड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है।
सीईए ने कहा कि हमारी विकास दर तेज मार्ग पर है लेकिन वैश्विक चुनौतियों भी सामने आ सकती हैं। इनसे निपटने के लिए हमको तैयार रहना होगा। साथ ही कहा कि बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए 10-12 वर्षो में प्रत्येक वर्ष 80 लाख रोजगार पैदा करने की जरुरत है। छोटे व मध्यम उद्योगों को चिंता किए बिना अपने आकार को बढ़ाने पर जोर देना होगा।
इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि देश की बढ़ती आर्थिक शक्ति के चलते विदेशी ताकतें देश के उद्योगों के साथ उद्यमियों को चुनौती देने का अवसर नहीं छोड़ रहीं। ऐसी शक्ति देश के प्रधानाचार्य की भूमिका निभाते हुए विभिन्न प्रकार के आरोपित करने से चूक नहीं रहीं। अतः इन सबके चलते हम देशावासियों को ही ऐसी बेकार की और झूठी रिपोर्टों पर ध्यान न देकर सचेत रहते हुए देश को मजबूत आधार देने में सहयोग देना चाहिए।